(4) महंगाई के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न


 

प्रश्न 1-महंगाई का असली कारण क्या है ?

    सामान्य तौर पर महंगाई तभी बढ़ती है जब रुपये (एम 3) बनाये जाते हैं लोन,आदि के रूप में और भ्रष्ट अमीरों को दिए जाते हैं, जिससे प्रति नागरिक रुपये की मात्रा बढ जाती है और रुपये की कीमत घाट जाती है और दूसरे चीजों की कीमत बढ जाती है जैसे खाद्य पदार्थ/खाना-पीना, तेल आदि | भारतीय रिसर्व बैंक के आंकडो के अनुसार, प्रति नागरिक रुपये की मात्रा (देश में चलन में कुल नोट,सिक्कों और सभी प्रकार के जमा राशि का कुल जोड़ को कुल नागरिकों की संख्या से भाग किया गया ) 1951 में 65 रुपये प्रति नागरिक थी और आज, 2011 में लगभग 50,000 रुपये है प्रति नागरिक | 

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सब चीजों का मूल्य सापेक्ष/तुलनात्मक है और मांग और आपूर्ति/सप्लाई के अनुसार निर्धारित/पक्का होता है | मान लो , केवल एक बाजार है और कुछ नहीं ,आसानी से समझने के लिए | बाजार में , एक बेचनेवाला है जो 10 किलो आलू बेच रहा और एक खरीदार जिसके पास सौ रुपये हैं | मान लो अगली स्थिति में, बेचनेवाले के पास 10 किलो आलू के बजाय 20 किलो आलू हो जाते हैं, तो क्या अब आल का दाम घटेगा कि बढेगा ?

आसान सा अनुमान/अंदाजा – आलू का दाम घटेगा क्योंकि आलू की सप्लाई/आपूर्ति बढ गयी है |

एक और स्थिति में , मान लो बेचने वाले के पास 10 किलो आलू हैं लेकिन अब दो खरीदार हैं और दोनों के पास 100-100 रुपये हैं | अब, आलू का दाम घटेगा या बढेगा ?

आसान सा अंदाजा/अनुमान- आलू का दाम बढेगा क्योंकि रुपयों की सप्लाई बढ गयी है और इसीलिए रुपये की कीमत घटेगी और दूसरे सामान का दाम बढेगा जैसे खाना-पीना, पेट्रोल, गैस, आदि |

असलियत में भी ऐसे ही होता है |

अब हम कुछ प्रश्न लेते हैं –

प्रश्न 2– ये रुपये कौन बनाता है और ये रूपये कहाँ से आते हैं(रुपये=एमदेश में सभी नोट,सिक्के और सभी प्रकार के जमा राशि का जोड़ है ) ?

 

रिसर्व बैंक के पास लाइसेंस है रुपयों को बनाने का और अनुसूचित बैंक(बैंक जिनको रिसर्व बैंक ने लाइसेंस दिया है रुपयों को बनाने का जमा राशि के रूप में ) के पास भी | कोई स्वर्णमान (गोल्ड स्टैण्डर्ड) अभी नहीं है (कि जितना सोना है , उतना ही पैसा बना सकते हैं) , क्योंकि वो कई दशक पहले पूरी दुनिया में रद्द हो गया है | रिसर्व बैंक गवर्नर/राज्यपाल रुपयों को सरकार के कहने पर बनाता है |

केवल रिसर्व-बैंक ही नोट छाप सकती और सिक्के बना सकती है लेकिन अनुसूचित बैंक जैसे स्टेट बैंक, आई.सी.आई.सी.आई., आदि, भी रुपये (एम 3) बना सकते हैं जमा राशि के रूप में | ये रुपयों की सप्लाई/आपूर्ति में बढने से रुपयों का मूल्य/दम कम हो जाता है और ये दूसरे सामान का दाम बड़ा देता है जैसे  खाना-पीना , तेल के दाम,आदि  और सामान्य महंगाई का मुख्य कारण है |

प्रश्न 3– रिसर्व-बैंक और अनुसूचित बैंक रुपये क्यों बनाते हैं ?

