(1) प्रजा अधीन राजा और `जनता की आवाज़` पर प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न


 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न -`पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) , प्रजा अधीन-राजा (राईट टू

रिकल), जूरी सिस्टम, `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) और

दूसरे प्रजा अधीन-राजा समूह के प्रस्तावों पर

विषय-सूची
(1) प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) और `जनता की आवाज़`(पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली = टी.सी.पी) पर प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न…. 2

(2) जूरी सिस्टम पर अक्सर पूछे गए प्रश्न…. 41

(3) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)` (एम आर सी एम) के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न      66

(4) महंगाई के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न…. 81

(5) पोलिस ,सेना और देश की सुरक्षा और हथियार रखने और बनने के बारे में अक्सर पूछे गए प्रश्न…. 88

(6) और दूसरे विषयों पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न…. 89

आप ये फाइल डाउनलोड कर सकते हैं इस लिंक से जिसमें प्रजा-अधीन-राजा समूह (राईट टू रिकाल ग्रुप) के सारे प्रस्ताव हैं –

www.righttorecall.info/011.h.pdf (संक्षिप्त)

www.righttorecall.info/301.h.pdf (विस्तृत)


टी.सी.पी. और आर.टी.आर. पर अकसर पूछे जाने वाले प्रश्न का विडियो चैनल –

https://www.youtube.com/user/TCPHindiFAQs

(1) प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) और `जनता की आवाज़`(पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली =

टी.सी.पी) पर प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

 

प्रजा अधीन-लोकपाल ड्राफ्ट डाउनलोड करें इस लिंक से (इन में से एक) –

इसी प्रकार के प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) के दूसरे ड्राफ्टस भी हैं, इसीलिए पूछे जाने वाले प्रश्न सभी प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) के ड्राफ्टस के ऊपर लागू होता हैं

1. भारत का कोई भी नागरिक जिला कलेक्टर को एक सांसद के चुनाव के बराबर भुगतान करके खुद
को लोकपाल अध्यक्ष के लिए उम्मीदवार के रूप में रजिस्टर करवा सकता है |

2. भारत का कोई भी नागरिक तलाटी ((लेखपाल, पटवारी, ग्राम अधिकारी) कार्यालय में जाकर मात्र 3
रुपये शुल्क का भुगतान करके, लोकपाल अध्यक्ष पद के लिए अधिकतम पांच व्यक्तियों पर अनुमोदन
या स्वीकृति दे सकता है | तलाटी (लेखपाल, पटवारी, ग्राम अधिकारी) उसे रसीद देगा जिस पर उसका
मतदाता-पहचान-संख्या, अंगुली के छाप और व्यक्तियों के नाम जिसे उसने मंजूरी दी है लिखी होगी |

3. नागरिक किसी भी दिन अपना अनुमोदन (स्वीकृति) रद्द कर सकता है |

4. वह पटवारी लोकपाल के वेबसाइट पर नागरिक के मतदाता-पहचान-पत्रसंख्या सहित उसके द्वारा चुने
गए व्यक्तियों के नाम डाल देगा |

5. यदि किसी भी उम्मीदवार को 24 करोड़ मतदाताओं का अनुमोदन/स्वीकृति प्राप्त हो जाता है, तो
मौजूदा लोकपाल अध्यक्ष इस्तीफा दे सकता है (या उसे ऐसा करने की जरूरत नहीं है) और लोकपाल
अध्यक्ष के रूप में सबसे ज्यादा अनुमोदन के साथ व्यक्ति को रख (नियुक्त) कर सकता है |

ये प्रक्रियाएँ आम-नागरिकों द्वारा किसी ईमानदार सरकारी नौकर को पद पर बनाये रखने के लिए भी प्रयोग किये जा सकते हैं यदि वो किसी अफसर द्वारा गलत तरीके से निकाला गया था और एक बेईमान सरकारी नौकर को निकालने के लिए भी जनता इसका प्रयोग कर सकती है |

इसी तरह दूसरे पदों का क़ानून-ड्राफ्ट जो राष्ट्रिय/राज्य स्तर पर हैं जैसे प्रधान-मंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, रिसर्व बैंक गवर्नर , सुप्रीम कोर्ट जज, आदि होगा | केवल `लोकपाल` शब्द को प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि से बदल दें | और धारा नंबर 5 में दी गयी सीमा रेखा में अलग-अलग पद के अनुसार, में अंतर होगा और पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली के उपयोग से , बहुमत मतदाताओं के सहमति द्वारा अंतिम/फायनल होगी |

सम्पूर्ण `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) (टी.सी.पी) ड्राफ्ट

[अधिकारी]

प्रक्रिया

1.   [कलेक्टर (और उसके क्लर्क)]

कोई भी नागरिक मतदाता यदि खुद हाजिर होकर यदि अपनी सूचना अधिकार का आवेदन अर्जी या भ्रष्टाचार के खिलाफ फरियाद या कोई भी हलफ़नामा / एफिडेविट कलेक्टर को देता है तो कोई भी दलील दिये बिना कलेक्टर ( या उसका क्लर्क ) उस एफिडेविट को प्रति पेज 20 रूपये का लेकर सीरियल नंबर दे कर, एफिडेविट को स्कैन करके पधानमंत्री के वेबसाइट पर रखेगा।

2.    [पटवारी (तलाटी, लेखपाल) और उसका क्लर्क]

कोई भी नागरिक मतदाता यदि धारा-1 द्वारा दी गई अर्जी या फरियाद या हलफ़नामा / एफिडेविट पर आपनी हाँ या ना दर्ज कराने मतदाता कार्ड लेकर आये, 3 रुपये का शुल्क लेकर पटवारी नागरिक का मतदाता संख्या, नाम, फोटो, अंगुली के छाप, उसकी हाँ या ना को कंप्यूटर में दर्ज करेगा। नागरिक की हाँ या ना प्रधानमंत्री की वेब-साईट पर आएगी। गरीबी रेखा नीचे के नागरिको से शुल्क 1 रूपये का होगा । बाद में, सुरक्षित मेसेज सिस्टम आने पर ये शुल्क पांच पैसे हो जायेगा |

सुरक्षा धारा (2A ; जिसके कारण ये प्रक्रिया पैसों से, गुंडों से या मीडिया द्वारा खरीदी नहीं जा सकती) – पटवारी नागरिक की हाँ या ना 3 रूपये देकर बदलेगा ।

3.         —————-

ये कोई रेफेरेनडम/जनमत-संग्रह नहीं है | यह हाँ या ना अधिकारी, मंत्री, न्याधीश, सांसद, विधायक, आदि पर अनिवार्य नही होगी। लेकिन यदि भारत के 37 करोड़ नागरिक मतदाता कोई एक अर्जी, फरियाद पर हाँ दर्ज करे तो पधानमंत्री उस फरियाद, अर्जी पर ध्यान दे सकते हैं या इस्तीफा दे सकते हैं या उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है । उनका निर्णय अंतिम होगा।

मांग किये गये इस `जनता की आवाज़` सरकारी हुक्म(राजपत्र अधिनियम) का सार है :-

  1. यदि नागरिक चाहे तो अपनी फरियाद 20 रूपये हर पेज देकर कलेक्टर की कचहरी जाकर एफिडेविट स्कैन करवाकर पधानमंत्री के वेबसाइट पर रखवा सकेगा।
  2. यदि नागरिक चाहे तो 3 रुपये का शुल्क देकर फरियाद पर अपनी हाँ/ना पधानमंत्री वेबसाइट पर दर्ज करवा सकेगा।
  3. हाँ/ना पधानमंत्री पर अनिवार्य नहीं है।

ये पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टमये पक्का करेगा कि नागरिकों की शिकायत/प्रस्ताव हमेशा दृश्य है और जाँची जा सकती है कभी भी ,कहीं भीकिसी के भी द्वारा ताकि शिकायत को  कोई नेत्ताकोई बाबू(लोकपाल आदि) ,कोई जज या मीडिया न दबा सके | और सबूत हो और दब ना सकेइसके लिए प्रक्रिया बहुत जरुरी है |

इस प्रक्रिया के लागू होने से हरेक नागरिक एक रिपोर्टर बन सकता है और हरेक नागरिक एक प्रसारक इसीलिए ये एक वैकल्पिक मीडिया होगाजिसके द्वारा नागरिकों को मुफ्तजाँची जा सकने वाली समाचार मिल सकता है |  

इससे लोगों के नौकरों आदि के सार्वजनिक कार्यों के बारे में भी पता चलेगा और इसकी मदद से कोई भी नागरिक निर्णय कर सकता है कि देश के लिए कौन सा व्यक्ति या कौन सी प्रक्रिया अच्छी या बुरी है |

 

कृपया पूरे क़ानून-ड्राफ्ट के लिए www.righttorecall.info/001.h.pdf  में देखें |

प्रश्न-1) क्या नागरिकों को इस कानून का प्रयोग करने के लिए इंटरनेट की आवश्यकता होगी?

    यह सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला “गलत सवाल” है | मैं इसे गलत सवाल कहता हूँ, क्योंकि इस कानून में नागरिक को किसी प्रकार से इंटरनेट कनेक्शन की आवश्यकता नहीं है | चाहे इंटरनेट हो या नहीं, नागरिक को कलेक्टर के कार्यालय में खुद जाकर अपनी शिकायत या आरटीआई (सूचना का अधिकार) अर्जी/आवेदन देना होगा | चाहे इंटरनेट हो या नहीं है, नागरिक को तलाटी कार्यालय (लेखपाल, पटवारी, ग्राम अधिकारी) में स्वयं जाकर शिकायत या शपथ पत्र पर “हाँ/नहीं” रजिस्टर करना होगा | इस प्रकार इस कानून का इस्तेमाल करने के लिए इंटरनेट की कोई आवश्यकता नहीं है | यह कानून 18 वर्ष की आयु से ऊपर भारत के सभी नागरिकों द्वारा उपयोग किया जा सकता है | अगर किसी के पास इंटरनेट कनेक्शन है, तो वह आसानी से हलफनामों या शपथपत्र(एफिडेविट) को पढ़ सकता है या फिर बिना इंटरनेट के वह व्यक्ति, किसी दूसरे व्यक्ति जिसके पास इन्टरनेट हो, उसके यहाँ जाकर पढ़ सकता है |

(2) पुलिस में भ्रष्टाचार को कम करने में राईट टू रिकाल (प्रजा अधीन राजा (भ्रष्ट को निकालने का अधिकार)) किस प्रकार सहायक है?

अमेरिका के पुलिसकर्मियों में भ्रष्टाचार कम क्यों है (सिवाय नशा संबंधित मामलों में)?

एक और केवल एक कारण यह है जिसकी वजह से अमेरिकी पुलिस में भ्रष्टाचार कम है कि अमेरिका में नागरिकों के पास ऐसी प्रक्रिया/तरीका है जिससे वे अपने जिले के जिला पुलिस कमिश्नर को निकाल सकते है | इसलिए अमेरिका में पुलिस कमिश्नर बहुत कम रिश्वत लेता है और यह भी सुनिश्चित करता है कि उसके कर्मचारी रिश्वत न लेने पायें |

अगर अमेरिका में पुलिस कमिश्नर को पता चले कि उनके कनिष्ठ (जूनियर) कर्मचारी रिश्वत लेता है, तो वह तुरंत एक स्टिंग आपरेशन चला कर सबूत इकट्ठा कर उन्हें निकलवा देता है | क्योंकि उसे भय है कि अगर जूनियर स्टाफ में भ्रष्टाचार बढ़ जायेगा, तो नागरिकों उसे निष्कासित कर सकते हैं |

नशा संबंधित मामलों में अमेरिकी पुलिस में भ्रष्टाचार है क्योंकि अमेरिका में नशे सम्बंधित कानून बहुत बुरे हैं |

लेकिन भारत में नागरिकों के पास पुलिस प्रमुख को निकालने करने की कोई प्रक्रिया/तरीका नहीं है, इसी कारण पुलिस प्रमुख न केवल रिश्वत लेता है, बल्कि वह अपने जूनियर से भी अधिक से अधिक रिश्वत लेने के लिए भड़काता है | एक आम पुलिस कमिश्नर रिश्वत की आधी रकम स्वयं रखकर बाकी आधी ,विधायकों, गृह मंत्री और मुख्यमंत्री को पहुंचा देता है |

पाठकों, आपको यह जानकारी क्यों नहीं मिल पाती कि अमेरिकी नागरिक अपने पुलिस प्रमुखों को निकालने का अधिकार रखते हैं? क्योंकि EIIs (EII = भारत के प्रिसिद्ध बुद्धिजीवी = Eminent Intellectuals of India) भारतीय नागरिकों को यह पता नहीं चलने देना चाहते हैं कि “अमेरिकी नागरिकों के लिए जिला पुलिस प्रमुखों को निकालने की प्रक्रिया/तरीका है” ,नहीं तो भारत के नागरिक भी ऐसी प्रक्रियाओं/तरीकों की मांग करने लगेंगे |

(3) प्रजा अधीन राजा (भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा निकालना का अधिकार) को सुरक्षित बनाने के लिए तथा फर्जी मतदान को कम करने के लिए भविष्य में क्या प्रयास किये जायेंगे ?


      आगे चलकर, निम्न सुविधाएँ इस प्रस्ताव में शामिल हो जाएँगी | इन सुविधाओं द्वारा “फर्जी मतदान” को रोका जा सकेगा और साथ ही यह बहस कि ” फर्जी मतदान के कारण यह कानून कभी लागू नहीं होना चाहिए” का उत्तर दिया जा सकेगा |

1. नागरिकों की उंगलियों के निशान कंप्यूटर में रखा जाएगा ताकि कंप्यूटर अंगुलि-छाप का उपयोग
करते हुए मतदाता को सत्यापित (जांच द्वारा सही ठहराना) कर सकेगा |
2. एक कैमरा को पटवारी के कंप्यूटर से जोड़ा जाएगा जिससे वह नागरिक की उंगलियों के निशान और
तस्वीर स्कैन करके जमा कर सके तथा ये सब जानकारी और उसकी स्वीकृति रसीद पर डाल सके |
इस तरह एक व्यक्ति अगर कई सारे “हाँ/नहीं” दर्ज करवाएगा, तो उसे खोजना और गिरफ्तार करना
आसान हो जाएगा |

3. हर नागरिक को एक पासबुक दी जाएगी जिसमे उसके द्वारा पंजीकृत सभी हां/नहीं की सूची (लिस्ट)
होगी | यदि किसी ठग ने उसके स्थान पर हां/नहीं दर्ज कराई होगी, तो उस नागरिक को इसके बारे
में पता चल जाएगा |
4. प्रत्येक नागरिक को हर महीने एक सूची (स्टेटमेंट) प्राप्त होगी जिसमे वह पिछले छह महीने में स्वयं
द्वारा पंजीकृत हाँ/नहीं देख पायेगा | इसलिए यदि किसी ठग ने उसके स्थान पर हाँ/नहीं  दर्ज कराई
होगी, तो इसके बारे में उसे पता चल जाएगा |
5. अगर नागरिक चाहे तो वह अपना मोबाइल फोन नंबर रजिस्टर करवा सकता है और जब भी वह
हाँ/नहीं रजिस्टर करेगा तो उसे एस.एम.एस आएगा | यदि किसी ठग ने उसके स्थान पर हां/नहीं दर्ज
कराई होगी, तो इसका पता उसे तुरंत चल जाएगा |
6. अगर नागरिक चाहे, तो वह अपने ई-मेल का पता रजिस्टर करवा सकता है और जब भी वह हाँ/नहीं
रजिस्टर कराएगा तो उसे ई-मेल प्राप्त होगा | इसलिए यदि कोई ठग ने उसके स्थान पर हां/नहीं दर्ज
कराई होगी, तो उसे इसके बारे में तुरंत पता चल जाएगा |

इस प्रकार हां/नहीं पंजीकरण बैंक के खाते से भी अधिक सुरक्षित हो जाएगी | इन सुरक्षा के उपायों द्वारा फर्जी मतदाता पांचवीं या छटवी बार प्रयास करने पर पकड़ा जाएगा और इससे फर्जी मतदाताओं की संख्या कम हो जाएगी | अब 1% हां/नहीं फर्जी हो सकता है, और इसलिए सभी 72 करोड़ मतदाताओं को पंजीकृत करने की अनुमति नहीं दी जाना चाहिए – ऐसा तर्क बेकार है |

(4) क्यों प्रख्यात / नाम वाले बुद्धिजीवी (EII) इस प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकालमांग का विरोध करते हैं ?

प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल ; भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार) मांग को पूरी करने के लिए सैकड़ों करोड़ों रुपए की आवश्यकता नहीं है, न ही हजारों कर्मचारियों या इमारतों की आवश्यकता है | नागरिकों द्वारा अर्थ लगाये हुए हमारे संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री को यह अधिनियम (नियम) लागू करने में विधायकों की मंजूरी की भी जरूरत नहीं है | अभी तक सभी दलों के सांसदों और सभी प्रसिद्द बुद्धिजीवी इस प्रस्तावित सरकारी अधिसूचना के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं | सभी दलों के नेताओं को इस प्रस्ताव से नफरत है और उनके मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री ने प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) की मांग पर हस्ताक्षर न करने की कसम खाई है | क्यों? क्योंकि बदलाव की प्रक्रिया तब होती है जब करोड़ों देशवासी बदलाव चाहते हैं और जब प्रत्येक देशवासी को यह विश्वास हो जाता है कि करोड़ों देशवासी उसके साथ हैं तब यह प्रक्रिया रोकी नहीं जा सकती है | मुझे इस वाक्य को दोहराने दिया जाए कि पिछले 3000 साल में सभी प्रमुख बदलावों के पीछे यही प्रक्रिया रही है-

   बदलाव की प्रक्रिया तब होती है जब करोड़ों देशवासी सहमत / राजी होते हैंऔर करोड़ों देशवासियों को पता होता है कि अन्य करोड़ों देशवासी भी सहमत हुए हैं |

“करोड़ों देशवासी क्या चाहते हैं, वो जानकारी करोड़ों देशवासियों को हो ” यह “राजनीतिक अंकगणित में शून्य ” के सामान है | बुद्धिजीवियों और मीडिया आम देशवासी को हमेशा यह मनाने की कोशिश करती है कि वह बिल्कुल अकेला है और अन्य करोड़ों देशवासी अनजान और सो रहे हैं | प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) न केवल नागरिकों को किसी प्रस्तावित परिवर्तन पर हाँ / नहीं करने में सक्षम बनाता है, बल्कि यदि करोड़ों देशवासी एक बदलाव के लिए सहमत हो गए हैं, तो अन्य करोड़ों देशवासियों को भी पता चलता है कि करोड़ों देशवासी यह परिवर्तन चाहते हैं | यह मीडिया मालिकों को ऐसी अफवाह/गप कि – “लोगों को परवाह नहीं है” बनाने नहीं देता है | प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) मीडिया के मालिकों की करोड़ों देशवासियों की प्राथमिकताओं / जरूरतों को दूसरों को गलत बताने की शक्ति कम करता है |

(5) क्या इससे धनवान व्यक्तियों के लिए नागरिकों को खरीदना संभव नहीं होगा?

