(3) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)` (एम आर सी एम) के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न


(3) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)` (एम आर सी एम) के बारे में अक्सर पूछे जाने

वाले प्रश्न

 

(1) कैसे `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) से गरीबी घट जाती है |

आई.आई.एम.ऐ. , जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों की पब्लिक जमीन और अन्य पब्लिक जमीन (जिसे भारत सरकार की भूमि भी बोला जाता है ), से किराया मिलने से गरीबी कम होगी और आम-नागरिकों कक्षा दसवी तक शिक्षा मिलेगी | सबसे बड़ा कारण क्यों आम-नागरिक पढ़ाई छोड़ देते हैं , गरीबी है और गरीबी में कमी से आम-नागरिकों का पढ़ाई छोड़ना कम हो जाएगा

कितने प्रतिशत आई.आई.एम के विद्यार्थी झुग्गी-झोपड़ियों से आते हैं? 1% से कम | और कितने आई.आई.एम.ऐ. में पढ़ने वालों के घरों में पानी नहीं आता है ? शायद 5% से कम | इसीलिए ऐसा कहना कि “आई.आई.एम.ऐ. आम-नागरिकों के लिए शिक्षा दे रहा है ”, ऐसा कहना सही नहीं है |

(2) `आई.आई.इम.ऐके प्लाट पर किराये के बारे में

 

क्या आप सुझाव दे रहे हैं कि हम भूख से मरते , आम-नागरिकों को `आई.आई.एम.ऐ`, `जेएनयू` आदि की पब्लिक जमीन को मुफ्त में जमीन उपयोग करने देना चाहिए? क्यों ये दरिया-दिल्ली और खैरात ,एक ऐसे कॉलेज के लिए जो  वैसे तो पूंजीवाद और समाजवाद का खुला समर्थन करता है ? यदि `आई.ई.एम.ऐ` इतना किराया नहीं दे सकती, तो उसे ऐसी जगह चले जाना चाहिए , जहाँ जमीन सस्ती है या कम जमीन से काम चलाना चाहिए | आई.आई.एम.ऐ. से हर साल 200 एम.बी.ऐ. की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं | इस काम के लिए 10 एकड़ की जरुरत है, उनको 100 एकड़ की जरुरत हैं है | और यदि उन्हें 100 एकड़ चाहिए , तो उनको किराया देना ही होगा — मैं मुफ्त की रोटी में विश्वास नहीं करता हूँ | और आई.आई.एम.ऐ से पढ़ाई पूरी कर बाहर आये छात्र , हर साल रु. 15 लाख से 50 लाख बनाते हैं , और मेरी शुभ-कामनाएं की वे और ज्यादा कमाएँ | लेकिन वे कोई भूख से मरते लोग नहीं हैं , जिनको आर्थिक सहायता चाहिए | मैं गरीब किए खाने, दवाई, शिक्षा के लिए आर्थिक सहह्यता का समर्थन करता हूँ — मैं अमीरों के लिए आर्थिक सहायता को पसंद नहीं करता हूँ और विरोध करता हूँ |

क्या आप जानते हैं कि कई देशों ने , जिनके पास प्रति नागरिक ज्यादा लोहा है, ने लोहे की खुदाई बंद कर दिया है और उसके बदले भारत और ब्राजील से लोहा मंगाते हैं ?

हम को ,कच्चा लोहे (लोहे का अयस्क) को सारा देश से बाहर भेजना बंद कर देना चाहिए | और कच्चे लोहे (लोहे के अयस्क) से सारी आमदनी , सीधे आम-नागरिकों और सेना को जानी चाहिए |

कृपया भा.ज.पा, सी.पी.एम., और कांग्रेस के बेईमान लोगों को समर्थन न करें जो ,जो खानों में से सारी आमदनी को खुद खा जाते हैं , आम-नागरिकों और सेना को सीधे देने के बजाय |

(3) बेल्लारी से कच्चा लोहा चीन को भेजा गया था , 60 डॉलर की कीमत के आपस , 2002 में भी | ये एक रिपोर्टर का कहना कि वो 100 रुपये प्रति टन के हिसाब से बिका था, इससे , उसके अज्ञानता या जानकारी की कमी का पता चलता है |

 

100 रुपये परे टन खुदाई की लागत है | इस कीमत पर निचले स्तर का ठेकेदार , बड़े ठेकेदार को बेचता है | आपको पता है की खानों का धंधा कैसे चलता है — जो लोग नेता, बाबुओं, जजों को रिश्वत देते है और उनके साथ मिली-भगत बना लेते हैं, उनको ही सरकार से खानों में खुदाई का ठेका मिलता है | बहुत सारे ऐसे लोग खानों की साईट (स्थान) जाते भी नहीं हैं और एकमुश्त (मुग्गम) आगे का ठेका , किसी छोटे ठेकेदार को दे देते हैं, जो फिर खानों पर काम करते हैं | इन छोटे ठेकेदारों को 100 रुपये प्रति टन मिलते हैं |
खदान / खान में से कच्चा लोहा निकालने का खर्चा आज के समय, `सेल` और `टाटा स्टील` के जो खुद के उपयोग के लिए है , 250 से 350  रुपये प्रति टन के बीच में है , जबकि कच्चे लोहे का बाजार का दाम 2000 रुपये प्रति टन है | ये लिंक देखें-http://www.thehindubusinessline.in/2005/12/26/stories/2005122602490100.htm