 

वे ऐसा अमीर ,भ्रष्ट लोगों के लिए करते हैं | मुझे एक उदाहरण देने दीजिए | मान लीजिए एक अमीर कंपनी है, जिसके रिसर्व बैंक-गवर्नर(राज्यपाल), वित्त मंत्री के साथ सांठ-गाँठ है | वे एक सरकारी बैंक से 1000 करोड़ रुपयों का कर्ज लेते हैं और वापस 200 करोड़ रुपये चूका देते हैं | और क्योंकि उनके सांठ-गाँठ है, वे रिसर्व-गवर्नर, वित्त मंत्री आदि को बोलेंगे कि वे उनको हिस्सा/रिश्वत देंगे और बदले में उनको उनकी कंपनी को दिवालिया/`डूब गयी` घोषित करने दिया जाये |

फिर कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है | अभी, यदि बैंक ये 800 करोड़ का घाटा लोगों को घोषित कर देता है , तब बैंक भी दिवालिया हो जायेगा(डूब जायेगी) और बैंक के ग्राहक को भी अपनी जमा राशि खोनी पड़ेगी और ग्राहक, जो आम नागरिक-मतदाता हैं, शोर करेंगे और सरकार को जनता का गुस्सा झेलना पड़ेगा | इस स्थिति से बचने के लिए, सरकार रिसर्व बैंक-गवर्नर/अनुसूचित बैंकों को 800 करोड़ रुपये बनाने के लिए कहती है | ये ज्यादा रुपयों की सप्लाई , जब बाजार में आ जाती है, तो रूपए की कीमत घट जाती है और सामान की कीमत बढ जाती है, यानी महंगाई हो जाती है |

प्रश्न 4-प्रति नागरिक रुपये की मात्रा , लगबग 1000 गुना बढ़ी है 1951 से 2011 तक | ये क्या इसीलिए है क्योंकि कुल (सकल) घरेलु उत्पाद (जी.डी.पी; देश के भीतर सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य) भी बढ़ी है या क्योंकि रुपये का दाम गिरा है ?

 

सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) 1951 से 2011 तक केवल तीन गुना बढ़ा है, जो रुपये की मात्र का हज़ार गुना बढौतरी के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकती |
रूपया डालर और अन्य मुद्राओं के मुकाबले केवल 25-30 गुना ही गिरा है , जो रुपये मात्रा की हज़ार गुना बढौतरी के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकता है |
प्रश्न 5-महंगाई व्यापारियों द्वारा सामान की जमाखोरी से या निर्यात/`देश से बाहर भेजना` से होती है क्योंकि इससे सामान की कमी होती है और सट्टा बाजार या कम पैदावार से भी महंगाई हो सकती है |

 

ये सभी स्थानीय कारण हैं और ये सामान्य, व्यापक स्तर से कीमतें नहीं बढाते हैं| सामान की जमाखोरी से सामान की कमी आती है लेकिन कोई भी हमेशा के लिए सामान को जमा नहीं कर सकता और बाजार में सामान को छोड़ने पर , कीमतें कम होंगी और सामान्य कीमतों के बढने में कीमतें केवल एक ही दिशा में, ऊपर की ओर जाती हैं और कीमतें एक बार जब बढ़ जाती हैं तो कभी भी गिरती नहीं हैं |

ऐसे ही कीमतों का उतार-चढ़ाव का रुख/झुकाव देखा जा सकता है, खाने-पीनी की चीजों और दूसरे सामानों के सट्टे में |

और सभी चीजों देश से बाहर नहीं भेजी जाती, इसीलिए सामान का देश से बाहर भेजना कीमतों की ऊपर की ओर का सामान्य झुकाव के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकता |

प्रश्न 6– ये कीमतों का बढना=महंगाई सभी नागरिक, गरीब और अमीर,सांठ-गाँठ के साथ और बिना कोई सांठ-गाँठ के , दोनों को एक समान असर करती है ?