अगर ऐसा माना जाए कि गरीब अपने वोट बेचते हैं, तो क्यों कभी गरीब क्षेत्रों में 60% से अधिक मतदान नहीं होता? और क्यों अधिकतर अमीर प्रत्याशी जीतने के बजाये हारते हैं ? मेरा मुद्दा यह है: अगर किसी को पैसा दिया जाता है, वह उसे ले सकता है, लेकिन सब जानते हैं कि मतदान गोपनीय है, और इसलिए वे उस पार्टी/व्यक्ति को वोट देते हैं जिसे वे सबसे कम नफरत करते है |

वोट के लिए दिया गया पैसा बूथ के अंदर कोई फर्क नहीं डालता, और जो प्रक्रियाएँ/तरीके हमने प्रस्तावित किये हैं उसमें लिखा है कि नागरिक अपना अनुमोदन/स्वीकृति किसी दिन भी बदल सकता है | इसलिए यदि कोई अनुमोदन के लिए 100 रुपये देता है, तो उसे वह 100 रुपये हर सप्ताह देना पड़ेगा और इस तरह वह जल्दी ही पैसे से कंगाल हो जायेगा |

इस तरह धनवान नेता अगर नागरिकों को खरीदकर अपने व्यक्ति को लोकपाल के रूप में रखवा सकता, तो उसे 37 करोड़ नागरिकों को घूस देना होगा | यदि वह प्रति नागरिक 200 रुपये भुगतान करता है तो उसे 7400 करोड़ रुपये का भुगतान उनकी एक `हां` पाने के लिए करना पड़ेगा | बाद में देशवासी अपने अनुमोदन को कभी भी बदल सकते हैं, तो प्रभावशाली नेताओं को फिर से रु. 7400 करोड़ की घूस देनी होगी | इस तरह कुछ ही दिनों में वह कंगाल हो जायेगा | इस प्रकार प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) पैसों से प्रभावित नहीं की जा सकती है |

5 साल में एक बार आने वाले चुनाव में मतदाताओं को खरीदना संभव हो सकता है, लेकिन प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) कानून के अनुसार, मतदाता अपनी स्वीकृति / अनुमोदन किसी भी दिन बदल सकते हैं, और इसलिए पैसों से खरीदना असफल हो जायेगा क्योंकि कोई भी लाखों और करोड़ों नागरिकों को खरीदने तथा उनको काबू करने में उपयोगी इतने अपराधियों को पैसा देने की क्षमता नहीं रखता है |

1974 में, जब सिर्फ कुछ 1000 छात्रों ने सड़कों पर आकर गुजरात के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल से इस्तीफे की मांग की थी, तो चिमनभाई पटेल ने हर प्रकार से अपनी कुर्सी की रक्षा करने का प्रयास किया था परन्तु असफल हो गए थे क्योंकि आवश्यक पैसा और व्यस्था का प्रबंध करना संभव नहीं था| यहां तक कि ताकतवर इंदिरा गांधी ने देखा की तीन लाख से ज्यादा छात्र कैदी जेल में भर गए हैं और जेल टूटने का खतरा बन गया है | उदाहरण के रूप में नंदीग्राम में, बुद्धदेव भट्टाचार्य अपने सारे अपराधियों के बल के बावजूद, किसानों को भूमि बेचने के लिए मजबूर नहीं कर पाए | यह सिर्फ हकीकत है कि — किसी भी नेता में इतनी शक्ति और ताकत नहीं है की वो 2 % जनसंख्या के विरुद्ध भी कुछ कर पाए |

(6) क्या यह कानून असंवैधानिक है?

यह कानून किसी रूप में असंवैधानिक नहीं है क्योंकि अगर जनता किसी दूसरे लोकपाल अध्यक्ष को समर्थन देती है तो मौजूदा लोकपाल अध्यक्ष को इस्तीफा देने के लिए बाध्यकारी/जरूरी नहीं है परन्तु कोई भी, जनता के इतने भारी दबाव का विरोध नहीं कर सकता | इसीलिए यह कानून संविधान के किसी कानून के खिलाफ नहीं जाता है |

अगर आपको लगता है की प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) असंवैधानिक है, तो प्रजा अधीन राजा-लोकपाल (राईट टू रिकाल-लोकपाल) या अन्य राईट टू रिकाल का क़ानून-ड्राफ्ट की कौन सी धारा आपकी राय में संविधान के कौन से अनुच्छेद के खिलाफ है, बताएं ?

(7) क्या लोकपाल अध्यक्ष या राईट टू रिकाल प्रक्रिया से आम-नागरिकों द्वारा बदला जा सकने वाला जनता का नौकर हर हफ्ते बदल दिया जायेगा ?

जी नहीं, हर सप्ताह लोकपाल अध्यक्ष नहीं बदला जाएगा | कई कंपनियों में, मालिकों के लिए कर्मचारियों को निकालने की शक्ति होती है – इसका मतलब यह नहीं की वह मालिक हर दिन कर्मचारियों को निकालता है | इसके बजाय अधिकांश मालिक स्थिर कर्मचारियों को चाहते हैं जब कर्मचारी जानबूझकर भयानक नुकसान करते है तभी उन्हें निकाल दिया जाता है | जनता इस प्रक्रिया/तरीके को कमपसंद लोकपाल अध्यक्ष या एक ऐसा लोकपाल अध्यक्ष जिससे अनजाने में भूल हो गयी हो – उसे निकालने के लिए नहीं प्रयोग करेगी |

वे इसे केवल तब उपयोग करेंगे जब उन्हें लगेगा कि लोकपाल अध्यक्ष पूर्ण-भ्रष्ट और देश-विरोधी नागरिक है और वे 3 रुपए देने को तैयार हो जाएँगे | इस प्रकार , जनता का भ्रष्ट को बदलना तभी हो सकता है जब जनता में उस व्यक्ति के प्रति तीव्र घृणा हो और उस व्यक्ति ने जनता के खिलाफ बहुत बड़ी धोखाधडी की हो, न की छोटी-मोती भूल चुक से | साथ ही गरीबों के लिए यह शुल्क 1 रुपया होगा |
अमेरिका में 20 राज्यों में राज्यपालों के लिए जनता द्वारा हटाने की प्रक्रिया है | उन राज्यों में पिछले 100 वर्षों में 20 * 100/4 = लगभग 500 राज्यपाल देखे होंगे | उनमें से कितनो को हटाने के लिए चुनाव का सामना करना पड़ा?

केवल तीन | और कितने राज्यपाल वास्तव में हटाये गये? केवल एक ही है | इस तरह का तंत्र कोई अस्थिरता नहीं बनाता है | लेकिन अमेरिका के सब राज्यपाल पर एक अव्यक्त खतरा है जो देश के शीर्ष पद धारकों के इमानदार होने का एक महत्वपूर्ण कारण है |

प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) द्वारा देश के आम-नागरिकों को मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री पर विशाल शक्ति प्राप्त होती है | अब तक, हमने जनाधार प्राप्त अधिकारियों/बाबूओं को देखा है लेकिन उनमें से कोई भी जनता के दबाव में नहीं रहा है | बदलाव की प्रक्रिया लोकपाल पर एक जन-दबाव बनाएगी | आज के रूप में सभी बाबू जानते हैं कि वे 5 साल तक , नौकरी से निकाले नहीं जा सकते हैं और इस तरह वह नागरिकों को मनमाने ढंग से रखते हैं | लेकिन इस प्रक्रिया के साथ, वह नौकरी से हटाये जाने के भय से आज के बाबूओं की तुलना में बेहतर बर्ताव करेंगे |

(8) क्या प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकालपश्चिम से अपनाया गया कानून है ?

नहीं |

अथर्ववेद में प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) लिखा है | अथर्ववेद का यह कहना है कि नागरिकों की जनसभा, अगर चाहे तो राजा को हटा सकती हैं | सत्यार्थ प्रकाश के अध्याय-6 में महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने राज धर्म का अर्थ किया है, और पहले 5 श्लोकों में ही, महर्षि कहते हैं – राजा को “प्रजा-अधीन” होना चाहिए | और अगले ही श्लोक में महर्षि का कहना है कि यदि राजा प्रजा-अधीन नहीं है, तो ऐसा राजा राष्ट्र और प्रजा को वैसे ही अन्यायपूर्ण तरीके से डंडा और जुर्माना डालेगा और खा जायेगा जैसे कि एक मांसाहारी जानवर जंगल के अन्य जानवरों को खा जाता है | महर्षि सरस्वतीजी ने दोनों श्लोकों को अथर्ववेद से लिया है | और कृपया ध्यान दें – यहाँ “राजा” शब्द अर्थात सरकारी राज-कर्मचारी है जो पटवारी से लेकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश क सभी शामिल होते हैं और जो देश की व्यवस्था ठीक रखने के लिए रखे जाते हैं , नागरिकों द्वारा | सरकार के सभी कर्मचारियों को प्रजा-अधीन रहना चाहिये, नहीं तो वे नागरिकों को लूटते चले जायेंगे | भारत में ज्यादातर बुद्धिजीवियों ने अथर्ववेद और सत्यार्थ प्रकाश के ठीक उलटी बात पर जोर दिया है |

ज्यादातर बुद्धिजीवियों का कहना है कि राजा और राज-कर्मचारी यानी सरकारी कर्मचारियों को प्रजा-अधीन नहीं होन चाहिए, बल्कि केवल संविधान के अधीन यानी सिर्फ संविधान पर ही निर्भर होना चाहिए | यह संविधान के अधीन की पूरी व्यवस्था / अवधारणा फर्जी है क्योंकि `संविधान के अधीन` राजा और  `संविधान के अधीन` मंत्री, अधिकारी, पुलिसकर्मी और जज जब चाहे अपनी इच्छा से संविधान के अर्थ को मोम की तरह मरोड़ सकते है |

(9) पहले राईट टू रिकाल को अपने संगठन जैसे की भारत स्वाभिमान में लागू करके देखना चाहिए उसके बाद ही इसका सच्चा स्वरुप सामने आ पायेगा |

मुझे कोई रूचि नहीं है (राईट टू रिकाल) प्रजा अधीन राजा/शाशक (आर .टी .आर) लगाने की, कोई भी गैर सरकारी संस्था पर | क्यों ? हर नागरिक के पास समान अधिकार होते हैं सरकार पर | लेकिन एक संगठन में हर सदस्य के पास समान अधिकार नहीं होते | उदाहरण के तौर पर मैं भारत स्वाभिमान न्यास में स्वामी रामदेव जी या कोई वरिष्ट सदस्य जितने अधिकार नहीं रख सकता या रिलायंस में एक कर्मचारी के मुकेश अम्बानी जितने अधिकार नहीं हो सकते | हमारे पास राष्ट्र में समानता होनी चाहिए लेकिन संगठन के अंदर ये आवश्यक नहीं है | मैं राईट टू रिकाल को भारत स्वाभिमान न्यास में होने का विरोध नहीं करता लेकिन मैं उसकी मांग भी नहीं करता क्योंकि मेरे पास कोई अधिकार नहीं है `भारत स्वाभिमान न्यास या कोई संगठन में आर.टी.आर.की मांग` करने के लिए क्योंकि मेरी भूमिका संगठन को बनाने में ना के बारबार है वरिष्ट सदस्यों के मुकाबले |

(10) (i) प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) केवल शिक्षित वर्ग के साथ काम करता है लेकिन अधिक जनसंख्या गांव में रहती है | शिकायत दर्ज करने के लिए सैंकडों किलोमीटर जाना होगा पटवारी/तहसीलदार/ कलेक्टर के दफ्तर के लिए | ये दफ्तर दलाल और गुंडों का अड्डा है | एक बेचारा दूर-दराज इलाकों में अपनी शक्ति, समय,पैसा खर्च करेगा और फिर इन अनैतिक लोगों का आसान शिकार होगा |

(ii) इससे लालफीताशाहीअफसरशाही और उच्चवर्ग-वाद को बढ़ावा नहीं मिलेगा?

(i)  बाद में कोई भी व्यक्ति प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) की शिकायत किसी भी कलेक्टर के दफ्तर, किसी भी तहसीलदार के दफ्तर, किसी भी मैजिस्ट्रेट की कचेहरी, कोई भी उप-रजिस्ट्रार(उप-पंजीयक) के दफ्तर से कर सकता है  |


मैंने एक मोटा अनुमान लगाया है : भारत का क्षेत्र-फल 32,87,590 वर्ग किलोमीटर है | यदि इसको 2,65,000 ग्राम पंचायतों से भाग कर दें, तो सामान्य क्षेत्र-फल 12.5 वर्ग किलोमीटर है, जो 3.5 किलोमीटर का वर्ग है | यदि पटवारी / लेखपाल का दफ्तर केन्द्र में है, तो सबसे दूर रहने वाला व्यक्ति , कोने में होगा , जो कुछ 3 किलोमीटर की दूरी पर होगा | इस तरह पटवारी का दफ्तर 3-5 किलोमीटर की दूरी पर होता है, ज्यादातर मामलों में |

(ii)  यहाँ कोई लाल फीता-शाही नहीं है क्योंकि अफसरों को कोई  स्वनिर्णयगत (अपना खुद का स्वतंत्र निर्णय लेने की ) शक्ति नहीं होगी `ना` बोलने के लिए  | और मानें कि कोई अपनी शिकायत एक जिले में नहीं दर्ज कर सकता हो , तो वो अपने मित्र को बोल सकता है शिकायत दर्ज करने के लिए भारत के 700 जिलों में से कोई भी एक में |

प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) में आवश्यक है कि व्यक्ति जो शिकायत रख रहा है, उसके अंगुली के छाप और फोटो भी लिया जायें | कोई भी दफ्तर जिसमें राजपत्रित अधिकारी (स्टैम्प मारने वाला अधिकारी) हो या अधिकारी व्यक्तियों को सत्यापित करने (जाँच द्वारा सही ठहराना) के लिए अधिकृत हो प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) के आवेदन ले सकता है  |

(11) प्रधानमन्त्री ये इस कानून को पारित नहीं कर सकते केवल किसी भी कानून के बिना, अधिसूचना द्वारा | यदि यह किसी भी कानून की आवश्यकता नहीं है तो क्यों कोई आगामी प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री इसे दूर नहीं होगा एक नई अधिसूचना या हस्ताक्षर से यह संशोधन नहीं करेगा (बदल नहीं सकता) ?

आप एक मसौदा (क़ानून-ड्राफ्ट) कैसे लागू करोगे जब 90% सांसद भ्रष्ट हैं? क्या सांसद सार्वजनिक हित के किसी भी क़ानून-ड्राफ्ट का विरोध नहीं करेंगे और प्रधानमंत्री को नहीं हटाएंगे?

प्रधानमंत्री और 2-8 शीर्ष नेता दलबदल विरोधी कानून का उपयोग करते हुए कुछ ही घंटों के भीतर किसी भी कानून को बदल सकते हैं और कोई सांसद विरोध नहीं करेगा | उदाहरण के लिए,  2009-चुनाव के ठीक पहले सांसदों को प्रधानमंत्री और शीर्ष नेताओं ने मजबूर किया था एक दिन में 12 कानून पारित करने के लिए ! और प्रधानमंत्री (मंत्रिमंडल) को आपातकाल की घोषणा करने और हर क़ानून और पूरे संविधान को बाजू रखने की सत्ता है | ये एक बार हुआ और फिर से हो सकता है |

अंत में एक कानून के मसौदे (ड्राफ्ट) को समर्थन मिलता है या नहीं इसपर निर्भर करता है कि क्या लोग इसे उपयोगी पाते हैं ? यदि लोग कोई क़ानून को बहुत उपयोगी पाते हैं, तब प्रधान मंत्री को उस कानून का ड्राफ्ट (मसौदा) रद्द करने की क्या कीमत क्या है का अहसास होगा- नागरिकों द्वारा हिंसक कार्रवाई करने के लिए खुला निमंत्रण |

ये ही कारण है कि मैं प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) को लागू करने के लिए आंदोलन चाहता हूँ | यदि कोई कानून नागरिकों द्वारा आंदोलन के माध्यम से आता है, तो और अधिक मुश्किल होगा कोई प्रधानमंत्री को रद्द करने के लिए |

कुछ सरकारी अधिसूचना मंत्रिमंडल द्वारा पारित के लिंक –
1) http://ssa |nic |in/national-mission/government-of-india-notification/notification-f-2-4-2000-ee-3-dated-january-19-2005/
2)  ‎http://www |mit |gov |in/content/government-notifications-enabling-e-services
3) http://www |maharashtra |gov |in/english/webRing/pdf/gazette569 |pdf
प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) एक सरकारी अधिसूचना है | सरकारी अधिसूचना प्रधानमंत्री (मंत्रिमंडल) द्वारा हस्ताक्षरित किया जा सकता है सांसदों की मंजूरी के बिना | बाद में, सांसद उस सरकारी अधिसूचना और प्रधानमंत्री को निकालें ऐसा हो सकता है, इसीलिए मैं जन आंदोलन के लिए बोल रहा हूँ प्रधानमंत्री को प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) की प्रक्रिया पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करने के लिए | मैं चुनाव और चुनाव परिणामों पर निर्भर नहीं रहना चाहता , प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) को हस्ताक्षर करवाने के लिए |

(12) शिकायत को दर्ज करने के लिए हमें अलग विभाग चाहिए | यह कलेक्टर के माध्यम से या उसके क्लर्क से या यहाँ तक कि पटवारी द्वारा नहीं किया जा सकता जो पहले ही उनपर काम का भोज ज्यादा है और जिनका काम (नौकरी विवरण) अलग है |

एक बार प्रधानमंत्री (मंत्रिमंडल) प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) पर हस्ताक्षर कर देता है , ये कार्य डीएम (कलेक्टर) और पटवारी के काम (नौकरी वर्णन) का हिस्सा बन जाएगा | शिकायत दर्ज करना खुद कलेक्टर द्वारा नहीं, उसकी क्लर्क द्वारा होगी | जिला स्तर पर सभी प्रत्यक्ष(सीधे) या परोक्ष (छुपे) रूप से विभाग डीएम के अंतर्गत आते हैं | अगर डीएम पर ज्यादा भोझ है, वह हमेशा तथाकथित “डीएम अतिरिक्त” या “सहायक डीएम” के लिए पूछ सकते हैं | और अंत में, काम कोई कार्यकारी मजिस्ट्रेट या क्लर्क द्वारा किया जाएगा और वह और अधिक क्लर्क रख सकता है यदि उसे जरुरत है तो |

अब एक पन्ने के स्कैनिंग और अपलोड के लिए 5 मिनट लगते हैं | तो अगर वहाँ कोई भीड़ नहीं है, एक क्लर्क पर्याप्त है | यदि भीड़ अधिक है, तो एक घंटे में फिर क्लर्क 12 पृष्ठों का स्कैन और अपलोड कर सकता है, और एक दिन में, वह कुछ 100 पृष्ठों अपलोड कर सकता है | तो प्रति दिन एकत्र आमदनी (राजस्व) 2000 रुपये है | यह वेतन का भुगतान और सभी लागत को पूरा करने के लिए पर्याप्त है | और धारा-2 के लिए, यदि पटवारी पर ज्यादा भार है, इस काम के लिए डीएम, पटवारी के कार्यालय में एक क्लर्क रख सकता है | तीन रुपये शुल्क क्लर्क का वेतन सहित सभी लागत को पूरा करेगा |

(13) 40-50% लोग बाहर वोट करने के लिए नहीं आते हैं | तोकैसे यह प्रणाली काम करेगी ?