 

नहीं | जो लोग गरीब हैं, बिना किसी सांठ-गाँठ/संपर्क के , वे और गरीब हो जाते हैं जब सामान के दाम बढ जाते हैं | और अमीर, विशिष्ट वर्ग के लोग सरकार के साथ मिली-भगत बना लेते हैं और रुपयों को बनवा लेते हैं मुफ्त में !! इस तरह, अमीर, सांठ-गाँठ/संपर्क वाले लोग गरीब, बिना कोई राजनैतिक या उच्च संपर्क के, आम लोगों को लूट रहे हैं !!

प्रश्न 7- पेट्रोल की कीमतें सरकार की साजिश के कारण हुआ है | क्यों पेट्रोल की कीमतें अभी तक नहीं बढ़ी थीं ?

पेट्रोल की कीमतें , दूसरे चीजों की तरह कुल रुपये की मात्रा पर निर्भर करती है और मांग और सपलाई के अनुसार निर्धारित होती हैं | क्योंकि प्रति नागरिक रुपये की मात्र बढ़ गयी है, रुपये की कीमत कम हो गयी और पेट्रोल के दाम बढ़ गए हैं | केवल फर्क ये है कि पेट्रोल का दम कुछ हद तक , कृत्रिम(बनावटी) रूप से नियंत्रित/कंट्रोल/शाशन होते हैं , लेकिन एक सीमा के बाद, सरकार को पेट्रोल के दाम बढ़ाना पड़ता है, जो वैसे भी बढ़ता , यदि पेट्रोल का दाम शाशित/नियंत्रित नहीं होता | इसीलिए , 80% कारण क्यों पेट्रोल के दाम बढ़े हैं, गैर-कानूनी रुपयों का बनाना भ्रष्ट अमीरों के लिए , सरकार , रिसर्व बैंक और सरकारी बैंकों द्वारा |

प्रश्न 8- महंगाई, मतलब सामान्य कीमतों का बढ़ना , पेट्रोल के दाम बढ़ने और ढुलाई / परिवहन के कीमतों के कारण है ?
पेट्रोल का दाम और ढुलाई / परिवहन का दाम , किसी भी चीज के दाम का केवल 2-5%  हिस्सा है | उदाहरण से , चावल का दाम , रु. 20 प्रति किलो था कुछ पांच साल पहले, जिसमें ढुलाई का हिस्सा रु.1 था | यदि पेट्रोल का दाम डेढ़ गुना बढ़ा , फिर यदि चावल की कीमत केवल पेट्रोल की कीमत बढ़ने से  , बढ़ी तो चावल की कीमत ज्यादा से जयादा रु. 21 होती, लेकिन अभी असल में चावल की कीमत रु. 40  प्रति किलो है |

प्रश्न 9– इसका कोई उपाय है ?

 

बिलकुल है|

इसके दो उपाय हैं- पहला कि रिसर्व बैंक के गवर्नर को निकालने/बदलने का अधिकार आम नागरिकों हो होना चाहिए यानी राईट टू रिकाल-रिसर्व बैंक गवर्नर |इसका ड्राफ्ट निचे विवरण में दिए गए लिंक में से डाउनलोड करके देख सकते हैं |

दूसरा उपाय है कि नए रुपये बनने के लिए कम से कम 51 % नागरिक स्वकृति दें | इसके लिए हमें तीन लाइन क़ानून या जनता की आवाज़ को प्रधानमंत्री को हस्ताक्षर करने के लिए कहना होगा | इसका भी लिंक विवरण में देखें |

ये सन्देश कि महंगाई का असल कारण क्या है और इसका समाधान क्या है ,घर-घर तक पहुंचाएं और देश को समृद्ध बनाएँ|

धन्यवाद|
प्रश्न 10-क्या आरोही / प्रगामी (प्रोग्रेसिव) टैक्स (जो टैक्स का प्रतिशत आय या संपत्ति बढ़ने पर में बढ़ जाता है), संवैधानिक (संविधान के अनुसार) है ?

प्रोग्रेस्सिव / आरोही टैक्स समानता को नहीं तोड़ता है | ये टैक्स पोलिस, सेना आदि को लिए है, नागरिकों के धन-संपत्ति के रक्षा के लिए | अभी सुरक्षा का खर्चा , संपत्ति जिसकी सुरक्षा करना है बढ़ जाती है , प्रतिशत रूप में बहुत ज्यादा बढ़ जाती है | जैसे एक करोड़ के सोना की सुरक्षा करने की कीमत मान लें हर साल एक लाख है, तो 2 करोड़ के सोना की सुरक्षा की कीमत 2 लाख से ज्यादा होगी | इसीलिए प्रोग्रेस्सिव / आरोही टैक्स संवैधानिक है |
दो तरह के तुलनात्मक क़ानून,जहाँ सेज़ है और जहाँ सेज़ नहीं है , ऐसा है जैसा “ एक ही देश के अंदर दो देश हों “, वो क्या समानता नहीं तोड़ता है ? इसमें आपकी और सुप्रीम-कोर्ट की संविधान के बारे में क्या समझ है ? अधिकतर सेज़ के मालिकों ने सुप्रीम-कोर्ट के जजों के बेटों को अपने कंपनी में अच्छे पदों पर रखा है और उन्हें करोड़ों रुपये वेतन देते हैं |  लेकिन जैसे हम 105 करोड़ आम-नागरिक संविधान का अर्थ लगाते हैं, सेज़ संविधान की बताई हुई समानता भंग करता है |

प्रश्न 11- यदि बैंक 100 % `केन्द्रीय रिसर्व अनुपात` (सी.आर.आरके खातों को अनुमति / इजाजत दे देते हैं जिसमें कम ब्याज होता है ), `जमाकर्ताओं के लिए बीमा` का प्रबंध बंद करके ,  तो  बैंक की रूचि क्या होगी ऐसे जमा राशि लेने के लिए ये कैसे अलग होगा नकद या सोना किसी लोककर खाते में जमा रखने से ?

`जमाकर्ताओं के लिए बीमा` का प्रबंध से बैंक लापरवाह हो गए हैं और लोन देना शुरू कर दिया है बिना कोई कारण के , और इसने बहुत अस्थिरता पैदा कर दी है | इसीलिए `जमाकर्ताओं के लिए बीमा` का प्रबंध को बंद कर देना चाहिए और जमाकर्ता को 100% `केन्द्रीय रिसर्व अनुपात (सी.आर.आर.) का चुनाव देना चाहिए और उसे कहना चाहिए कि यदि उसे ब्याज चाहिए, तो उसे अपना पैसे के लिए खतरा उठाना पड़ेगा और एक अच्छा बैंक खोजना पड़ेगा | मूल पूंजी और ब्याज का अमीर भ्रष्ट द्वारा , ना लौटाना और खुद खा जाना, कुछ ही महीनों में कम हो जायेगा |
100 % केन्द्रीय रिसर्व अनुपात खातों में ब्याज कम होगा | ये सोना जमा कर के, किसी लोककर खाते में रखने से अच्छा है, क्योंकि –
1. जमा-राशि को एक खाते से दूसरे खाते ले जाना समभाव है (राशि स्तानान्तरण) |
2. उस राशि के चोरी के लिए बीमा होगा |