2004 में कुछ 60% लोगों ने वोट दिया | और 2009 में वोट का प्रतिशत लगभग समान था | और लोग इसी लिए वोट ज्यादा नहीं देते क्योंकि वे सभी जीतने योग्य प्रत्याशियों को एक समान देखते हैं- या तो उतना ही अच्छे या उतने ही बुरे और वोटर के पास किसी भी दिन भ्रष्ट को बदलने का अधिकार नहीं है | इसीलिए वोटर की रूचि वोट डालने के लिए कम है |

और प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) में पद से निकालने की धमकी अकेले ही भ्रष्टाचार को कम करने के लिए काफी है |
और ये भी एक तथ्य है कि सूची में 5-10% लोग या तो अपने चुनाव क्षेत्र से दूर होते हैं उस दिन, या मृत होते हैं, तो टी.सी.पी / आर.टी.आर. में क्योंकि किस भी दिन वोटर अनुमोदन दे सकता है , इसीलिए वोट का प्रतिशत 90 % तो हो सकता है |
और अनुमोदन करने का प्रतिशत इस पर भी निर्भर करेगा कि एफिडेविट लोगों के सीधा हित का है कि नहीं | उधाहरण, यदि कोई एफिडेविट डाले कि मुझे प्रधानमंत्री बना दो, तो शायद ही कोई अनुमोदन देगा लेकिन यदि एफिडेविट में लिखा है कि नरेन्द्र मोदी (या कोई अच्छा काम करने वाले नेता) को प्रधानमंत्री बनाओ, तो अनुमोदन की संख्या करोडों होंगी |

(14) आम आदमी किसी को हटाने और रखने के लिए निर्णय नहीं कर सकताकेवल जिनके पास कानून का ज्ञान है, वो फैसला कर सकते हैं |

अधिकारियों / बाबुओं (नौकरशाहों) के काम (प्रदर्शन) का अंदाजा (मूल्यांकन) कौन करेगा जब 80 करोड़ से अधिक व्यक्ति 20 रुपये प्रतिदिन पर जीवित हैं ? उन्हें इस प्रदर्शन के अंदाजा (मूल्यांकन) के काम करने की उम्मीद हम कैसे कर सकते हैं?

  क्या तरीके (प्रक्रिया) और स्तर (मानक) आप नोडल अधिकारियोंबाबूओं (नौकरशाहों) आदि के प्रदर्शन का अंदाजा (मूल्यांकन) के लिए प्रस्ताव करते हैं ?

आम आदमी की परिभाषा है वो व्यक्ति जिसके पास कोई राजनैतिक सम्बन्ध नहीं हैं और प्रायः गरीब होता है या मध्य-वर्गीय होता है और जो 95% या अधिक भारतीय होते हैं | हर आम आदमी को जानकारी है कि कौन सा नेता भ्रष्ट है और अपना काम सही तरह से नहीं कर रहा है | केवल उसके पास अधिकार/सत्ता नहीं है अपने निर्णय देने के लिए | क्या आप सोचेते हैं कि आम आदमी के पास इतना कम बौद्धिक स्तर है कि वे यह नहीं जान सकते कौन भ्रष्ट है ?

आम लोगों को पता है कि उनके पुलिस-कमिश्नर, जिला शिक्षा अधिकारी, जिला राशन अधिकारी आदि भ्रष्ट हैं या नहीं | वे व्यावहार की बुद्धि से जायेंगे, उदाहरण से यदि उन्हें मिट्टी का तेल 9.5 लीटर मिलता है 10 लीटर के बजाय, वे शायद बर्दाश्त करेंगे | लेकिन अगर राशन 9 लीटर से नीचे चला जाता है, जिला राशन अधिकारी बदल दिया जाएगा | दूसरे शब्दों में, रोज के अनुभव के आधार पर आम-नागरिक बहुत अच्छे से निर्णय कर पाएंगे कि उनके अधिकारी कितना अच्छा या बुरा कर रहे हैं |

प्रस्तावित प्रक्रिया/तरीके में जिला शिक्षा अधिकारी आदि को बदलने के लिए, हर नागरिक अपना स्तर (मानक) प्रयोग करता है और बहुमत के सामान्य बुद्धि (विवेक) के आधार पर बदलने का फैसला किया जाता है | प्रस्तावित बदलने कि प्रक्रिया की लागत, टैक्स देने वालों पर शून्य आती है | यह प्रशासन में कोई अस्थिरता का कारण नहीं बनता है | बदलने/पद से हटने का डर काम/प्रदर्शन में सुधार लाएगा और भ्रष्टाचार कम हो जाएगा |

(15) क्या यह एक जनमत संग्रह है ?

यह जनमत संग्रह नहीं है क्योंकि एक जनमत संग्रह में एक बार वोट या अनुमोदन डालने पर व्यक्ति उसे बदल नहीं सकता | इसके अलावा, यहाँ एक व्यक्ति पांच प्रत्याशियों को अनुमोदन दे सकता है | इससे मतदाताओं को खरीदने की संभावना समाप्त हो जाती है | पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली इन्हें कारणों से जनमत-संग्रह से कही ज्यादा श्रेष्ट है |

(16) प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) हम कैसे ला सकते हैं ?

प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) बहुत आसानी से पारित कर सकते हैं `जनता की आवाज़- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली` (टी.सी.पी) सरकारी-आदेश द्वारा, उधम सिंह प्रेरित, कार्यकर्ता-संचालित, ड्राफ्ट आधारित (नेता-आधारित नहीं) आपातकाल-विरोधी तरीके के जन-आन्दोलन द्वारा | एक बार जन-आन्दोलन द्वारा आम-नागरिक, कार्यकर्ता मजबूर कर देते हैं प्रधानमंत्री को भारतीय राजपत्र में ये सरकारी आदेश डालने के लिए, तो अगले दिन कोई भी कलेक्टर के दफ्तर जाकर राईट टू रिकाल का ड्राफ्ट एफिडेविट दे सकता है ताकि वो प्रधानमंत्री के वेबसाइट पर आये और जन-समूह के समर्थन और दबाव से राईट टू रिकाल आसानी से बहुत जल्दी आ जायेगा |
लेकिन `जनता की आवाज़` सरकारी-आदेश के बिना, सदियाँ लग जाएँगी , प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) पास करने में | दूसरे शब्दों में, समय `जनता की आवाज़` पारित करने के लिए यदि `स` है तो समय प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल)`जनता की आवाज़` द्वारा पारित करने के लिए `स+3` महीने हैं  | जबकि प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) बिना `जनता की आवाज़` के पारित करने का समय (10*स) है  | कारण कि प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल) का ड्राफ्ट (मसौदा) 2-6 पन्ने लंबा है और अधिक समय लग जायेगा एक कार्यकर्ता को से दूसरे कार्यकर्ता से संवाद करने के लिए | जबकि `जनता की आवाज़` द्वारा एक कार्यकर्ता दूसरे कार्यकर्ता से एक ही दिन में संपर्क कर सकता है |

(17) हमारे पास जनता की शिकायतें को संभालने का सिस्टम (तंत्र) है और आखिर में कोर्ट है लेकिन असली समस्या नागरिकों में जागृति की कमी है  |

ये सोच / निदान बहुत गलत है | आप पीड़ित को दोषी ठहरा रहे हैं | आपका यह कहना कि “पीड़ित में जागृति नहीं है और इसीलिए समस्याएं हैं |” यह कहना तो ऐसा कहना होगा की यदि महिलाओं का बलात्कार हो और उसका कारण महिलाओं में जागृति की कमी है और इसीलिए महिलाएं दोषी हैं | मैं पूरी ताकत से “पीड़ित दोषी है” के तर्क का विरोध करता हूँ | अदालतों की नाकामी का कारण जजों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और जजों में बड़े पैमाने पर भाई-भतीजावाद है |
हमने देखा था कि सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान जज, खरे ने बच्चों का यौन शोषण करने के दोषी पाने वालों को जमानत दे दी, जिससे वे भारत से भाग गए थे | और हमने ये देखा था कि प्रधान-जज अहमदी ने भोपाल मामलों में आरोपित के विरुद्ध आरोप कम कर दिया था | ये मामले जागृति के कमी के कारण नहीं है लेकिन केवल माननीय सुप्रीम-कोर्ट के जजों में व्याप्त भ्रष्टाचार है | और जज बिना रोक-टोक से रिश्वत लेते हैं क्योंकि हम आम-नागरिकों के पास जजों को निकालने की प्रक्रिया नहीं है और हम नागरिकों के पास जजों को बहुमत वोट का उपयोग कर मृत्यु दण्ड देने की प्रक्रिया नहीं है |
मैंने 100% संवैधानिक, मान्य तरीकों का प्रस्ताव किया है जिसके प्रयोग से हम आम-नागरिक (भ्रष्ट) मंत्रियों, बाबू, पोलिस-कर्मी, जजों को निकाल सकते हैं, बंदी बनाना या (भ्रष्ट को) मृयु-दण्ड भी देना बहुमत वोट का उपगोग करके | `जनता की आवज़` एक सरल साधन है ये तरीके/प्रक्रियाओं को लागू करने के लिए | वही `जनता की आवाज` की शक्ति है | `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) एक साधन है अनेक क़ानून लागू करने के लिए |

(18) कौन ये अनेक मुद्दे, शिकायत आदि आम जनता तक पहुँचायेगा और इसके लिए पूंजी कहाँ से आएगी?

जो पहुँचाना चाहते हैं पहुंचाएंगे | उदाहरण के लिए, जब कोई चुनाव लड़ता है, तब ये सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी कि लोगों को उसके घोषणा पात्र मिल जाये उसपर है, सरकार पर नहीं | और कोई बात फैलेगी कि नहीं निर्भर करती है कि एफिडेविट में वो बात आम-नागरिकों के हित की है कि नहीं | जैसे `सेना और नागरिकों के लिए खनिज आमदनी` का ड्राफ्ट बहुत तेजी से फैलेगा मूंह-जुबानी, पर्चे, विज्ञापन आदि द्वारा क्योंकि इससे उनको उनके हक का महीने का 400-500 रूपया मिलेगा | इसलिए ये एफिडेविट बहुत कम प्रचार और बहुत कम खर्चे से, आसानी से फ़ैल जायेगी |

(19) शब्द  कर सकता है या करने की जरूरत नहीं है“  का मतलब क्या है ? “प्रधानमंत्री इस्तीफा दे सकते हैं ” का क्या मतलब है ?
इतना प्रयास करने का कोई अर्थ / मतलब नहीं है जब ये क़ानून बाध्य / बंधनकर्ता नहीं है |

यदि 50 करोड़ नागरिक हाँ दर्ज करते हैं क़ानून-ड्राफ्ट पर, और प्रधानमंत्री उस ड्राफ्ट पर हस्ताक्षर नहीं करने का निर्णय लेता है और पद छोड़ने का निर्णय नहीं लेता है, तो वो अंतिम प्रधानमंत्री होगा जो ऐसा निर्णय लेता है | इसके परिणाम में होने वाली घटनाएं पक्का करेंगे कि भविष्य में कोई प्रधानमंत्री नागरिकों की अवहेलना/नजरंदाज नहीं करेगा |
उदाहरण से,1650 में अंग्रेज राजा ने वहाँ की सांसद की अवहेलना की थी जो नागरिकों की केवल 4% प्रतिशत का ही प्रतिनिधि था | बाद में जो घटनाएं हुईं, उसके कारण यूनाइटेड किंगडम में कोई भी राजा ने तब से सांसद की अवहेलना नहीं किया है |
शब्द “कर सकता है “ ये पक्का करता है कि ये धाराएं संविधान के अनुसार मान्य हैं या नहीं, ऐसी कोई शंका नहीं रहे !! इससे ये पक्का हो जायेगा कि संविधान के भगत-पूजारी, जो ये दावा करते हैं कि प्रस्तावित क़ानून-ड्राफ्ट संविधान के खिलाफ है, उनको आसानी से चुप रहने के लिए बोला जा सकेगा | नहीं तो, ये शब्द “37 करोड़” परमाणु बम से भी ज्यादी शक्ति रखते हैं |
असल में, हम ने एक तरीका निकाला है भारत में लोकतंत्र का स्तर बढ़ाने का, बिना कोई क़ानून में बदलाव किये और बिना संबिधान बदले | और वो तरीका है, कि धारा के शब्द इस तरह रखना कि “ यदि 37 करोड़ मतदाता स्वीकृत / पसंद / अनुमोदन करते हैं, तब अधिकारी कर सकता है या उसे करने की जरुरत नहीं है …..” | 1977 के आपातकाल-विरोधी जन-आन्दोलन में कुछ करोड़ नागरिकों ने मजबूर किया था इंदिरा गाँधी को आपातकाल समाप्त करने के लिए और कुछ करोड़ आम-नागरिकों ने मजबूर किया था अंग्रेजों को भारत देश से भागने के लिए |
अरे, यदि 37 करोड़ मतदाता स्वीकृति देते हैं, तो अधिकारी, जिसको धारा में निर्देश दिया गया है, निर्देश का पालन करेगा या फिर अगला अधिकारी, जो मरे हुए अधिकारी के जगह आएगा, निर्देश का पालन करेगा | मैं इस बात की चिंता नहीं करूँगा कि अधिकारी जैसे प्रधानंमंत्री 37 करोड़ नागरिकों की बात मानेगा कि नहीं | मैं अधिकारी को इसकी चिंता करने दूँगा | कुल मिलाकर, ये संभावना कि सांसद या प्रधानमंत्री“ कर सकते हैं “ शब्द का इस्तेमाल करेंगे, 37 करोड़ नागरिकों के इच्छा के खिलाफ, केवल जानकारी के लिए है |
कुछ लोग `प्रधानमंत्री इस्तीफा दे सकते है ` को प्रधानमन्त्री पर दबाव बनने के लिए तरीका के रूप में देख सकते हैं |

(20) उन मुद्दों / विषयों के बारे में क्या, जिसमें लोगों के हित और राष्ट्र के हित आपस में टकराते हैं ?

मुझे एक भी ऐसे काप्ल्पनिक (सोचा हुआ)` क़ानून-ड्राफ्ट नहीं मिला जो लोग, बड़े पैमाने पर समर्थन करेंगे और जो लोगों के हित के विरुद्ध जाता हो | क्या आप एक ऐसा क़ानून-ड्राफ्ट बता सकते हैं , जो आप सोचते हैं कि जिस पर 51% `हां` दर्ज करेंगे और जो राष्ट्र के हित के खिलाफ जाता हो ? नागरिक अधिकारियों को कम वेतन क्यों देंगे ? यदि ऐसा है, तो कितने मालिक, कर्मचारियों को कुछ भी वेतन नहीं देंगे ? क्यों नहीं ? क्योंकि हर मालिक को मालूम है कि कोई भी कर्मचारी मार्केट के भाव से कम पर काम नहीं करेगा | यदि जिले या राज्य का कोई मुद्दा, कानून राज्य के हित के खिलाफ जाता है, तो देश के नागरिकों का बहुमत `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली`के द्वारा उस कानून या मुद्दा को हटा सकते हैं |

(21) आप भूल रहे हैं कि अमेरिका के लोगों के पास ज्यादा अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा और दूसरी मूलभूत / बुनियादी व्यवस्थाएँ हैं | उनकी इन्टरनेट, फोन , घर और भोजन तक पहुँच हमारे से अधिक है | अमेरिका के लोगों को रिश्वत या चाय-पानी देकर उनके वोट लेना संभव नहीं है क्योंकि वे यहाँ के लोगों से भिन्न बहुत जागृत/सचेत और बहुत विकसित हैं |

ये एक बहुत ही बिना मतलब का प्रश्न है, जो कई बार पूछा गया है | अमेरिका में अधिकारी को बदलने के प्रक्रिया / तरीके 1760 के दशक से हैं, जब 5% से कम अमेरिका के लोग पढ़े-लिखे थे | ज्यादातर अमेरिका के राज्यों में, 1900 के दशक तक भी, वहाँ के लोग बहुत कम पढ़े-लिखे थे और उनमें बहुत कम जागरूकता थी | बदलने का अधिकार (राईट टू रिकाल) बहुत ही सरल नियमों पर चलता है – नागरिक छोटी-मोटी कमियों को बर्दाश्त कर लेते है (जैसे पोलिस-प्रधान कोई जुआ-खाने से कोई रिश्वत लेता है ) और बड़े अपराध के खिलाफ पूरी तरह हो जाते हैं ( जैसे पोलिस का प्रधान / अध्यक्ष कोई पेशेवर मुजरिम का समर्थन करता है ) और इसीलिए बहुत कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद, भूतकाल में, बदलने के अधिकार ने ये सुनिश्चित किया कि पोलिस के अध्यक्ष में, अमेरिका के इतिहास में, बहुत ही कम भ्रष्टाचार रहा |

अमेरिका में प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल; भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने/निकालने का अधिकार)  1760 के दशक से है | और अमेरिका में अधिक शिक्षा आदि इसीलिए है क्योंकि भ्रष्टाचार 1760 के दशक से कम है और भ्रष्टाचार कम `प्रजा अधीन राजा` और जूरी प्रणाली के कारण है | और जहां पर `प्रजा अधीन राजा` नहीं है, अमेरिका में वहाँ पर रिश्वत बहुत है, उदाहरण से अमेरिका में प्रजा अधीन-राजा सभासद (सेनेटर) पर नहीं है और इसीलिए सभासद अमेरिका में भ्रष्ट हैं  |

नागरिक कोई प्रधानमंत्री के लिए विकाल्प(दूसरे) उम्मीदवार को तभी स्वीकृति देंगे जब-

1. वर्त्तमान प्रधानमंत्री एक-दम निकम्मा है (जैसे मनमोहन सिंह, मायावती आदि)

2. विकल्प (दूसरा व्यक्ति) बहुत ज्यादा अच्छा है |

और अधिकतर लोग उस व्यक्ति को स्वीकृति / अनुमोदन देंगे जिसने जिले / राज्य स्तर पर अपने आप को सिद्ध किया है |

(22) पटवारी के दफ्तर जाकर शिकायत करने का शुल्क / फीस , रु 3 से कैसे सब वेतन और चलने का खर्चा पूरा होगा ? `राईट टू रिकाल ` प्रक्रियाओं / तरीकों की लागत क्या है ?