इस तरह के खाते में कम ब्याज होगा, लेकिन बहुत सारे लोग, फिर भी  इसका प्रयोग करेंगे | 100 % `केन्द्रीय रिसर्व अनुपात` के खातों की सरकार द्वारा बीमा होगा | ज्यादा ब्याज देने वाले खाते केवल प्रायवेट / निजी बैंकों में ही खोले जा सकेंगे और इन खातों का सरकार द्वारा बीमा नहीं किया जायेगा |  और हर पासबुक, चेक आदि पर पर साफ़ चेतावनी दी जायेगी कि “ भारत सरकार और नागरिकों को कुछ भी नहीं देना होगा यदि ,ये बैंक दिवालिया हो जाता है और ये बैंक कभी भी दिवालिया हो सकता है |” ये ऐसा ही है , जैसा कि सिगरेट के डब्बे पर लिखा होता है “ सिगरेट पीना आप को मार सकता है |” और येही सच्चाई है कि बैंक दिवालिया हो जाते हैं और इसीलिए ये सच्चाई हर पासबुक पर लिखी होनी चाहिए |
ये जमाकर्ताओं को बचा सकता है या नहीं भी बचा सकता है | वैसे भी, लोग चेतावनी के बावजूद भी , सिगरेट पीते है और कैंसर से मरते हैं | लेकिन ये हम आम-नागरों का आर्थिक बोझ जरूर कम करेगा — हमें जमाकर्ताओं को बचाना नहीं पड़ेगा , जब कोई बैंक दिवालिया होगा | और ये जिम्मेदारी , जमाकर्ता पर डालता है—उसे बोला गया था कि बैंक दिवालिया हो सकता है |

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प्रश्न 12- हर बार जब कोई भारत में डॉलर या कोई वेदिशी मुद्रा बैंक के खाते में जमा करता है , तो रिसर्व बैंक नए रुपये बानती है | इसको रोकने का क्या उपाय है ?  

 

हमें ये सिस्टम इस तरह बदलने की जरूरत है : जब एक व्यक्ति एक हज़ार डॉलर जमा करता है, उसके खाते में एक हज़ार डॉलर जमा दिखेगा ,जब तक वो उसे साफ़ रूप से उसे रुपयों में नहीं बदलता है | और उसको डॉलर को रुपयों को बदलने के लिए , किसी प्रायवेट/निजी कंपनी को डॉलर देने होंगे चेक द्वारा और कंपनी उसे रुपये देगी | इस तरह कोई भी रुपये नहीं बनाये जाएँगे , जब डॉलर देश में आयेंगे | भारत सरकार केवल सेना और सरकार की जरूरतों के लिए डॉलर खरीदेगी | दूसरे देशों से पेट्रोल और दूसरी चीजें मंगाने के लिए जो डॉलर चाहिए, वो निजी साधनों से लाना होगा | और डॉलर में आमदनी के लिए टैक्स में छूट नहीं होगी और डॉलरों में खर्चे (मतलब बाहर से सामन मंगाने के लिए) , आमदनी से टैक्स के गणित के लिए घटाई नहीं जायेगी | और इसके अलावा, हमें 100-300 % सीमा-शुल्क लगाना चाहिए, तो केवल डॉलरों में देना होगा | और हमें ये सब क़ानून आम-नागरिकों की `हाँ` द्वारा ही लागू करने चाहिए | हमें ये क़ानून सांसदों को रिश्वत दे कर और संसद में पास करवाने द्वारा नहीं लाना चाहिए |
प्रश्न 13- मुद्रा के लिए सोना होने के क्या फायदे और नुकसान हैं ?


    कब कोई ईकाई/वस्तु , रूपया हो या डॉलर या सोना , भारत में “मुद्रा” बन सकती है ?
जब सभी भारतीय नागरिकों को उसकी जरूरत हो और लगबग हर कोई को लगे कि वो वस्तु उसे भविष्य में सामान खारीदने की क्षमता दे | और यदि एक वस्तू सभी लोगों की जरूरतें पूरी नहीं कर सकती, तब अनेक मुद्राएं होंगी ,उदाहरण से ,आज भारत में , रूपया प्रधान मुद्रा है, लेकिन वे सोना, चांदी, डॉलर आदि भी प्रयोग करते हैं , संपत्ति जमा करने के लिए और सीमित रूप में लेन-देन करने के लिए | अभी हर नागरिक को सेना,पोलिस और कोर्ट की जरूरत है – सीधे या बिना सीधे (अप्रत्यक्ष) रूप से , और इन सेवाओं के लिए पैसा टैक्स से आता है – उत्पादन टैक्स, आय-टैक्स आदि | अभी यदि, भारतीय सरकार यदि टैक्स डॉलरों में मांगने लगे, तो डॉलर का महत्त्व बढ़ जायेगा और यदि सरकार टैक्स रुपयों में देने के लिए कहती है, तो रुपये का महत्त्व बढ़ जायेगा | लेकिन यदि सेना, पोलिस और कोर्ट खुद का महत्त्व कम हो जाता है और वे कमजोर हो जाते हैं, तब रुपयों की मांग कम हो जायेगी और सोना/डॉलरों की मांग बढ़ जायेगी |