मैं दिखा सकता हूँ कि क्लर्क का वेतन, कंप्यूटर, सर्वर, बैंडविड्थ आदि की लागत सभी पूरा हो जायेगा | एक क्लर्क एक दिन में 200-300 `हां`/`ना` दर्ज कर सकता है | इसीलिए उससे 600-900 रुपये मिलेंगे | एक क्लर्क का रोज का वेतन 150 से 300 रुपये होता है | सर्वर 100 एम.बी (M.B) के लिए मुफ्त मिलते हैं और 200 जी.बी. (G.B) के लिए  1000 रुपये हर महीने के शुल्क में मिलते हैं | एक कंप्यूटर 25000 रुपयों में आता है , ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ , जिसका खर्च कुछ ही दिनों में निकल आएगी | तो शुरुवाती लागत कम है, और जैसे `हां`/`न` की संख्या बढ़ेगी, लागत बढ़ेगी, लेकिन रु. 3 के शुल्क से पूरी हो जायेगी |

सरकार पर लागत शून्य है | हां, शून्य | और हर व्यक्ति जिसको बदलाव चाहिय , उसको रु.3 शुल्क देनाहोगा और जब `सुरक्षित एस.एम.एस` सिस्टम आ जायेगा ( जो बड़ी आसानी से कभी भी आ सकता , यदि ट्राई ऐसा आदेश करे ), तो लागत एक पैसा प्रति नागरिक से भी काम हो जायेगी !!
और `राईट टू रिकाल ` के तरीकों/प्रोसदुरे का खर्चा कितना आएगा ? रु. 200 करोड़ बिना `सुरक्षित एस.एम.एस` सिस्टम के और केवल रु.3 करोड़, जब `सुरक्षित एस.एम.एस` सिस्टम आ जायेगा | क्या ये आप के विचार से बहुत ज्यादा है ?

आप क्या ये समर्थन करते हैं कि लोगों को कोर्ट में मामला दर्ज कराने का अधिकार होना चाहिए ? देखिये, कोर्ट में मामला दर्ज कराना 100 गुना ज्यादा महंगा है, उस प्रक्रिया/तरीका से जो मैंने बताया है शिकायतों को पारदर्शी तरीके से दर्ज कराने के लिए | तो यदि आप की राय में ये प्रस्तावित प्रक्रिया महँगी है, तो कोर्ट भी महंगे हैं | तो क्या आप की राय में लोगों को कोर्ट में भी केस डालने से रोक देना चाहिए ? लेकिन यदि आप कोर्ट में मामला दर्ज कराने के प्रक्रिया का समर्थन करते हैं, जो पटवारी के दफ्तर में `हां`/`ना` दर्ज करने से कहीं ज्यादा महंगा है, तो आप क्यों आम-नागरिकों को पटवारी/लेखपाल के दफ्तर पर `हां`/`ना` दर्ज करने के प्रक्रिया का विरोध करते हैं ?

(23) (i) यदि शिकायत में अपमान करने वाले शब्द हैं तो फिर क्या ?
(ii) यदि शिकायतकर्ता शिकायत को साबित करने में असफल हो जाता है, तो क्या उसपर मानहानी का आरोप लगाया जा सकता है ?

(i)    किसी भी तरह की एफिडेविट डाली जा सकती है और यदि शिकायत में अपमान करने वाले शब्द लिखे हैं, तो डालने वाले पर केस (मामला) कर दिया जाएगा और एफिडेविट निकाल दी जायेगी | कोई भी क़ानून की अदालत एफिडेविट को हटाने का आदेश दे सकती है | और बाद में, ऐसे क़ानून जोड़े जा सकते हैं, जिससे उस व्यक्ति, जिसने आपमान के शब्द वाला एफिडेविट डाला है, उसके एफिडेविट डालने का अधिकार कई सालों तक सस्पैंड / निलंबित किये जा सकते हैं | बिलकुल वैसे ही जैसे , मीडिया (समाचार पत्र, टी.वी. वाले) कुछ भी छाप सकते है, और वो जिम्मेदार हैं कि क्या छापते हैं | लेकिन सामान्य तौर पर कोई भी मीडिया वालों को छापने से नहीं रोक सकते हैं , कार्य किये जाने से पहले |
(ii) कोई भी शिकायतकर्ता कलेक्टर के दफ्तर में जाकर एफिडेविट में अपने ऊपर पब्लिक में नार्को जांच करवाने की मांग कर सकता है ( देखें चैप्टर 27, www.righttorecall.info/301.h.pdf ) | इससे साबित हो सकता है कि शिकायतकर्ता सच बोल रहा है या झूठ और सच्चे शिकायतकर्ता पर मानहानी का मुकद्दमा नहीं होगी

(24) शिकायत / प्रस्ताव की जानकारी कैसे फैलेगी और इसके लिए कितना समय लगेगा ?

ये सब शिकायत / प्रस्ताव पर निर्भर करता है कि आम आदमी और जन-समूह के लिए शिकायत / प्रस्ताव कितना फायदे का है | एक शिकायत, जो लाखों लोगों की है, जैसे रामलीला मैदान पर सोते हुए लोगों पर लाठी बरसाना, जून 4, 2011 को हुआ , यदि कोई दर्ज कर देता कलेक्टर के दफ्तर जाकर  कि `पोलिस-कमिश्नर हो हटाना चाहिए ` आग की तरह फैलेगी और लाखों लोग उस शिकायत के साथ अपना नाम जोड़ने के लिए पटवारी के दफ्तर जायेंगे | अभी इन्टरनेट केवल भारत के 4-5 % लोगों के पास ही है | मान लीजिए 5 करोड़ आम नागरिकों के पास इन्टरनेट है | इन 5 करोड़ लोगों में से कुछ 4 करोड़ , 90 लाख लोग ऐसे हैं , जो प्रधानमंत्री के सर्वर पर आम नागरिकों को 1% भी जगह देने के लिए विरोध करेंगे | लेकिन इन में से ,कुछ 10 लाख लोग आम नागरिकों की परवाह जरूर करते हैं |

तो जब ये 10 लाख खुशाल/समृद्ध लोग, जिनके पास इन्टरनेट है, एक जन-हित का एफिडेविट इन्टरनेट पर देखेंगे, तो वे इसे फैलाने का प्रयत्न करेंगे पर्चों, समाचार-पत्र प्रचार या मुंह-जुबानी द्वारा ; और इस तरह ये जानकारी बाक़ी के आम नागरिकों तक पहुँच जायेगी |

इस तरह ये जानकारी केवल इन्टरनेट के प्रयोग करने वालों तक ही सीमित नहीं रहेगी | और यदि किसी के पास इन्टरनेट भी है तो, वो रोज के सैंकडों आने वाले एफिडेविट नहीं पढ़ सकता | इसीलिए आखिर में जानकारियां पर्चों, मुंह-जुबानी, प्रचार आदि साधनों से फैलेगी |

(25) क्या भाषा शिकायत / प्रस्ताव को लाखों-करोड़ों लोगो तक फैलाने के लिए बाधक होगा ?

ये भाषा का मुद्दा इस प्रस्ताव की कमी नहीं है | ये इसीलिए है क्योंकि भारत में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं | और प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री आदि या कियो भी व्यक्ति हमेशा स्वतंत्र हैं , एफिडेविट के सरकारी या अपना अनुवाद रखने के लिए ,और ऐसा करना उनके लिए कोई जरूरी नहीं है हरेक एफिडेविट के लिए, लेकिन जब कोई एफिडेविट को 1% से ज्यादा समर्थन मिलता है , तो वे ऐसा कर सकते हैं | और ये कोई क़ानून बनाने का सिस्टम नहीं है, जहाँ अनुवाद बहुत जरूरी है | ये केवल एक राय / मत इकठ्ठा करने का सिस्टम है |

(26) नागरिकों के पास अपनी स्वीकृति किसी भी दिन बदलने का अधिकार है, तो क्या नागरिक अपनी पसंद / स्वीकृति को रोज-रोज बदलेगा ?

ये केवल आपका मानना है | मान लीजिए 10 करोड़ बिना शादी-शुदा के महिलाएं हैं, 18-45  साल के बीच में | एक पति को अधिकार है अपनी पत्नी को तलाक देने के लिए और इन 10 करोड़ महिलाओं में से किसी से भी शादी करने के लिए | तो क्या पति अपने जीवन-साथी रोज-रोज बदलते हैं ? नहीं |
एक व्यक्ति को अपनी नौकरी कोई भी दिन बदलने का अधिकार है | तो क्या वो नौकरी रोज-रोज बदलता है ?

(27)  आपका तरीका / प्रक्रिया मतदान को गुप्त रखना पक्का / सुनिश्चित नहीं करता – क्या इससे कोई मतदाताओं को गुंडों आदि लोगों द्वारा हानि नहीं हो सकती ?

सबसे पहले, ये पारदर्शिता बढ़ाने वाले तरीके हैं, जिसमें कोई भी व्यक्ति खुद जानकारी को देख सकता है और जांच सकता है, कभी भी और कहीं भी, ताकि वो जानकारी को दबाया न जा सके | लेकिन यदि किसी कारण, किसी को अपनी शिकायत या समर्थन गुप्त रूप में देना है ,तो अन्य विकल्प भी खुले रहेंगे | ये तरीका केवल एक विकल्प के रूप में आयेंगे और गुप्त तरीका भी उपलब्ध रहेगा |
और आजकल गुप्त क्या है ? आपका क्रेडिट-कार्ड की जानकारी / स्टेटमेंट सरकार के पास होती है | आपका खाते के लेन-देन / सौदों की जानकारी सरकार को पता है | जब आप पोलिस, कोर्ट में कोई शिकायत करते हैं, तो आप के नाम का खुलासा हो जाता है | जब ये सब जानकारी पब्लिक में आ जाने पर भी कुछ नहीं होता, तो फिर नागरिकों की स्वीकृति / पसंद का खुलासा करने से क्या हानि हो सकती है ?
कुछ स्थानीय स्तर के प्रस्तावित प्रक्रियाओं में, जैसे जिला पोलिस-कमिश्नर, आदि के बदलने के प्रक्रिया में गोपनीयता रखी गयी है | प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री को नागरिकों द्वारा बदले जाने कि प्रक्रिया में कोई गोपनीयता नहीं है | मैंने एक गुप्त तरीका भी बनाया है लेकिन उसमें खर्चा थोड़ा ज्यादा होगा | क्या गोपनीयता की कमी से प्रधानमंत्री को बदलने के लिए कोई नागरिकों कोई हानि होगी ? नहीं, कोई हानि नहीं होगी |
1. जो तरीका/प्रक्रिया मैंने प्रस्तावित किया है, उसमें व्यक्ति को तभी बदला जायेगा जब 24 करोड़ नागरिक किसी दूसरे व्यक्ति को स्वीकृति देते हैं | और 24 करोड़ नागरिकों पर जबरदस्ती करने के लिए , 10 लाख की सेना और 15 लाख की पोलिस-फ़ोर्स भी कम पड़ेगी | इसीलिए किसी नेता को कुछ 50 लाख प्राइवेट गुंडों की जरुरत पड़ेगी 24 करोड़ नागरों पर जबरदस्ती करने के लिए | दुनिया में किसी के पास 5000 गुंडों की गैंग भी नहीं है | जब गंग इतनी बड़ी हो जाती है, तो उस गैंग के मालिक को आम-नागरिक-समर्थक होना पड़ता है, वो इतने सारे आम-नागरिक का विरोधी होना का खतरा नहीं ले सकता | यदि आपने ध्यान दिया हो, तो गुंडे हमेशा अमीर या कुछ नए-नवेले अमीरों को ही ठगने की कोशिश करते हैं और कुछ ही आम-नागरिकों पर अत्याचार करते हैं , गुंडे कभी भी पुराने(स्थापित)-अमीर या बहुत ज्यादा आम-नागरिकों पर अत्याचार नहीं करते —क्योंकि ये ऐसा काम नहीं कर सकता | तो ये डर कि कोई एक करोड़ मतदातों पर जबरदस्ती कर सकता है, 24 करोड़ लोगों की बात को छोड़ दें , वास्तविकता से बहुत परे है |
2. नागरिक अपनी स्वीकृति किसी भी दिन डाल सकते हैं और रद्द कर सकते हैं | इसीलिए गैंग का नेता , इतने सारे गुंडों को पटवारी/लेखपाल के दफ्तर के आसपास, रोज-रोज नहीं रख सकता | चुनाव 5 सालों में एक बार आते हैं | इसीलिए कोई 2-5 गुंडे बूथ पर एक दिन के लिए रख सकता है , लेकिन गुंडों को रोज-रोज रखना संभव नहीं है | और इन तरीकों के बाद के रूपों/संस्करण में, कोई भी व्यक्ति अपनी स्वीकृति पटवारी के दफ्तर, तहसीलदार के दफ्तर, कलेक्टर के दफ्तर ,पोस्ट-ऑफिस आदि पर दर्ज कर सकेगा | कोई भी गैंग का नेता इतना शक्तिशाली नहीं होता कि वह लोगों को किसी जगह जाने के लिए पूरे साल रोक सके |

3. जब नागरिकों को पारदर्शी शिकायत प्रणाली (सिस्टम) और राईट टू रिकाल-जिला पोलिस-कमिश्नर (जो गुप्त है) को बदलने की प्रक्रिया मिलेगी मिलेगी, तब इन गुंडों को पोलिस और जजों की सुरक्षा, जो आज के समय मिलती है, मिलना बंद हो जायेगी, क्योंकि यदि पोलिस और जज गुंडों को सुरक्षा देंगे, तो नागरिक उनको निकाल/बदल सकते हैं | तो ये गुंडे इन जन-हित के तरीकों के आने के 3 महीनों के बाद बहुत कम हो जाएँगे |
4. और अंत में, कृपया ध्यान दें , कि ये सब क़ानून-ड्राफ्ट जो मैंने प्रस्ताव किये हैं, वे `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम) द्वारा ही आएंगे | तो यदि लोगों को लगता है कि खुला अनुमोदन करना बुरा है, तब `पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` ये सुनिश्चित करेगा कि गुप्त प्रक्रिया ही आएगी | दूसरे शब्दों में, मेरा कहना है कि ये `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) का क़ानून , दूसरे बुरे प्रस्तावों को आने से रोकेगा |

(28) यदि पारदर्शी शिकायत प्रणाली और `राईट टू रिकाल` प्रक्रियाओं / तरीकों के लिए प्रयोग किये जाने वाली वेबसाइट हैक (चुरा) लिया जाये तो ?

ये वेबसाइट सबसे ज्यादा सुरक्षित वेबसाइट होगा, किसी बैंक से भी ज्यादा सुरक्षित | यदि हैक (चुराने / घुसपैठ करने) वाला इस वेबसाइट को चुरा सकता है, तो उसे करोड़ खातों को चुराना होगा और इस मामले में खतरा ज्यादा है और फायदा कम | इस तरह का चोर, कोई बैंक की वेबसाइट को चुराना पसंद करेगा, ना कि `पारर्शी शिकायत प्रणाली`/`राईट टू रिकाल` के लिए वेबसाइट क्योंकि बैंक की वेबसाइट में घुसपैठ करने (घुसने) में कम खतरा है पकड़े जाने का और फायदा कहीं ज्यादा है |
कृपया प्रक्रिया/तरीका देखें | घुसपैठ(हैक) करने वाला चोर कोड या कुछ और बदल देता है, तो ये वेबसाइट जो करोड़ों लोगों के द्वारा देखी जायेगी, को पता चल जायेगा, इन्टरनेट द्वारा (और बाद में एस.एम.एस, पस्स्बुक, अदि द्वारा) कि उनका अनुमोदन बदल दिया गया है | और अन्य लोगों को भी इतना ज्यादा बदलाव का पता लग जायेगा ,क्योंकि करोड़ों लोग इस बदलाव को देख पाएंगे | इसलिए घुसपैठिये के पकड़े जाने की बहुत संभावना है | इसी कारण घुसपैठिया कोई बैंक की वेबसाइट को घुसपैठ करना ज्यादा पसंद करेगा, जहाँ कम लोग उस साईट को देखते हैं और इसीलये पकड़े जाने की संभावना कम है और फायदा बहुत ज्यादा | और इसके बाद भी यदि घुसपैठिया अनुमोदन/स्वीकृति बदल देता है, उसके बाद भी नागरिक अपने अनुमोदन दुबारा बदल कर पहले जैसे कर सकते हैं , तो घुसपैठिये की सारी मेहनत बेकार जायेगी | कोई भी घुसपैठिया इतना मूर्ख नहीं है कि इस सुरक्षा धारा `कोई भी नागरिक किसी भी दिन अपनी स्वीकृति बदल सकता है`  के होते हुए कि वे घुसपैठ करे |
एक और बात, कि तीन-चार सर्वर पर आंकड़ों का रिकोर्ड/बैकअप लिया जायेगा , जब शिकायत कलेक्टर को दी जायेगा या पटवारी के दफ्तर पर `हा`/`ना` दर्ज होगा | केवल स्थानीय सर्वर पर राईट करने (लिखने) की सुविधा होगी और हर स्थनीय सर्वर का पासवर्ड होगा | स्थानीय सर्वर से जानकारी केन्द्रीय सर्वर और दूसरे सर्वर जायेगी लेकिन उसपर दोबारा राईट (लिखा) नहीं किया जा सकेगा, केवल रीड (पढ़ने) की सुविधा होगी |
इसीलिए घुसपैठिया निराश हो जायेगा, क्योंकि कोई भी आंकड़ों का नुकसान नहीं होगा यदि अच्छे से रिकोर्ड/बैकअप रखा जाये, जिसकी संभावना भी है |

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पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली में, शिकायत या कोई एफिडेविट कलेक्टर के दफ्तर में दर्ज की जाती है, शिकायतकर्ता के सामने और कुछ ही सैकंड में, इसकी कोपी कई सर्वर जैसे कलेक्टर के दफ्तर, मुख्यमंत्री के दफ्तर, प्रधानमंत्री के दफ्तर के सर्वरों आदि पर आ जाती है और कुछ ही मिनटों में, कई कोपियाँ गूगल, फेसबुक आदि के सर्वर पर आ जाएँगी |

अब, कोई सिस्टम का एडमिन या प्रधानमंत्री अपने सर्वर पर शिकायत की कोपी को डिलीट कर सकता है | लेकिन ऐसा करने से एक इस्तेमाल ना किया हुआ सीरियल नंबर रह जायेगा या सिस्टम एडमिन को शिकायतों की एक सीरियल नंबर एक से कम करना पड़ेगा या उसे डिलीट की गयी शिकायत को कुछ और से बदलना पड़ेगा | कुल मिलकर, प्रधानमंत्री का सर्वर दूसरे कलेक्टर, मुख्यमंत्री आदि के सर्वरों से मेल नहीं खायेगा |

इसीलिए, किसी को यदि कोई शिकायत को डिलीट या बदलने है और पकड़े जाने से बचना है, तो उसे बहुत सारे सर्वरों में बहुत सारा डाटा के साथ छेड़-छाड़ करना पड़ेगा | ऐसा करने का प्रयत्न करना और हजारों लोगों को नहीं पता चलना संभव नहीं है | यदि कोई ऐसा कर सकता है, तो वो सोचेगा कि इससे अच्छा होगा कि वो किसी बैंक के सर्वर के साथ छेड़-छाड़ करे |

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अनुमोदन/स्वीकृत/पसंद दर्ज करना बैंक के लेन-देन से जयादा सुरक्षित है : एक व्यक्ति पटवारी के दफ्तर पर खुद जायेगा शिकायत दर्ज करने के लिए और उसे एस.एम.एस. द्वारा पुष्टि(पक्का) भी हो जायेगी , क्रेडिट-कार्ड के प्रयोग के जैसे और मशीन उसका फोटो और अंगुली का छाप भी ले लेगी | ये जरूर है कि पहले ही दिन ये सभी सुविधाएं नहीं होंगी लेकिन कोई भी कलेक्टर इनको 3 से 6 महीनों में आसानी से लागू करवा सकता है, नहीं तो नागरिक उसको निकालने की मांग करेंगे | फोटो, अंगुली की छाप और एस.एम.एस. द्वारा पुष्टि से ये सिस्टम बैंक के लेन-देन से भी ज्यादा सुरक्षित है | यदि कोई इस सिस्टम में घुसपैठ कर सकता है, तो वो इसको नहीं, एक बैंक में घुसपैठ करेगा |

(29) `राईट टू रिकाल` के प्रक्रियाओं/तरीकों में जैसे, राईट टू रिकाल-प्रधानमंत्री ,आदि, क्या नागरिक जाती के अनुसार अनुमोदन / स्वीकृति नहीं करेंगे ?