अभी, केवल एक ही फायदा है सोना का रुपये का मुद्रा के रूप में, कि अमीर, ऊंचे लोग उसकी मात्र नहीं बढ़ा सकते ,मनमाने तरीके से | लेकिन ये ही काम तो एक क़ानून लाने से भी आ जायेगा कि रिसर्व बैंक का प्रधान रुपयों की मात्रा नहीं बढ़ा सकता , बिना आम-नागरिकों के बहुमत से सीधे अनुमति लिए | इसलिए “नागरिक का रुपया प्रणाली(सिस्टम)” जो मैंने प्रस्तावित किया है, उसका सोना की रूप में मुद्रा होने का ये फायदा है, कि ऊंचे लोग मनमाने तरीके से बढ़ा नहीं सकते | और , `नागरिकों के रुपया प्रणाली(सिस्टम)` में नए बनाये गए रुपये केवल सेना ,पोलिस और कोर्ट के लिए खर्च किये जाएँगे | इसीलिए `वर्त्तमान रुपया प्रणाली(सिस्टम)` के कमियाँ ,जिसमें ऊंचे लोग , नए बनाये हुए रुपयों को अपनी जेब में डाल सकते हैं रिसर्व बैंक और अन्य अनुसूचित बैंकों द्वारा, समाप्त हॉट जाएँगी |
लेकिन सोना का एक नुकसान है कि नागरिक मुद्रा की मात्रा बढ़ा नहीं सकते , यदि बढ़ाना भी चाहें तो | जबकि `नागरिकों के रूपया प्रणाली(सिस्टम) में , नागरिक रुपयों की मात्रा बढ़ा सकते हैं | और सोना की एक और बड़ी कमी है , कि कोई भी दुश्मन सोना चुरा कर ले जा सकता है, जबकि रुपये में ये कमी नहीं है | शत्रु देश को रुपये लेकर जाने से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि उसे रुपये भारत लाना होगा, कोई भी दामी चीज पाने के लिए | और एक बार रूपया 100 % इलेक्ट्रोनिक हो जाता है , और सारे लेन-देन नागरिकों की आई.डी. से जोड़े जाते हैं , तो रुपयों की चोरी और काले धन के लेन-देन भी बहुत कम हो जाती है , जो टैक्स की वसूली बढ़ाएगा और सेना, पोलिस और कोर्ट को सुधारेगा | ये सोने के साथ नहीं किया जा सकता है | यदि सोना मुद्रा बनाई जाती है , तो बिना दस्तावेजों के अर्थव्यवस्था बढ़ेगी |
और एक सोना , मुद्रा के रूप में, की कमी है कि ये मुश्किल होग जायेगा भारत सरकार के लिए अमेरिका , चीन आदि के साथ युद्ध लड़ने के लिए | यदि अमेरिका, चीन आदि के साथ युद्ध होता है, तो भारत सरकार को बहुत मुद्रा की जरूरत होगी सामान खरीदने के लिए, सैनिकों को वेतन देने के लिए, नागरिकों को सेवाएं के लिए भुगतान करने के लिए , आदि | अब यदि सोना एक अकेली मुद्रा है, तो भारत सरकार को सोना प्राप्त करना होगा | सोने को छुपाया जा सकता है और भारत से बाहर भी भेजा जा सकता है | तो ऊंचे लोग सोना को छुपा सकते हैं या अपना सारा सोना स्विस बैंकों को भेज सकते हैं, और फिर भारत सरकार को कुछ भी सोना प्राप्त नहीं होगा | फिर भारत सरकार के पास कोई भी मुद्रा नहीं होगी और अमेरिका, चीन आदि के खिलाफ युद्ध हार जायेगा | इसीलिए सोना मुद्रा के रूप में बहुत बुरा है , यदि अमेरिका, चीन ,आदि के विरुद्ध युद्ध होता है  तो | अब मैं ये मान रहा हूँ कि भारत को कई युद्ध लड़ने होंगे अमेरिका , चीन , सौदी-अरब , पाकिस्तान , बंगलादेश आदि के साथ और इसीलिए मैं सोने का विरोध करता हूँ |

प्रश्न 14- कौन सा ज्यादा बुरा है, आर्थिक सहायता (सब्सिडी) या टैक्स की छूट देश के अर्थ(आर्थिक)-व्यवस्था के लिए ?  
दोनों, आर्थिक सहायता और टैक्स में छूट देश के अर्थ-व्यवस्था के लिए बुरी हैं .लेकिन आर्थिक सहायता ज्यादा बुरी है |
जब भारत सरकार कहती है : “ उद्योग `क` से पैसा कमाओ , और सामान्य 35% टैक्स के बदले , कम टैक्स दो “, तो उद्योग-मालिक
क) उद्योग `क` में ज्यादा पैसा लगाएंगे
या
ख) गलत दिखा सकता है कि आमदनी `क` से आ रही है, ना कि दूसरे साधनों से | ये एक तरह का आय का गलत वर्गीकरण (गलत समूह में डालना) है |
इसमें , व्यक्ति को कम से कम कुछ काम करना होगा उद्योग `क` में कुछ आमदनी पाने के लिए या कोई और उद्योग से से जहाँ से वो पैसा उद्योग `क` में डालेगा |

लेकिन जब भारत सरकार कहती है “ उद्योग `क` शुर करो और भारत सर्कार `म` रुपये आर्थिक सहायता देगी, तब नेता-बाबू-जज-ऊंचे लोग आदि केवल कागज़ पर उद्योग `क` शुरू करेंगे और सभी आर्थिक सहायता खा जाएँगे | इसीलिए भारत सरकार को पैसे भी खोना पड़ता है और कोई उद्योग/धंधा का कोई काम भी नहीं होता है |
दूसरे शब्दों में, टैक्स की छूट में, भारत सरकार को पैसे तो खोने पड़ते हैं, लेकिन कोई उद्योग का कुछ काम होता है ,जिससे समाज को फायदा होता है | जबकि आर्थिक सहायता में, नेता-बाबू-जज-बुद्धिजीवी-ऊंचे लोग सारी आर्थिक सहायता खा जाते हैं और कोई (समाज के लिए) कोई काम भी नहीं होता है |
अभी मैं दोनों के खिलाफ हूँ लेकिन आर्थिक सहायता के खिलाफ ज्यादा हूँ , ऊपर लिखे कारण से |

लेकिन ज्यादातर बुद्धिजीवी, जो अपने आप को आर्थिक-सहायता के विरोधी बताते हैं, असल में उस आर्थिक सहायता के समर्थक हैं , जो अमीरों को मिलती है , उदाहरण., अधिकतर बुद्धिजीवी रसोई-गैस पर आर्थिक सहायता के विरोधी हैं लेकिन जमीन/नकद आर्थिक सहायता जो जे.एन.यू., आई.एम.ऐ. आदि उच्च सरकारी विश्विद्यालयों को मिलती है , क्योंकि ये आर्थिक सहायता ज्यादातर ऊंचे लोगों के बच्चों को जाती है | चिंतित नागरिकों को पता होना चाहिए , इन बुद्धिजीवियों के द्वारा कुछ , चुनिन्दा (चुने गए) आर्थिक सहायता का अनुचित, विरोध के बारे में |

 

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