ये झूठा प्रचार है कि आम आदमी जाती और धर्म के अनुसार वोट देता है, उदाहरण से मायावती को ब्राह्मण के वोट मिले थे |
दूसरा, एक जाती में कई उप-जातियां होती हैं | यदि कोई एक ही जाती या उप-जाती को लुभाने/पटाने की कोशिश करेगा , तो उसको इतने वोट नहीं मिलेंगे कि वो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि बने क्योंकि जाती/उप-जाती के संख्या इसके लिए काफी नहीं हैं | किसी भी उप-जाती की संख्या राज्य स्तर में भी 10% से अधिक नहीं है और मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने के लिए 35% से अधिक अनुमोदन चाहिए | और दूसरी जातियां उसके लिए वोट नहीं करेंगी क्योंकि उस व्यक्ति पर एक खास जाती के समर्थक का छाप/लेबल लग जायेगी |
(30)  क्या ये प्रक्रियाएँ / तरीके मीडिया (अखबार,टी.वी आदि) द्वारा प्रभावित किये जा सकते हैं ? 

    नहीं | क्योंकि इसमें एक सुरक्षा है कि ` कोई भी नागरिक कभी भी अपना अनुमोदन/स्वीकृति किसी भी दिन दर्ज कर सकता है या बदल सकता है, पटवारी के दफ्तर जा कर |`
ये प्रक्रियाएँ (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली, राईट टू रिकाल-दूरदर्शन अध्यक्ष, राईट टू रिकाल राष्ट्रिय समाचार पत्र, आदि) मीडिया के प्रभाव को समाप्त कर देंगी क्योंकि ये एक स्वयं में एक मीडिया बनेंगी, जो आम-नागरिकों द्वारा जाँची जा सकने वाली और कभी भी देखी जा सकने वाली जानकारी देंगी शिकायतों के बारे में, प्रधानमंत्री आदि के उम्मीदवारों के बारे में और उनके समर्थक के बारे में | आम-नागरिक लाखों लोगों द्वारा समर्थन की गयी, हर नागरिक द्वारा देखी जा सकने वाली जानकारी पर ज्यादा निर्भर करेंगे बजाय कि मीडिया रिपोर्ट पर |
और कोई भी मीडिया या गुंडों के लिए पैसे लगते हैं और उनका इस्तेमाल ज्यादा देर तक करना संभव नहीं है | जैसे ही उनका प्रभाव समाप्त हो जायेगा, कोई व्यक्ति उनके द्वारा पहले दबाया भी गया हो, तो अपना अनुमोदन अपनी इच्छा अनुसार बदल सकेगा और किसी अमीर व्यक्ति की मीडिया या गुंडों द्वारा प्रभावित करने का प्रयास बेकार जायेगा |

इसीलिए , ऐसा व्यर्थ प्रयत्न कोई करेगा नहीं, इस सुरक्षा धारा के होते हुए |

`राईट टू रिकाल-लोकपाल` या दूसरे `राईट टू रिकाल` की प्रक्रियाओं में, कोई भी नागरिक कभी अपना अनुमोदन किसी भी दिन दर्ज या बदल सकता है , पटवारी के दफ्तर जा कर |
तो फिर किसी को हर दिन गुंडे चाहिए होंगे | और 37 करोड़ लोगों को या 5 करोड़ लोगों से भी जबरदस्ती करने के लिए, लाखों गुंडों की जरूरत होगी | किसी के पास भी इतने गुंडे नै हैं , और कोई भी इतने गुंडे दिनों-दिनों या हफ़्तों-हफ़्तों के लिए नहीं रख सकता | यदि प्रधानमंत्री पूरी 15 लाख की पोलिस-फ़ोर्स भी इस्तेमाल करे, तो भी इतने सारे आम-नागरिकों को रोक नहीं सकती |
(31) (i) क्या राईट टू रिकाल निचले पदों पर काम करेगा ?

 (ii) हमें `राईट टू रिकाल` प्रक्रियाएँ क्यों चाहिए उन पदों पर जो नागरिक-मतदाताओं द्वारा नहीं चुने गए हैं जैसे लोकपाल, प्रधानमंत्री, भारत का रिसर्व-बैंक गवर्नर, जिला शिक्षा अधिकारी, जिला पोलिस-कमिश्नर, सुप्रीम-कोर्ट का प्रधान जज , आदि |
(iii) हमें `राईट टू रिकल`(भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा निकालने/बदलने का अधिकार) प्रधानमंत्री,लोकपाल, जज आदि केन्द्रीय पदों पर क्यों चाहिए यदि हमारे पास `राईट टू रिकाल सांसदों ` के ऊपर है तो ? क्या हम सांसदों के ऊपर दबाव नहीं डाल सकते, `राईट टू रिकाल-सांसद` के द्वारा , ताकि सांसद प्रधानमंत्री , लोकपाल, जज को मजबूर करें कि वे देश के नागरिकों के हित में काम करें ?

(i)    हमें `राईट टू रिकाल` सभी पदों पर चाहिए जिनके पास स्वतंत्र (खुद का) निर्णय लेने के अधिकार हैं और जिनके कम से कम एक लाख वोटर के ऊपर अधिकार है | निचले पदों के पास कम खुद का निर्णय लेने का अधिकार है और वो कम नागरिकों के ऊपर अधिकार रखते हैं | इसलिए निचले पदों के लिए, जूरी सिस्टम (क्रम-रहित तरीके से चुनाव करना जिला,राज्य आदि से जो फैसला देते हैं ) अधिक फायदे वाला है |

(ii)    `राईट टू रिकाल` प्रक्रिया / तरीके का उद्देश्य उस अधिकारी को लोगों के प्रति, सीधे जवाबदार बनाना है | यदि अधिकारी कोई प्रबंधक / नियामक जैसे लोकपाल या उच्च-लोकपाल (लोकपाल के ऊपर अधिकारी) के प्रति जवाबदार है, तो विदेशी या कोई अन्य कम्पनियाँ, दोनों लोकपाल और उच्च-लोकपाल को खरीद सकता है क्योंकि वे बहुत कम संख्या में हैं लेकिन विदेशी कम्पनियाँ करोड़ों आम-नागरिकों को खरीद या प्रभावित नहीं कर सकतीं | इस तरह `राईट टू रिकाल` के प्रक्रियाओं से 99% मामलों में भ्रष्टाचार रुकेगा और अधिकारी अच्छे से बर्ताव करेंगे और 1% मामलों में, भ्रष्ट अधिकारी ईमानदार अधिकारी से बदल दिया जायेगा |
(iii)    यदि केवल `राईट टू रिकाल-सांसद`(भ्रष्ट सांसदों को बदलने/निकालने का नागरिकों का अधिकार) है और `राईट टू रिकाल-प्रधानमंत्री नहीं है, तो नागरिक कैसे अपने क्षेत्र के सांसदों और देश के अन्य नागरिकों से संपर्क कैसे करेंगे और कैसे बताएँगे कि उनकी क्या पसंद है दूसरे प्रधानमंत्री के लिए , यदि वर्त्तमान प्रधानमंत्री देश के लोगों के हित में काम नहीं कर रहा है तो ? वे कैसे जिले के अन्य लोगों को बताएँगे कि उनको कौनसा सांसद पसंद है ?
इस कार्य के लिए उनको `राईट टू रिकाल-प्रधानमंत्री ` और `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम) चाहिए आम-नागरिकों के लिए | और सांसदों के पास कोई अधिकार नहीं है लोकपाल या जजों को निकालने के लिए, जिससे वो वे उनपर देश के लोगों के हित में काम करने के लिए दबाव डाल सकें | इसीलिए राईट टू रिकाल-जज और राईट टू रिकाल-लोकपाल की जरुरत है |
यदि केवल `राईट टू रिकाल-सांसद`(भ्रष्ट सांसदों को बदलने/निकालने का नागरिकों का अधिकार) है और `राईट टू रिकाल-प्रधानमंत्री नहीं है, तो नागरिक कैसे अपने क्षेत्र के सांसदों और देश के अन्य नागरिकों से संपर्क कैसे करेंगे और कैसे बताएँगे कि उनकी क्या पसंद है दूसरे प्रधानमंत्री के लिए , यदि वर्त्तमान प्रधानमंत्री देश के लोगों के हित में काम नहीं कर रहा है तो ? वे कैसे जिले के अन्य लोगों को बताएँगे कि उनको कौनसा सांसद पसंद है ?
इस कार्य के लिए उनको `राईट टू रिकाल-प्रधानमंत्री ` और `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम) चाहिए | और सांसदों के पास कोई अधिकार नहीं है लोकपाल या जजों को निकालने के लिए, जिससे वो वे उनपर देश के लोगों के हित में काम करने के लिए दबाव डाल सकें |

(32) हमें अच्छे चुनावी सुधार चाहिए जैसे `100 % जरूरी मतदान`, ` ऊपर में से कोई भी नहीं` का बट्टन (राईट टू रिजेक्ट या उम्मीदवारों को अस्वीकार / नापसंद करने के लिए) `राईट टू रिकाल` के प्रक्रियाओं/तरीकों के बजाय | हमें चुनाव चाहिए अच्छे लोगों को चुनने के लिए जो ये सुधार लायेंगे | 
एम.एन.रॉय , पहला व्यक्ति जिसने भारत का संविधान लिखा था, जिसका नाम ` ड्राफ्ट कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया ` था 1946 में, ने कहा था “ बिना जन-प्रतीनिधियों को निकालने/बदलने के नागरिकों के अधिकार , चुनाव बेकार होंगे “ और 1925 में भगत सिंह की पार्टी, `हिंदुस्तान रिपुब्लिकन आर्मी` के घोषणा–पत्र में भी ये ही लिखा था कि बिना `राईट टू रिकाल-जन-प्रतिनिधियों के नागरिकों को अधिकार दिए, लोकतंत्र एक मजाक बन जायेगा |` और राजीव दिक्सित जी ने भी कहा था “ पहले राईट टू रिकाल, फिर चुनाव ” |

यदि कोई भी राईट टू रिकाल नहीं है नेताओं, जजों, अफसरों आदि के ऊपर, तो हम, आम-नागरिक कभी भी नेता, आदि को निकाल/बदल नहीं सकते यदि वे भ्रष्ट हो जाएँगे | लेकिन यदि हमारे पास कोई तरीका है, कभी भी भ्रष्ट को निकालने / बदलने / सज़ा देने का, तो ये `लटकती तलवार` जैसे काम करेगा नेता, आदि के ऊपर और नेता, आदि अपना कम अच्छा करेंगे और भ्रष्टाचार नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें नौकरी जाने का डर रहेगा और सज़ा पाने का डर रहेगा | लेकिन बिना `राईट टू रिकाल` के प्रक्रियाओं / तरीकों के 99% अधिकारी, पद पाने के बाद भ्रष्ट हो जाएँगे | और भगवन ने किसी माथे पर कोई टिकेट नहीं लगायी, कि हमें उन 1%  लोगों का पता लगा सके, जो पद पाने के बाद भ्रष्ट नहीं होंगे | इसलिए “ पहले `राईट टू रिकाल, फिर चुनाव |”
    `नकारात्मक या अस्वीकार / नापसंद करने वाला` मतदान (राईट टू रिजेक्ट) या `ऊपर में से कोई नहीं` का बट्टन केवल चुनाव के समय ही उपयोगी है | जो उम्मीदवार ईमानदार है या उसका ईमानदार छवि/नाम है, चुनाव के बाद बिक जाता है | और आम-नागरिकों का अधिकारी पर कोई भी बस नहीं चलता, एक बार अधिकारी चुन लिया जाये | और तो और, जजों ,प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री जो नागरिकों द्वारा चुने नहीं जाते, आम-नागरिकों का कोई भी नियंत्रण/कंट्रोल नहीं होता उन पर | इसीलिए हमें ऐसे तरीके/प्रक्रियाएँ चाहिए, जिनके द्वारा अधिकारी हमेशा आम-नागरिकों के प्रति जवाबदार हों और आम-नागरिकों के हित के लिए काम करे | इसके अलावा, `ऊपर में से कोई भी नहीं` का बट्टन , 1%  भी उपयोगी नहीं है क्योंकि एक पार्टी जैसे कांग्रेस को नफरत करने वाला व्यक्ति, विरोधी पार्टी को ही वोट देगा, नाकि `ऊपर में से कोई नहीं` का बट्टन दबाएगा | क्योंकि उसे डर होता है कि यदि वो किसी को भी नहीं वोट देगा, तो कांग्रेस जीत जायेगी एक वोट से | इसी प्रकार `भा.ज.पा` या अन्य पार्टी से से नफरत करने वाला व्यक्ति भी `ऊपर में से कोई नहीं ` के बट्टन का उपयोग नहीं करेगा |

    `100% जरूरी मतदान` बेकार है, बिना पोलिस और जजों के पब्लिक के प्रति जवाबदार हुए और हानिकारक भी हो सकते हैं | भ्रष्ट जज और पोलिस इस क़ानून का गलत प्रयोग कर सकते हैं , ब्लैकमेल करने के लिए और रिश्वत लेने के लिए उन लोगों से ,जो किन्हीं कारणों से वोट नहीं कर सकते |
100% जरूरी मतदान का क़ानून बना कर और जुर्माना लगाना, उनपर जिन्होंने वोट नहीं किया , उससे इस क़ानून का गलत प्रयोग होगा, पोलिस/जजों द्वारा, जो ब्लैकमेल कर सकते हैं और रिश्वत ले सकते हैं ,उन लोगों से जो किन्हीं कारणों से वोट नहीं कर सकते,जैसे घर से दूर होना आदि |
आज के समय, बहुत सारे लोग वोट नहीं करते और देश के मामलों में रूचि नहीं दिखाते क्योंकि उनको बुरे लोगों में से कम बुरा चुनना है | भ्रष्ट जज और पोलिस गुंडों को सुरक्षा देते हैं, जो ईमानदार लोगों को राजनीति में आने से रोकते हैं, लेकिन प्रस्तावित `भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने की प्रक्रिया/तरीके` जैसे `राईट टू रिकाल-सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज` और `राईट टू रिकाल-पोलिस कमिश्नर` लागू होने पर, गुंडों को जजों और पोलिस द्वारा सुरक्षा नहीं मिलेगी , इसलिए इम्मान्दर लोग राजनीत में आयेंगे या नागरिकों द्वारा , इन `राईट टू रिकाल` की प्रक्रियाओं का उपयोग करते हुए | इस तरह , मतदाताओं की वोट करने की रूचि बढ़ जायेगी मतदान करने का प्रतिशत भी बढ़ेगा , जब एक बार `भ्रष्ट को बदलने के तरीके/प्रक्रियाएँ ` लागू हो जाएँगी |
यदि `राईट टू रिकाल` के प्रक्रियाएँ लागू हैं, तो ये प्रक्रियाएँ 99 % भ्रष्टाचार के मामलों को होने से रोकेंगे और 1 % मामलों में, भ्रष्ट अधिकारी, ईमानदार अधिकारी द्वारा बदल दिए जाएँगे | इस तरह, पूरे अधिकारों मिलने पर, नागरिक मतदान और देश के मामलों में ज्यादा रूचि लेंगे , क्योंकि उनके पास भ्रष्ट को बदलने का अधिकार होगा |
एक चीज जो हमेशा देखने को मिलेगी, जिसका कोई अपवाद/छूट नहीं है : एक अधिकारी अच्चा बर्ताव तभी करता है जब नागरिकों के पास , उसे निकालने / बदलने / सज़ा देने के प्रक्रियाएँ होंगी | यदि आम नागरिकों के पास कोई तरीका/प्रक्रिया नहीं है अधिकारी को बदलने/सज़ा देने के लिए, तो उसका चुनाव कितना ही अच्छा क्यों न हो—- सीधा चुनाव, अप्रत्यक्ष (किसी के द्वारा) चुनाव , लिखित परीक्षा आदि —- अधिकारी हमेशा भ्रष्ट हो जायेगा |
एक उधाहरण प्राचीन यूनान है, जहाँ अधिकारी लोटरी द्वारा चुने जाते थे !! और फिर भी भ्रष्टाचार कम था, क्योंकि भ्रष्टाचार की शिकायत का फैसला 200, 400 या 600 जूरी-सदस्यों द्वारा किया जाता | जूरी-सदस्यों की संख्या, आरोपित के समाज के स्तर के अनुसार होता था (जितना ज्यादा पैसे वाला और शक्तिशाली आरोपित होता था, उतनी ज्यादा जूरी-सदस्यों की संख्या होती थी) | ये जूरी के पास उस अधिकारी को हटाने और सज़ा देने के भी अधिकार होते थे | इसीलिए पुराने यूनान में, अफसर और अधिकारी अच्छा बर्ताव करते थे और भ्रष्टाचार की शिकायतें कम थीं | और आज के भारत में, इतने सारे जाँच-पड़ताल के सिस्टम हैं, इतने सारे `भ्रष्टाचार-विरोधी` संस्थाएं हैं, इतने सारे हिसाब-किताब होते हैं, लेकिन आम-नागरिकों के पास भ्रष्ट अधिकारियों को निकालने / सज़ा देने के कोई तरीके/प्रक्रियाएँ नहीं हैं | इसीलिए हम देखते हैं कि लगभग सभी अधिकारी भ्रष्ट हैं |
(33) नागरिक प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री को `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत प्रस्ताव / प्रणाली (सिस्टम) सरकारी आदेश पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर / धमकी कैसे दे सकते हैं?

प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री को मजबूर करने के लिए हमें समाधान कानून-ड्राफ्ट आधारित, कार्यकर्ता संचालित, उधम सिंह केंद्रित जन-आन्दोलन करना होगा | इसका एक उदाहरण 1977 का कार्यकर्ता संचालित जन-आन्दोलन था, जिसमें सभी नेता जेल में थे, फिर भी लाखों कार्यकर्ता को मालूम था कि उन्हें क्या करना है और इसीलिए सरकार को झुकना पड़ा |

नेता आधारित आन्दोलन को विरोधी बहुत आसानी से समाप्त कर सकते हैं क्योंकि इसमें हरेक कार्यकर्ता बिना नेता के आदेश के काम नहीं करता और विरोधियों को केवल नेता को खरीदना, दबाना या बंदी बनाना होता है या उसे मारना होता है आन्दोलन को समाप्त करने के लिए, उदहारण अन्ना आन्दोलन और स्वामी रामदेव आन्दोलन |

उधम सिंह का अर्थ

उधम सिंह का अर्थ है उधम सिंह के प्रकृति के व्यक्ति जो वीर, जान का खतरा उठाने के लिए तैयार रहते हैं, राष्ट्र-भक्त, बुद्धिमान होते हैं, अकेले काम करते हैं बिना किसी के निर्देश के | देश में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए वे समय बर्बाद करने वाले और अंत में हिंसा का परिणाम लाने वाले तरीके जैसे अनशन, धरना आदि के तरीके नहीं अपनाते और सबसे अधिक अहिंसात्मक तरीके अपनाते हैं देश में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए | वे जन-समूह के आम-राय के अनुसार काम करते हैं अधिकारीयों से आम-नागरिकों के लिए अधिकार प्राप्त करने के लिए और इसीलिए उन्हें करोड़ों आम-नागरिकों का समर्थन प्राप्त होता है | उधम सिंह के कुछ उधाहरण हैं- भगत सिंह, उधम सिंह, नेताजी सुभास चन्द्र बोस, 1946 नौसेना विद्रोह के नौसैनिक, 1977 आपातकाल-विरोधी आन्दोलन के कार्यकर्ता, आदि |

आज, आम-नागरिक और देश को लोकतान्त्रिक, जल्दी प्रभावशाली, अल्पकालीन समाधान चाहिए देश के ज्वलंत समस्याओं के लिए , क़ानून-ड्राफ्ट समाधानों के अलावा जो असली जन-आन्दोलन द्वारा लाये जा सकते हैं | कुछ असली जन-आन्दोलन , आपातकाल, 1975 और नौसेना विद्रोह, 1946 (जिससे देश को आजादी मिली थी) |

सबसे अच्छा अल्पकालीन , जिससे देश के ज्वलंत समस्याओं से थोड़ी देर के शान्ति मिलेगी, समाधान क़ानून-ड्राफ्ट पर व्यापक स्तर पर जन-अभियान करना विज्ञापन / पर्चों द्वारा | इसके साथ ही हम मिस काल नंबर सिस्टम भी चालू कर सकते हैं , जहाँ पर लोग अपना समर्थन दर्ज कर सकें |

ये लोकतान्त्रिक तरीके हैं देश के लिए अच्छे प्रक्रियाएँ लाने के लिए , जो सफल होंगी यदि कार्यकर्ता इसमें भाग लें तो | गैर-लोकतान्त्रिक तरीके जैसे अपने प्रिय नेता के नारे लगाना, भाषणबाजी , बंद दरवाजों के पीछे चर्चा, किसी नेता के लिए चुनावी प्रचार करना, अनशन, मोमबत्ती रैली, आदि., से देश और व्यवस्था में कोई भी सकारात्मक परिवर्तन नहीं आएगा |
इन तरीकों में जनसमूह सक्रीय रूप से शामिल होता है, जो देश में बराबर के हिस्सेदार और इसीलिए ये लोकतान्त्रिक तरीके शक्तिशाली और सफल होते हैं | दूसरी ओर, वो तरीके जिनके द्वारा जनसमूह नहीं, कुछ ही लोग सक्रीय रूप से शामिल होते हैं, वे कमजोर और गर-लोकतान्त्रिक हैं और व्यवस्था में कोई सकारात्मक परिवर्तन लाने में विफल हो जाते हैं |

हमें कम से कम 2-4 लाख कार्यकर्ता चाहिए, जो अच्छे समाधान कानून-ड्राफ्ट प्रक्रियाओं का महीने में 15-20 घंटा प्रचार करें और कुछ करोड़ आम-नागरिक चाहिए, देश और व्यवस्था में कोई सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए |
क्या एक आम-नागरिक प्रधानमंत्री आदि से विनती करे या उसे उन्हें धमकी देने चाहिए क़ानून की सीमा में रह कर ? ये तो नागरिकों के प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री के बारे में राय के ऊपर निर्भर है | यदि नागरिक को लगता है कि प्रधानमंत्री आदि ईमानदार लोग हैं, तो उसे विनती करनी चाहिए | यदि नागरिक को लगता है कि प्रधानमंत्री आदि बेईमान लोग हैं, तो उसे उन्हें कानूनी सीमा में धमकाना चाहिए | और यदि कोई नागरिक को लगता है कि प्रधानमंत्री बेईमान है, मुख्यमंत्री ईमानदार है, महापौर (मेयर) बेईमान है, तो उसे प्रधानमंत्री को धमकाना चाहिए, मुख्यमंत्री से विनती करनी चाहिए , महापौर (मेयर) को धमकाना चाहिए आदि | प्रधानमंत्री, आदि को कानूनी सीमा में कैसे धमकाना है ? इस का तरीका ऐसा हो सकता है –

क) मैं आपकी पार्टी के लिए वोट नहीं करूँगा |
ख) मैं आप के खिलाफ रैली निकालूँगा |
ग) मैं प्रधानमंत्री के दफ्तर या आपके पार्टी के दफ्तरों का घेराव करूँगा |
घ) मैं आप को कानोनी सीमा में बेइज्जत करूँगा |
च) मैं आप को पब्लिक-रैली में `गली गली में शोर है….` कहूँगा |
छ) ”मैं भगत सिंह के जैसे जवान, समर्पित लोगों को कहूँगा कि आपके खिलाफ मुझेसे जुड़ें” |
आदि , आदि |

(34) `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) आने के बाद, क्या करोड़ों लोगों के शिकायत करने से सिस्टम पर बोझ नहीं पड़ेगा ?
यदि आप `जनता की आवाज़` के आने के बाद की बात कर रहे हैं, तो करोड़ों एफिडेविट कैसे नुकसान करेंगी ? एफिडेविट के हर पन्ने के लिए रु. 20 का शुल्क लिया जयेगा, जो सभी खर्चों को पूरा करेगा वेतन सहित |
एक पन्ने को स्कैन (कंप्यूटर पर डालने के लिए) 100 किलोबिट चाहिए | यदि एक करोड़ एफ्फिदेवित के पन्ने दर्ज किये गए हैं, तो (एक करोड़ X 100 किलोबिट) = 10 टेराबिट चाहिए , जिसके लिए 60,000 रुपये चाहिए | और एक करोड़ प्रस्तावों को स्कैन (कंप्यूटर पर डालने) से आमदनी 20 करोड़ रुपये है | यदि वेतन की लागत भी गिना जाये, फिर भी ये प्रक्रिया/तरीका भारत सरकार को कोई हानि नहीं पहुँचायेगा | और 10 करोड़ प्रस्ताव भारत में किसी को कैसे नुकसान पहुँचायेगा ?
कलेक्टर और पटवारी जरूरत के कर्मचारियों को बढ़ा सकता है और पूरा सिस्टम जो `उपयोग करो और भुगतान करो` आधारित है, अपने आप में पूरा है, और सरकार या किसी और पर कोई बोझ नहीं डालेगा |
और हर एक शिकायत को सुनने के लिए या एक भी शिकायत को सुनने के लिए अधिकारी के लिए कोई बंधन नहीं है क्योंकि ये केवल एक राय इकठ्ठा करने की प्रणाली (सिस्टम) है जिसमें हर राय हमेशा देखी जा सकती है और जाँची जा सकती है, किसी के भी नागरिक द्वारा | लेकिन अधिकारी उन शिकायतों को नजर-अंदाज नहीं कर सकते, जो लाखों लोगों की है |

(35)  हम प्रायवेट वेबसाइट का प्रयोग क्यों नहीं प्रयोग करते पब्लिक की शिकायतों को डालने के लिए, पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) में ?

“ प्रायवेट वेबसाइट पब्लिक की शिकायतों के लिए “ का प्रयोग करने का कोई फायदा नहीं है | किसी को भी ये रूचि और भरोसा नहीं होगा कि मेरी वेबसाइट क्या कहती है | उदाहरण से, मैं एक एफिडेविट डाल सकता हूँ “ मनमोहन को फांसी लागों” और दो महीनों में मान लीजिए , 5 करोड़ों नागरिकों ने `हां` दर्ज कर दिया | तब क्या आप मानेंगे कि मैंने ये नंबरों को फर्जी नहीं बनाया है ? यदि मैं एक प्रायवेट वेबसाइट चलाता हूँ `पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम)` के लिए, तो आप मेरे को फर्जी-धोखेबाज कहेंगे और यदि आप एक प्रायवेट `पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम)` के लिए वेबसाइट चलाते हो, तो मैं आप को फर्जी-धोखेबाज कहूँगा | फिर, मुझे कोई कांग्रेस का एजेंट कहेगा और फिर आपको भा.जा.पा का एजेंट कहेगा | सरकारी वेबसाइट सबसे कम बेईमान है, मतलब सबसे ज्यादा भरोसेमंद |  असल में, सभी प्रायवेट वेबसाइट की कुछ भी भरोसा नहीं है, राजनैतिक मामलों में, क्योंकि इन वेबसाइट के मालिक कोई भी फर्जी संख्या बना सकते हैं | जरा मीडिया (अखबार, टी.वी. वाले आदि) के बिके हुए हुए समाचार और सर्वेक्षणों को देखें | जब संख्याओं की कोई विश्वसनीयता नहीं होगा, तो फिर कोई भी अपना `हाँ`/`ना` दर्ज करना नहीं चाहेगा |
अभी प्रस्तावित पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (जनता की आवाज ; टी.सी.पी.) कुछ भी नहीं पर एक सरकारी आदेश है, जो हम, आम-नागरिकों को प्रधानमंत्री के वेबसाइट पर शिकायतें, इस तरह डालने देगा कि सभी पढ़ सकते हैं | कृपया फिर से तीनों धाराएं पढ़ें | तीसरी धारा का कोई भी कानूनी या अन्य प्रकार का बंधन नहीं है | और दूसरी धारा इसीलिए है क्योंकि कलेक्टर के दफ्तर, जो कम संख्या में हैं पर बोझ न पड़े | इसीलिए, पटवारी/लेखपाल के दफ्तर जो हर तीन-चार गांव के बीच एक होता है, या हर तीन-चार वार्ड के बीच एक होता है, जाकर नागरिक को पहले से कलेक्टर के दफ्तर में किसी अन्य नागरिक द्वारा दर्ज शिकायत पर `हां`/`ना` दर्ज कर सके |

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किसी भी तरह की एफिडेविट डाली जा सकती है, और यदि शिकायत में अपमान करने वाले शब्द लिखे हैं तो डालने वाले पर केस (मामला) कर दिया जाएगा और एफिडेविट निकाल दी जायेगी | कोई भी कानून की अदालत एफिडेविट को हटाने का आदेश दे सकती है | और बाद में, ऐसे क़ानून जोड़े जा सकते हैं, जिससे उस व्यक्ति, जिसने आपमान के शब्द वाला एफिडेविट डाला है, उसके एफिडेविट डालने का अधिकार कई सालों तक सस्पैंड / निलंबित किये जा सकते हैं | बिलकुल वैसे ही जैसे , मीडिया (समाचार पत्र, टी.वी. वाले) कुछ भी छाप सकता है लेकिन वो जिम्मेदार है कि क्या छापते हैं | लेकिन सामान्य तौर पर कोई भी मीडिया वालों को छापने से नहीं रोक सकते हैं , कार्य किये जाने से पहले |

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कलेक्टर एफिडेविट दर्ज करने का काम तहसीलदार को भी दे सकता है, यदि उसको लगे की उसके लिए सुविधाएं वहाँ उपलब्ध हैं | सुविधाएं जो होनी चाहिए एफिडेविट दर्ज करने के लिए – एक अच्छा कैमरा शिकायत, प्रस्ताव आदि की एफिडेविट दर्ज करने वाले का फोटो लेने के लिए, अंगुली की छाप लेने के लिए मशीन और वोटर आई.डी स्कैन करके कंप्यूटर में डालने के लिए मशीन | इस तरह, गांव के स्तर पर भी ये जा सकती है, निकट भविष्य में | लेकिन कलेक्टर के दफ्तर या तहसीलदार के दफ्तर जाना, जन-हित याचिका दर्ज करने से ज्यादा आसान है, क्योंकि जन-हित याचिका दर्ज करने के लिए किसी को हाई-कोर्ट या सुप्रीम-कोर्ट जाना पड़ता है और जिसके लिए भारी रिश्वतें देनी पड़ती हैं |

(36) एक दूर-दराज के गांव का व्यक्ति, राष्ट्रिय स्तर का व्यक्ति जैसे प्रधानमंत्री, आदि का चुनाव कैसे करेगा ?

आज, एक गांव या कसबे में व्यक्ति को कोई भी अपने दूर के स्थान का समाचार पाने के लिए कोई समाचार-पत्र, टी.वी. चैनल या अन्य मीडिया पर निर्भर रहना पड़ता है | लेकिन आज 90 % मीडिया बिके हुए हैं और वे वो ही समाचार देते हैं, जिसके लिए उनको पैसे मिलते हैं | इसलिए उस समाचार का कोई भरोसा नहीं है |
लेकिन जब `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)` प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर और आदेश द्वारा लागू हो जायेगा, तो उसके द्वारा `प्रजा अधीन-प्रधानमंत्री`/`राईट टू रिकाल-प्रधानमंत्री आदि भ्रष्ट को निकालने/बदलने की प्रक्रियाएँ आ जाएँगी, तब कोई भी किसी अधिकारी के बारे में समाचार डाल सकता है एफिडेविट में, कलेक्टर के दफ्तर जाकर | और यदि लाखों–करोड़ों लोग, उसका पटवारी के दफ्तर जाकर समर्थन करते हैं, अपना वोटर आई.डी. और अँगुलियों की छाप द्वारा जांच भी करवाते हुए, तो वो समाचार / जानकारी भरोसे वाली होगी | दूसरे शब्दों में, ये लोकतान्त्रिक तरीके/प्रक्रियाएँ अपने आप में एक वैकल्पिक मीडिया बन जाएँगे, जो भरोसेमंद समाचार, किसी भी नागरिक द्वारा कभी भी जाँची जा सकने वाले समाचार देंगे |
पहले दौर में तो कोई भी जानकारी मूहं-जुबानी फैलेगी | दूसरे दौर में, क्योंकि ये किसी भी नागरिक द्वारा जांचे जा सकने वाला समाचार देने वाला वैकल्पिक, आम-नागरिकों का मीडिया होगा, तो आज की बिकी हुई मीडिया भी मजबूर हो जायेगी कि सच्चा समाचार आम-नागरिकों को बताये वर्ना उसे अपना धंधा बंद करना पड़ सकता है |
(37) हम को `राईट-टू रिकाल` सांसदों और निचले पदों के ऊपर क्यों चाहिए जब हमारे पास `राईट टू रिकाल-प्रधानमंत्री` है ?

सबसे पहली बात तो ये है कि ये सभी ड्राफ्ट टी.सी.पी. (जनता की आवाज़ ; पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली) द्वारा लाये जाने हैं | टी.सी.पी. आने के दूसरे दिन मैं या कोई और ये ड्राफ्ट कलेक्टर के दफ्तर जाकर स्कैन करवा कर, प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर डलवा सकते हैं और करोड़ों आम-नागरिकों के साबित किये जाने वाला समर्थन और दबाव द्वारा ये ड्राफ्ट लागू होंगे |

भारत में 700 जिले हैं और हर जिले में एक 20-30 बड़े अधिकारी जैसे कलेक्टर, एस.पी, जिला शिक्षा अधिकारी, जिला राशन अधिकारी, आदि हैं | ऐसा कोई तरीका नहीं है कि प्रधानमंत्री अकेला ही 700×30=2100 बड़े अधिकारियों की देख-रेख कर सके | तो फिर, प्रधानमंत्री को सुपरवायसरों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो इन 21,000 बड़े अधिकारों पर नजर रख सकें | ये सुपरवायसरों को कुछ भी नाम या इनाम नहीं मिलेगा, सारा नाम-इनाम और वाह-वाही प्रधानमंत्री को मिलेगी | इसीलिए ये बीच के लोग , भ्रष्ट और आलसी / सुस्त हो जाएँगे | और जिले के बड़े अधिकारियों को अच्छा काम करने के लिए कोई नाम-इनाम नहीं मिलेगा | इसीलिए, वो वही करेंगे जो सुपरवायसर कहेंगे और रचनात्मक (कुछ अलग और अच्छा सोचने और करना) होना बंद कर देंगे |
जबकि यदि `राईट टू रिकाल` जिले और राज्य के अधिकारियों पर आ जाता है, तो अधिकारियों को दिखेगा कि जनता की राय उसको केवल सजा ही नहीं दे सकती है, बल्कि अच्छा काम करने पर इनाम भी दे सकती है और उसकी तरक्की भी हो सकती है | उदाहरण से, `राईट टू रिकाल-जिला शिक्षा अधिकारी` का जो हम ने तरिका बताया है, उसमें देख सकते हैं कि नागरिक एक व्यक्ति को 10 जिलों तक शिक्षा अधिकारी बना सकती है | और अधिक जिलों का अधिकारी बनने पर वेतन भी उतनी गुना बढ़ेगी | इसीलिए उसके पास कारण और प्रेरणा / बढ़ावा है अच्छा काम करने के लिए | लेकिन यदि वो केवल प्रधानमंत्री के नीचे काम करता है, बिना उसके ऊपर `राईट टू रिकाल` के , उसके पास कोई भी कारण या प्रेरणा / बढ़ावा नहीं रहेगी, और अच्छा काम करने की |

(38)  लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं के अभाव में देश और देशवासियों को क्या नुकसान हो सकता है ? ये लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं का क्या लाभ है ? हम इसके बदले समाज सेवा करनी चाहिए जैसे गरीब बच्चों को पढ़ाना, आदि देश की व्यवस्था को सुधरने के लिए | हमें एक अच्छा प्रधानमंत्री या नेता चाहिए ये लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं को लागू करवाने के लिए |

लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं के अभाव में जैसे `पारदर्शी शिकयत / प्रस्ताव प्रणाली`, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, जज आदि पर राईट टू रिकाल, जूरी सिस्टम, कोर्ट, पोलिस अन्यायपूर्ण होंगे और विदेशी कंपनियों की तरफदारी करेंगे और उन्हें देश पर अपना वर्चस्व बढ़ाने देंगे | विदेशी कंपनियों के प्रशासन, नयायपालिका, मीडिया, नियंत्रक संस्थओं जैसे लोकपाल आदि पर वर्चस्व बढ़ने से स्थानीय उद्योगों का नाश होगा, देश की गणित/विज्ञान की शिक्षा कमजोर होगी, देश की खेती का नाश होगा, कोई भी असली उत्पादन नहीं होगा देश में और देश विदेशी कंपनियों के पराधीन हो जायेगा | सभी या अधिकतर माल को बहार के देशों से आयत किया जायेगा, देश की सेना और कमजोर हो जायेगी (अभी भी देश की सेना बहुत कमजोर है) और अवैद्य बंगलादेशियों का आना बढ़ जायेगा जिसके कारण कभी भी विदेशी आक्रमण कर सकते हैं |

आज, ज्यादा से ज्यादा गरीब नक्सलवाद या ईसीई धर्म-प्रचारकों या दोनों की तरफ जा रहे हैं अच्छा खाना, दवाई, शिक्षा आदि पाने के लिए | बाद में, इससे आतंकवाद बढ़ेगा, जैसे कि नेपाल में हुआ था और उड़ीसा, आंध्रप्रदेश के भाग, मध्यप्रदेश के भाग, छत्तीसगढ़ के भाग, आदि में आपसी विवाद बढ़ सकते हैं |
देश बाद में कई फिलीपीन जिसे विदेशी कंपनियों के कटपुतली, आर्थिक-गुलाम देश या पूरे गुलाम देश जैसे इराक में टूट जायेगा | भौतिक या आर्थिक गुलाम बनने के बाद, देश के 99% नागरिकों को लूट लिया जायेगा और उच्च वर्ग के लोग भी नहीं बच सकेंगे इस लूट से |

एक तानाशाह या अच्छा, ताकतवर नेता यदि प्रधानमंत्री भी बन जाये, तो भी इतना शक्तिशाली नहीं है कि विदेशी कंपनियों की ताकत का सामना कर सके | आज, विदेशी कंपनियों का अधिकतर मुख्यधारा के मीडिया, संगठित सामाजिक मीडिया, स्वयंसेवी संस्थाओं और न्यायपालिका पर बहुत प्रभाव है | बिके हुए मीडिया पर अपना प्रभाव का प्रयोग करके, विदेशी कंपनियों की लोबी नकली कांग्रेस विरोधी, क्लोन (हमशकल) लोग जैसे अन्ना, अरविन्द केजरीवाल, सुब्रमनियम स्वामी आदि बना सकते हैं और वोटों का बटवारा कर सकती हैं ताकि कोई भी पार्टी या पार्टियों के समूह को बहुमत न मिले | ये स्तिथि विदेशी कंपनियों की लोबी के लिए काबू में करना बहुत आसान है | विदेशी कंपनियों द्वारा प्रायोजित, बिका हुआ मीडिया, नकली लोग जैसे अन्ना, अरविन्द केजरीवाल, सुब्रमनियम आदि को समाधान बताता है और कार्यकर्ताओं को अधूरी जानकारी देता है | कार्यकर्ता ऐसे समय बरबाद करने वाले लोगों के भक्त बन जाते हैं और अपना समय भी बरबाद करते हैं | इस तरह समाधान-ड्राफ्ट की कभी भी बात नहीं होती है |

मान लीजिए किसी पार्टी या पार्टियों के समूह को किसी तरह बहुमत मिल जाती है, लेकिन किसी भी पार्टी के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है, बिना जिसके संसद में कानून बनाना संभव नहीं है | दोनों सदनों में बहुमत मिलना लगभग असंभव है और इसके लिए कम से कम 10 साल लगेंगे | मान लीजिए कि किसी तरह 10 सालों में, कोई पार्टी आय पार्टियों के समूह को दोनों सदनों में बहुमत मिल जाता है और ये लोकतान्त्रिक कानून भी पारित कर देते हैं, फिर भी सुप्रीम-कोर्ट के जज, जो अधिकतर भ्रष्ट विदेशी कंपनियों के एजेंट होते हैं, ये कानून को रद्द कर सकते हैं | 1977 में, अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी के एजेंट जज ने इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री/संसद के पद को रद्द कर दिया था बिना कोई ठोस कारण के |

संक्षिप्त में, भ्रष्ट विदेशी कंपनियों के लोबी कोई भी ताकतवर प्रधानमंत्री को दबा सकती है या उसे खरीद सकती है या उसे मरवा सकती है जैस लाल बहादुर शास्त्री को मरवाया था | केवल करोड़ों नागरिक उधम सिंह केंद्रित, कार्यकर्ता संचालित, समाधान कानों-ड्राफ्ट के नेतृत्व में, लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं के लिए जन-आन्दोलन द्वारा भ्रष्ट विदेशी कंपनियों के लॉबी का सामना कर सकते हैं और जनत के नौकरों को मजबूर कर सकते हैं कि ये लोकतान्त्रिक कानूनों को भारतीय राजपत्र में डालें (भरतीय राजपत्र का मतलब प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री द्वारा सरकारी अफसरों को छाप कर दिए गए निर्देश)

सामाजिक कार्य और सक्रियतावाद बहुत अलग हैं | सक्रियतावाद में शामिल है आम-नागरिकों को देश के  लिए अच्छे-बुरे प्रक्रिया-ड्राफ्ट के बारे में बताना | और अच्छे प्रक्रिया-ड्राफ्ट को देश के ज्वलंत समस्या, जैसे विएशी कंपनियों का वर्चस्व, कमजोर होती सेना, अवैद्य बंगलादेशी गुसपैठ, अन्यायपूर्ण नयायपालिका, गरीबी, आदि के लिए समाधान कानून-ड्राफ्ट लाने का प्रयत्न करना भी सक्रियतावाद में शामिल होता है | मैं सामाजिक कार्य को कम नहीं अंक रहा हूँ लेकिन समाज सेवा देश की कोर्ट, सेना और पोलिस को सुधारने के लिए पर्याप्त नहीं है | सेना, कोर्ट, पोलिस की आवश्यकता है स्कूलों की सुरक्षा करने के लिए और राईट टू रिकाल-शिक्षा अधिकारी, `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली` आवश्यक हैं देश का शिक्षा स्तर सुधरने के लिए |
(39) क्या कोई मोटा तरीका है, झूठी जानकारी जांचने के लिए जो मीडिया (समाचार पत्र, टी.वी., पाठ्य-पुस्तकें, आदि) देता है, `पारदर्शी शिकायत प्रणाली (सिस्टम) और दूसरे प्रक्रियाएँ के आभाव में, जिसके द्वारा हर नागरिक कोई भी जानकारी खुद जांच कर सकता है ?

ऐसी प्रक्रियाएँ, जिनके द्वारा हम आम-नागरिक दूसरे नागरिकों के बारे में जानकारी को जांच कर सकते हैं, के अभाव में, मीडिया (टी.वी. चैनल, समाचार-पत्र, पाठ्य-पुस्तक आदि) और अन्य लोग भी हमें गलत जानकारी दे सकते हैं जैसे `आम-नागरिक बेवकूफ, बेकार, हिंसक, जातिवाद हैं`, `लोग और ट्रस्ट अपने वोट बेचते हैं` आदि | लेकिन हम ना तो उस जानकारी को सही साबित कर सकते हैं और ना ही गलत |

अब जब तक हमें `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) जैसे प्रक्रियाएँ न मिल जायें, कुछ मोटे तरीके हैं, जिनके द्वारा हम कोई भी जानकारी की जांच कर सकते हैं कि सही है या झूठी |

ऐसे लोगों के बारे में विचार करने से पहले जो हमारे पहुँच से बाहर हों, हमें पहले सच्चाई उन लोगों से पता लगाना चाहिए , जो हमारे आस-पास हैं, जो हमारे पहुँच के भीतर हैं, जैसे हम खुद, हमारे दोस्त, हमारे रिश्तेदार और फिर दूसरे लोग हमारे मोहल्ले में |
    और फिर आप के लिए परिणाम, अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए जो परिणाम आते हों, वो ही दूसरे नागरिकों के लिए भी हैं | राज्य और देश के दूसरे नागरिक आपके मोहल्ले से अलग नहीं हैं |

कुछ उदाहरण लेते हैं –
1) मीडिया कहता है `लोग और संस्थाएं अपने वोट बेचते हैं ` लेकिन कोई भी सबूत नहीं देते, जैसे बेचने की रसीद आदि | ध्यान रखें की मतदान गुप्त होता है | इसीलिए, पहले अपने से पूछें कि क्या आपने अपना वोट बेचा है ? फिर अपने रिश्तेदार और दोस्तों से ये प्रश्न पूछें | उसके बाद , अपनी आस पास के लोगों से ये पूछें कि क्या उन्होनें खुदअपना वोट बेचा है और यदि कोई व्यक्ति या संस्था बोलते हैं कि उन्होंने अपना वोट बेचा है, तो उनसे इसका सबूत देने के लिए कहें |

2) मीडिया अक्सर कहता है कि आम-नागरिक मूर्ख है, हिंसक है, कोई भी निर्णय नहीं ले सकता , आदि |
पहले देखें कि ये आप पर लागू होता है क्या, फिर उसके बाद देखिये कि ये आपके दोस्तों और रिश्तेदारों पर लागू होता है | अंत में पूछिए और देखिये कि ये आप के मोहल्ले के कितने लोगों पर लागू होता है |

3) हम एक ऐसा तरीका बताते हैं जिसके द्वारा आप जांच कर सकते हैं कि कोई नेता या कोई संस्था को कितनी जनता जानती है |

मीडिया कह सकता है कि फलाना नेता या संस्था के करोड़ों समर्थक हैं, यहाँ तक की उस नेता या संस्था के लोग भी कई बार, बड़ा-चढ़ा कर समर्थकों की संख्या बताते हैं |
जब `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) आएगा, तब इस तरह की जानकारियाँ आसानी से मिल सकती हैं और हर नागरिक द्वारा जाँची भी जा सकती हैं | कोई भी आम-नागरिक कोई भी जानकारी डाल सकता है कलेक्टर के दफ्तर जाकर और दूसरे लोग इसका समर्थन कर सकते हैं पटवारी/लेखपाल के दफ्तर जाकर | और ये सब जानकारी जाँची जा सकती है किसी भी नागरिक द्वारा क्योंकि समर्थकों के वोटर आई.डी. की जानकारी और अँगुलियों के छाप लिए जाएँगे और कोई भी उन्हें प्रधानमंत्री के वेबसाइट पर देख सकता है |

लेकिन, `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)` के अभाव में, कौन सा मोटा तरीका का प्रयोग किया जा सकता है, पता लागने के लिए कि कोई नेता या संस्था को कितनी जनता जानती है  |
आज के समय में, 70-80% नागरिक टी.वी. नहीं देखते या समाचार-पत्र नहीं पढ़ते | इसीलिए वे मीडिया द्वारा सीधे प्रभावित नहीं होते |
इसीलिए हमने ये तरीका का सुझाव दीया है जानने के लिए कि कोई नेता या संस्था आम-जनता के बीच कितना जाने जाते हैं –

कोई पांच लोगों का चुनाव करें आपके मोहल्ले में से, जो समाचार पत्र नहीं पढ़ते या टी.वी. नहीं देखते . और उनसे ये प्रश्न पूछें (ये केवल नमूना प्रश्न हैं, आप अपने प्रश्न भी बना सकते हैं)-
1) `भारत स्वाभिमान न्यास` क्या है ?
2) बाबा रामदेव कौन हैं ?
3) `इंडिया अगेंस्ट कर्रप्शन` क्या है ?
4) अन्ना हजारे कौन है ?
5) इंदिरा गाँधी कौन है ?
6) जनलोकपाल बिल क्या है ?
7) काला धन क्या है ?

8) काला धन कहाँ है ?
9) काला धन आम-नागरिकों को कैसे मिल सकता है ?
10) लालू यादव कौन है ?

कृपया ये और इस प्रकार के प्रश्न पूछें और उनकी राय और मोहल्ला बताएं, ताकि दूसरे भी जांच कर सकें कि ये जानकारी सही है या गलत |

(40)  क्या हमें `राईट टू रिकाल ` के तरीकों / प्रक्रियाओं के बजाय, कोई परीक्षा या कोई अन्य तरीके चाहिए, जो व्यक्ति-आधारित नहीं हों, विशेष पदों के लिए जैसे रिसर्व-बैंक गवर्नर, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि ?

`राईट टू रिकाल` / `प्रजा अधीन-राजा` (भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार) की प्रक्रियाएँ जो हमने प्रस्तावित किये हैं, कम व्यक्ति-आधारित (सब्जेक्टिव) हैं , आज के प्रक्रियाओं / तरीकों के तुलना में और ऊंचे पद, जैसे रिसर्व-बैंक गवर्नर, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि के लिए परीक्षाएं संभव नहीं हैं क्योंकि आसानी से परीक्षा-पत्र लीक हो सकते हैं या भ्रष्ट अमीर लोगों द्वारा परीक्षाएं प्रभावित किये जा सकते हैं |

इसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती कि परीक्षा अमीर भ्रष्ट द्वारा खरीदी नहीं जायेगी, मतलब वे आसानी से ख़रीदे जा सकते हैं | और जिन लोगों को करोड़ों आम-नागरिक समर्थन करेंगे, `राईट टू रिकाल` की प्रक्रियाओं के द्वारा, सालों राजीनीति में हर प्रकार के लोगों के संपर्क में रहने से थोड़ा अनुभव तो होगा, उस क्षेत्र के लिए, जिनके लिए करोड़ों आम-नागरिकों ने समर्थन किया है | करोड़ों लोग मूर्ख नहीं हैं कि एक बेकार, नामी व्यक्ति को पद के लिए समर्थन करें और अपने आप को नुकसान करेंगे |
सबसे ज्यादा हानि अच्छे चुनाव प्रक्रिया/तरीका के अभाव से नहीं होती, बल्कि जनता के लिए अधिकारी को निकालने के अच्छे तरीके के अभाव के कारण होती है | क्योंकि आम-नागरिकों के पास अधिकारी को बदलने / सज़ा देने का कोई तरीका न होने से अधिकारी मिली-भगत करके भ्रष्ट हो जाते हैं | और दूसरी ओर उनको जनता के लिए अच्छा काम करने के लिए कोई रूचि नहीं होती क्योंकि जनता उनको इसके लिए, उनकी तरक्की नहीं कर सकती है |

आज के समय, आम-नागरिकों को बहुत सारी जानकारी मीडिया देता नहीं है या सही देता नहीं है | लेकिन `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) लागू हो जाने पर, भरोसेमंद जानकारी मिलेगी हर नागरिक को, जो हर नागरिक खुद जांच सकता है कि सही है या नहीं | इसलिए, तब किसको `रिसर्व बैंक गवर्नर`, किसको प्रधानमंत्री बनाना है, और आसान हो जायेगा | (कुछ हद तक इन्टरनेट आने पर भरोसेमंद जानकारी मिलना शुरू हो गयी है | )

41) क्या लोग शिकायत / प्रस्ताव दर्ज करने के लिय या किसी शिकायत या प्रस्ताव या उम्मीदवार को समर्थन करने के लिए जाएँगे ? क्या आम-नागरिक ऐसा करने के लिए कोई दूसरा तरीका नहीं प्रयोग करेगा ?

ये सब शिकायत या प्रस्ताव या उम्मीदवार कैसा है, उसके ऊपर निर्भर है | यदि वो प्रस्ताव या शिकयत आम-नागरिकों को सीधे और तुरंत फायदा पहुँचाने वाला है, तो वे पटवारी/लेखपाल/तलाटी के दफ्तर जाएँगे शिकायत या प्रस्ताव या उम्मीदवार को समर्थन या विरोध करने | यदि कोई कहता है -`श्री `क` को प्रधानमंत्री बनाओ` और यदि श्री `क` समाज के लिए अच्छे कार्य नहीं कर रहा है , जिससे उसको देश या उस क्षेत्र के ज्यादा नागरिक नहीं जानते, कोई ज्यादा लोग प्रस्ताव को समर्थन नहीं करेंगे | लेकिन यदि श्री `क` को काफी नागरिक जानते हैं, क्योंकि श्री `क` जनता के लिए अच्छा काम कर रहा है, और वर्तमान प्रधानमंत्री आम-नागरिकों को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है, तो फिर काफी नागरिक उस प्रस्ताव का समर्थन करेंगे, क्योंकि उनको खोना केवल 3 रुपये है लेकिन उनको काफी फायदा हो सकता है अच्छा प्रधानमंत्री मिलने पर |
एक दूसरा उदाहरण `एम.आर.सी.एम` का है ,जो ये पक्का करेगा कि 300-400 रुपये हर महीने , हर नागरिक के खाते में सीधे जायेगा | अभी, 50 करोड़ मतदाता हर दिन 20 रुपयों से कम कमाते हैं | तो, उनमें से कितने कहेंगे, कि हमें ये 100% नैतिक (सही) 300-400 रुपये हर महीने नहीं चाहिए ? मेरे अनुसार, 5% भी ऐसा नहीं कहेंगे |
और जहाँ तक तरीका जो नागरिक अपनाएंगे अपने शिकायत / प्रस्ताव / उम्मीदवार के लिए समर्थन दर्ज कराने के लिए, नागरिक वो ही तरीका चुनेंगे, जिससे सबसे अधिक फायदा होगा, जिसमें लाखों/करोड़ों उनकी अर्जी या समर्थन या विरोध को देख सकें और अपनी हाँ/ना उसके साथ जोड़ सके और खुद हर नागरिक उसकी जांच भी सके | और वो तरीका में सबसे कम मेहनत और पैसा लगे, एक निश्चित प्रभाव होने के लिए | जहाँ तक हमने देखा और जाना है, ये तरीके बाकी सभी तरीकों से कहीं ज्यादा अच्छे हैं, विशेषकर जब लोगों को एक से ज्यादा अर्जी देनी है, या समर्थन या विरोध करना है एक से ज्यादा बार 2-3 सालों में |

42) क्या जात-पात, धर्म आदि तरफदारी / पूर्वाग्रह, इन तरीकों को प्रभावित नहीं करेंगे ?

जात-पात और धर्म आदि तरफदारी/पूर्वाग्रह नेता लोग बढ़ा-चढ़ा कर, मीडिया के मदद से बताते हैं | यदि आप अपने दोस्तों और रिश्तेदारों में पता करोगे, तो आप को पता चलेगा कि वो इतनी ज्यादा नहीं है |
और जाती, धर्म और दूसरे तरफदारी/पूर्वाग्रह, ज्यादा होती है जब कोई तरीके में भाग लेने वाले लोग कम हों | इन तरीकों में , लाखों-करोड़ों लोग भाग ले सकते हैं, इसीलिए जाती, धर्म की तरफदारी, यदि है भी तो एक-दूसरे को कट देगी और इसीलिए ये तरीके किसी भी प्रकार की तरफदारी/पूर्वाग्रह को वातव में / असल में कम करते हैं |

कैसे पक्षपात-जाती, धर्म आदि लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं से कम होते हैं ?

कृपया नोट करें कि कुछ हद तक तरफदारी या पक्षपात करना मानव में स्वाभाविक है लेकिन हमारे सिस्टम बिना कोई पक्षपात के बनाये जा सकते हैं |

A. वे तत्व जो निर्णय करते हैं कि कोई पक्षपात होता है कि नहीं हैं –

1. उपलब्ध उम्मीदवारों की तुलनात्मक अच्छाई या बुराई –

हालाँकि 95% लोग ये कहेंगे कि वे पक्षपात नहीं करते, लेकिन यदि उनके यहाँ के उम्मीदवार आपसी तुलना में उतने ही बुरे या उतने ही अच्छे हैं, तो पक्षपात प्रचालन में आता है |
मान लीजिए कि आपको बहार खाना पड़ जाये और सभी होटल एक जितनी ही खराब हैं और उन होटलों में से एक आपके रिश्तेदार की है, तो आप अपने रिश्तेदार का होटल जाना पसंद करेंगे, ये सोच कर कि शायद रिश्तेदार अच्छे बर्ताव करेगा और अच्छा खाना देगा | लेकिन यदि गैर-रिश्तेदार की होटल बाकी होटलों से कहीं अच्छी है और आपके रिश्तेदार के होटल से भी बहुत अच्छी है, तो लोग वो ही होटल जाना पसंद करेंगे |
ये ही स्तिथि वोट देते समय, कर्मचारियों को चुनने के समय भी आ सकती है |

2. पक्षपात की सम्भावना चुनने वाले व्यक्ति के विवेकाधीन शक्ति (स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार) के बढ़ने से बढ़ता है और पक्षपात की सम्भावना अधिकारी के मिली-भगत बनाने के अवसर बढ़ने से भी बढ़ता है –

यदि चुनने वाले / वोट देने वाले व्यक्ति के पास स्वतंत्र निर्णय करने के अधिकार हैं और मिली-भगत बनाने के अवसर हैं, तो अधिक सम्भावना है कि वो व्यक्ति अपना पक्षपात दिखायेगा |

एक मुख्यमंत्री अपना पक्षपात दिखा सके अपने रिश्तेदारों, जाती वाले, रिश्तेदारों आदि को चुन कर इसकी अधिक सम्भावना है, एक आम-नागरिक की तुलना में क्योंकि मुख्यमंत्री के पास स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिक अधिकार हैं |

सुप्रीम-कोर्ट का जज अपने रिश्तेदार के लिए एक मंत्री को जनता का वकील (सरकारी वकील) बनाने की सिफारिश करने के लिए कहेगा और मंत्री सुप्रीम-कोर्ट के जज को अदालती मामलों में अपने रिश्तेदारों का पक्ष में फैसला दिलवाने के लिए कहेगा |

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हमेशा आज के सिस्टम से शुरुवात करनी चाहिए | यदि आप आज का सिस्टम देखेंगे, तो आप पाएंगे कि जनता के नौकरों के हमेशा अपने स्वार्थ होते हैं | और जनता वही नौकरों के लिए वोट देती है, जिनके स्वार्थ जन-समूह के स्वार्थ के विरुद्ध नहीं जाते |

B. अल्प-लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं में, जन-समूह शीर्ष के कुछ जनता के नौकरों के पक्षपात को रोक नहीं सकते और शीर्ष के कुछ लोग गैंग बना लेते हैं और जन-समूह को लूटते हैं |

ये था आज के अल्प-लोकतान्त्रिक, अलोकतान्त्रिक तरीकों के बारे में, जो दुर्भाग्य से हमारे पास आज हैं |

अभी, लोकतान्त्रिक प्रक्रियों में भी कुछ पक्षपात और स्वार्थ होता है, लेकिन ये पक्षपात एक दूसरे को काट देते हैं और जो स्वार्थ आपस में समान रूप से विद्यमान हैं, वे उभर के आते हैं और वे ही लागू किये जाते हैं | ये स्वार्थ जन-समूह के स्वार्थ के विरुद्ध नहीं होते |

यदि लोकतांतिक प्रक्रियाएँ लागू हैं और मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री जैसे जनता के नौकर अपने रिश्तेदारों, मित्रों आदि की तरफदारी करते हैं, तो जो जन-समूह को इससे नुकसान होता है, वे आपस में मिलकर उस पक्षपात करने वाले जनता के नौकर को एक निष्पक्ष व्यक्ति से बदल देंगे | इसीलिए, लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं में, शीर्ष के लोग जन-समूह को लूट नहीं सकते | 

छोटे स्तर पर, आप लोकतंत्र को एक परिवार की तरह से समझ सकते हैं | परिवार के सदस्य अपने रुचियों को बताते हैं और फिर परिवार का मुखिया निर्णय लेता है, बहुमत परिवार के सदस्यों के रूचि के अनुसार | इसी प्रकार होता है देश का लोकतान्त्रिक सिस्टम |

C. राष्ट्रिय हित की बात

असल में, ऐसा कोई भी परिस्थिति नहीं है, जब कोई बात या चीज जनसँख्या के एक बड़े वर्ग को फायदा पहुंचायेगी और राष्ट्र के हित को नुकसान पहुंचायेगी |

यदि कोई इस तरह का दावा करता है, तो उसे कोई विशेष ड्राफ्ट जैसे `पारदर्शी शिकयत / प्रस्ताव प्रणाली`, राईट टू रिकाल-जिला शिक्षा अधिकारी, राईट टू रिकाल-प्रधानमंत्री आदि का संदर्भ देना चाहिए और वो पूरी परिस्थिति बतानी चाहिए जिसमें ये लोकतान्त्रिक ड्राफ्ट राष्ट्र हित को नुकसान पहुंचाएंगे | वो व्यक्ति परिस्थितियां देगा और एक-एक करके आपको उनको व्यावहारिक दृष्टि से असंभव साबित करना चाहिए | इस तरह, आप उसे या कमसे कम दर्शकों को ये मनवा सकते हैं कि ये लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ देश के लिए अच्छी हैं |

और कृपया नोट करें कि ली गयी आम-नागरिकों के राय की गिनती जनता के नौकरों पर बंधनकारी नहीं होगी | इसीलिए जनता के नौकर कोई विशेष परिस्थितियों में जन-समूह के राय के विरुद्ध और राष्ट्र हित में भी निर्णय ले सकते हैं |

ऐसा आज भी होता है, लेकिन आज, जब जनता के नौकरों के पास कोई तरीका नहीं हैं आम-नागरिकों की राय जानने का | इसीलिए, उनके अधिकतर फैसले जाने-अनजाने में जन-विरोधी होते हैं |

इसीलिए, प्रस्तावित लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ पक्षपात कम करती हैं और आज की अल्प-लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ पक्षपात को बहुत ज्यादा बढ़ाती हैं | 

D. कार्यकर्ताओं को क्या करना चाहिए ?

कृपया कुछ प्रस्तावित लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ जैसे पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (टी.सी.पी), राईट टू रिकाल-प्रधानमंत्री, राईट टू रिकाल-मुख्यमंत्री, राईट टू रिकाल-जज, आदि चैप्टर 1,6,7,21 www.righttorecall.info/301.h.pdf  में देखें | अकसर पूछे जाने वाले प्रश्न – www.righttorecall.info/004.h.pdf

इसीलिए कृपया ये लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं का प्रचार करें और इनकी मांग करें अपने फेसबुक वाल नोट, वेबसाइट आदि में डाल कर, विज्ञापन, पर्चे आदि देकर , यदि आप असल में हामरे देश के सिस्टम में पक्षपात कम करना चाहते हैं |

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कृपया किसी चुनाव का उदाहरण देते समय पूरी परिस्थिति बताएं और ये बताएं कि व्यक्ति के पास क्या वैकल्पिक उम्मीदवार थे वोट डालते समय या चुनने के समय |

अभी, यदि एक हिंदू वोटर वोट करता है एक हिंदू प्रत्याशी के लिए या एक हिंदू व्यक्ति एक हिंदू उम्मीदवार को चुनता है, तो केवल इसी आधार पर उसको पक्षपाती नहीं बोल सकते कि उसने मुसलमान प्रत्याशी के लिए वोट नहीं दिया | हमें ये भी देखना चाहिए कि मुसलमान उम्मीदवार ज्यादा अच्छा और कम पक्षपाती था हिंदू उम्मीदवार के तुलना में, जिसको वोटर ने पसंद किया या मुस्लमान उम्मीदवार हिंदू उम्मीदवार जितना ही बुरा या अच्छा था |

E. `जो ज्यादा मत पाया वो जीता` (फर्स्ट पास्त थी पोस्ट) सिस्टम का विशेष मामला, मतलब इस सिस्टम में एक व्यक्ति एक उम्मीदवार को वोट दे सकता है 

हमारे देश में `जो ज्यादा माता पाया वो जीता` वोट करने का सिस्टम है | उसमें एक व्यक्ति एक उम्मीदवार को वोट दे सकता है और जो उम्मीदवार एक वोट से भी जीतता है, वो विजेता घोषित किया जाता है |

इस सिस्टम में, क्योंकि एक वोटर के पास के ही वोट है, वो उस पार्टी के विरुद्ध वोट करता है, जिससे सबसे अधिक नफरत करता है |  

तो, यदि वोटर सबसे अधिक कांग्रेस से नफरत करते है, तो वो कांग्रेस के विरुद्ध वोट करेगा एक ऐसी पार्टी के लिए, जो मानी जाती है कि कांग्रेस के विरुद्ध जीतेगी, जैसे भा.जा.पा., स.पा. आदि | और यदि एक वोटर भा.जा.पा. से नफरत करता है, तो वो भा.जा.पा. के विरुद्ध वोट करेगा ऐसी पार्टी के लिए, जो भा.जा.पा. के विरुद्ध जीत सकती है ऐसी मान्यता हो |

इस तरह, निर्दलीय आदि., पार्टियां जो नयी हैं और जिनकी जीतने की अवधारणा (मान्यता) नहीं है, उनको पर्याप्त वोट नहीं मिलेंगे | ये सिस्टम नए उम्मीदवारों को दबाता है |

ये समस्या 800 साल पुरानी है और इसका समाधान भी 800 साल पुराना है, जो कि है `पसंद के अनुसार एक से अधिक प्रत्याशी को वोट`, जहाँ हरेक वोटर एक से पांच उम्मीदवारों को वोट देता है, पसंद के क्रम अनुसार वोट दे सकता है | इस तरह कोई नागरिक-वोटर उस व्यक्ति को वोट दे सकता है, जिसे वो सबसे अधिक उपयोक्त समझता है और उसे भी वोट दे सकता है, जो माना जाता है जीतेगा उसके विरुद्ध जिसको वो नागरिक सबसे अधिक नफरत करता है | इस तरह नए उम्मीदवार और निर्दलीय के जीतने की सम्भावना अधिक हो जाती है इस सिस्टम में |

कृपया चैप्टर 40, www.righttorecall.info/301.h.pdf  देखें `पसंद के अनुसार वोट` के लिए |

F. अल्पसंख्यकों को आरक्षण की बात –

कृपया नोट करें कि आरक्षण का लाभ, आरक्षण मिलने वाली किसी जाती, धर्म के केवल शीर्ष के 1% को ही जाता है | क्योंकि नौकरियों या सीटों की संख्या सीमित है, केवल अल्पसंख्यों के सबसे गरीब वर्ग, जिनके पास ना तो पैसा है और ना ही कोई संपर्क, उनको ही आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है |

फिर नेता आरक्षण के वायदे क्यों करते हैं ?

क्योंकि उनको इन अल्पसंख्यकों के उच्च वर्ग से सांठ-गाँठ बनानी होती है | नेता ये सुनिश्चित करते हैं कि इन अल्प-संख्यकों के उच्च वर्गों को आरक्षण का लाभ मिले और बदले में, ये उच्च वर्ग, जिनका मीडिया या अपने समूह में कुछ प्रभाव होता है, इन नेताओं के लिए प्रचार करते हैं या उनको मीडिया द्वारा प्रचार, धन या कोई अन्य लाभ भी दिलवाते हैं | कहे जाने वाले मुस्लिम वोट बैंक के पीछे अधिकतर ये ही  असली कारण है |

और, उच्च वर्ग जिनको आरक्षण का लाभ मिलता है, वे अपने समूह के निचले वर्ग के लोगों में, नेता की छवि सुधरने के लिए प्रचार करते हैं | हमारे देश में, किसी समूह के निचले वर्ग, उस वर्ग के उच्च वर्ग पर निर्भर रहते हैं, रोज के जरूरतों के लिए | एक बार `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली`, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, सांसद, विधायक, जज, अधिकारीयों पर राईट टू रिकाल, जूरी सिस्टम, आदि जैसे लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ आ जाएँगी, तो निचले वर्ग के लोग फिर उच्च वर्ग के ऊपर निर्भर नहीं रहेंगे |

यदि कोई सचमुच रूचि रखता है आरक्षण कम करने के लिए और वो भी गरीब दलितों और अनुसूचित जनजाति के सहमति से तो कृपया चैप्टर 36, www.righttorecall.info/301.h.pdf  देखे |

43) टी.सी.पी. (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली) और राईट टू रिकाल की प्रक्रियाएँ बड़े स्तर के भ्रष्टाचार कैसे कम करेंगे ? क्या यदि मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री अपनी नौकरी जाने से नहीं डरें और बड़े स्तर के भ्रष्टाचार जैसे कोयला घोटाला आदि करें और बाद में देश छोड़ कर भाग जायें ?

मान लीजिए कि कोयला घोटाले में कोई भ्रष्ट प्रधानमंत्री एक भ्रष्ट उद्योगपति को प्रस्ताव देता है कि तुम मुझे 1000 करोड़ जमा दे दो विदेशी गुप्त खाते में और 10,000 करोड़ का कोयला का ब्लाक (खंड) ले जाओ 100 रुपये प्रति टन की रोयल्टी देकर, जबकि बाजार में कोयले की कीमत 2500 रुपये प्रति टन है |
अब राईट टू रिकाल, टी.सी.पी. के आने के बाद ये कैसे बंद हो जायेगा ?

क्योंकि उद्योगपति द्वारा रिश्वत दिया गया पैसा को कोयला ब्लाक से कमाने में काफी समय लगेगा और टी.सी.पी., सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (देखें चैप्टर 5, www.righttorecall.info/301.pdf) आने के बाद आम-नागरिक उद्योगपति से उसको दिया हुआ कोयला ब्लाक छीन सकते हैं और उद्योगपति को बहुत नुकसान होगा | इसीलिए ऐसी प्रक्रिया होने पर उद्योगपति ऐसी रिश्वत नहीं देगा |
दूसरा, टी.सी.पी. द्वारा लोग भ्रष्ट प्रधानमंत्री को फांसी या सजा देने की मांग भी कर सकते हैं और करोड़ों के दबाव द्वारा ये फांसी या सजा हो भी सकती है, तो प्रधानमंत्री सजा के डर से रिश्वत नहीं मांगेगा |

इस प्रकार टी.सी.पी. और सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी) आने से बड़े भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेंगे |

44) क्या `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली` (टी.सी.पी) किसी देश या कहीं और लागू की गयी है ? ये प्रक्रिया पहले छोटे स्तर पर लागू होनी चाहिए और फिर राष्ट्रिय स्तर पर लागू होनी चाहिए |

नहीं | ये प्रस्तावित प्रक्रिया अभी तक कहीं भी लागू नहीं की गयी है | विकसित देशों में, आम-नागरिकों की स्तिथि इतनी बुरी नहीं है क्योंकि वहाँ लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ हैं जैसे जूरी सिस्टम, राईट टू रिकाल, प्रभावशाली संपत्ति-कर, विरासत-कर, आदि | आप किसी मुख्यमंत्री को लिख सकते हैं इस प्रक्रिया को भारतीय राजपत्र में डालने के लिए और नगर / जिले स्तर पर लागू करवाने के लिए | यदि आप ऐसा करते हैं, तो हम आपका समर्थन करेंगे |

45) क्या ये राय इकठ्ठा करने वाले प्रक्रियाएँ कोई बदलाव ला सकती हैं ? यदि किसी शिकायत या प्रस्ताव के लिए करोड़ों अनुमोदन भी आ जायें, तो क्या अधिकारी या जनता के नौकर मजबूर होंगे कोई कदम उठाने के लिए ?

ये केवल राय इकठ्ठा करने के प्रक्रियाएँ नहीं हैं, ये जनता की राय को साबित करने की भी प्रक्रियाएँ हैं | अधिकारी मजबूर होंगे कोई कदम उठाने के लिए यदि लाखों/करोड़ों अनुमोदन आयेंगे किसी भी शिकायत या प्रस्ताव के लिए और ये साबित करके आम-नागरिक दबाव डाल सकते हैं | अधिकारी कोई उचित कदम उठाएंगे क्योंकि उन्हें नौकरी जाने का डर होगा, सजा होने का डर होगा, उनका नाम खराब होने का डर होगा और ये भी डर होगा कि यदि उन्होंने कुछ नहीं किया, फिर उधम सिंह उचित कदम उठाएगा उनके विरुद्ध |

`पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली` और अन्य लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ दिशा देती हैं उधम सिंह को उचित कदम उठाने के लिए आम-नागरिकों के अधिकारों के लिए | ये प्रक्रियाएँ ये सिद्ध करती हैं कि जन-समूह की राय क्या है |

उधम सिंह के बारे में अधिक जानकारी के लिए कृपया प्रश्न 33 का उत्तर देखें |

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