तो इस तरह खनन(खानों में से खुदाई) के धंधे में एक बहुत, बहुत बड़ा मुनाफा होता है | और ये मुनाफा भ्रष्ट ऊंचे लोगों के जेबों में जाता है (जो गुंडों को भाड़े पर रखते हैं ) और नेता, बाबू , जज, आदि जिनके अक्सर पार्टनर / हिस्सेदार  होते हैं | ये सब गडबडी इसीलिए है क्योंकि `पढ़े-लिखे` लोग खानों से आई आमदनी सीधे आम नागरिकों को देने का विरोध करते हैं |
मैं केवल बुनयादी लागत की बात कर रहा हूँ , इसमें टैक्स, सरकार को दी जाने वाली रोयल्टी(आमदनी), नेता, जज आदि को दी जाने वाली रिश्वत  और गुंडों को हफता की गिनती नहीं कर रहा हूँ | 250 रूपए प्रति टन ,`सेल` कंपनी देती है , छोटे ठेकेदारों को , और `सेल` की आदत है कि चालान को बढ़-चढ़ कर लगाने की | इसीलिए यदि `सेल` कंपनी 250 रुपये देती है , तो असली जमीनी लागत 100 रुपयों से ज्यादा नहीं होगी | ये तो एक सामान्य ज्ञान है और इसके लिए हमें गूगल(इंटनेट) पर ढूँढने की जरूरत नहीं है |
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आई.आई.टी. और दूसरे भारत सरकार के इंजीनियरिंग के कालेजों को सेना का हिस्सा बनाना चाहिए |
जो इन कालेजों में पढेंगे, उनको सेना में अपनी सेवा 10-11 सालों के लिए देने होगी, उनकी पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद | जो आई.आई.टी के विभाग सेना में लिए उपयोगी नहीं हैं, उनको आई.आई.टी. कालेजों में से निकाल देना चाहिए |
सभी कालेजों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता बंद कर देनी चाहिए , सिवाय वो कालेज जो सेना और चिकित्सा से सम्बंधित हैं | उदाहरण., आई.आई.एम.ऐ को दी जाने वाली आर्थिक सहायता बंद कर देनी चाहिए और उनको दिए गए प्लाट पर किराया लगाना चाहिए जो सीधे जनता को जायेगा |

(4) खानों में से खनिज को निकालने की लागत और फायदे और सरकार को दी जाने वाली रोयल्टी (आमदनी) कितनी हैं ?

 

प्राकृतिक गैस लीजिए |
अंतर-राष्ट्रिय दाम 280 डॉलर प्रति हज़ार घन मीटर है , जून 2008 के समय में | खदान में से निकालने का दाम 20 डॉलर प्रति हज़ार घन मीटर है |(`एम.आर.सी.एम` के लिए खनिज के दाम शुरू में `राष्ट्रिय भूमि किराया अधिकारी` तय करेगा और फिर बाद में बोली (बाजार) द्वारा तय होंगे )
अगर कहें कि भारतीय गैस निकालने वाली कम्पनियाँ यदि प्राकृतिक गैस को अंतर-राष्ट्रिय दामों पर बेचती हैं, और मुनाफा हम भारतीय नागरिकों को मिलता है |
उत्पादन = 2780 करोड़ घन मीटर
मुनाफा = 260 डॉलर प्रति हज़ार घन मीटर, जून 2008 के कीमतें लें तो = 0.26 डॉलर प्रति घन मीटर
कुल मुनाफा ,डॉलर में = 2780 करोड़ x 0.26 डॉलर = 723 करोड़ डॉलर
एक डॉलर में रुपये = 45
मुनाफा रुपयों में = 32,535 करोड़ रुपये
जन-संख्या , करोड़ों में = 110 करोड़
राशि प्रति नागरिक प्रति साल = करीबन 300 रूपए प्रति आम-नागरिक प्रति साल

दूसरे शब्दों में, हर भारतीय को 300 रूपए प्रति साल मिलेंगे, यदि प्राकृतिक गैस की रोयल्टी (आमदनी) हम भारतीय आम-नागरिकों को जाए तो |

दूसरे शब्दों में, खदानों के ठेकेदार बहुत बड़ा मुनाफा बनाते हैं, और जरूरी नहीं है कि सारा अपने पास रख पाते हों | उनको इसका हिस्सा मंत्रियों, जजों , बाबूओं, पोलिस-कर्मियों आदि को देना पड़ सकता है | लेकिन वो कैसे सुनिश्चित करते हैं कि उनकी कम बोलियां जीत जाती हैं ? कोई जादू नहीं है —- जरा आप पोरबंदर, गुजरात के जिला कलेक्टर के दफ्तर जाएँ , खनन(खानों की खुदाई) के लिसेंस के लिए, आपको स्थानीय गुंडे मिनटों में गायब कर देंगे !! दूसरे शब्दों में, गुंडों का प्रयोग कर के , बोली को दर्ज करने वाले लोग कम से कम रखे जाते हैं , ताकि कम से कम बोली आयें ,और खनन करने वाले ठेकेदार बहुत बड़ा मुनाफा कमाएँ |
लेकिन स्थानीय खनन करने वाला ठेकेदार, जो स्थानीय गुंडे रखता है, एक छोटा प्यादा है, पूरे खेल में | गुंडों को पोलिस-कर्मियों और स्थानीय जजों से सुरक्षा की जरूरत होती है , और पोलिस-कर्मी इन गुंडों को तभी सुरक्षा दे सकते हैं, जब गृह-मंत्री और मुख्य-मंत्री इन को स्वीकृति दें और स्थानीय जज इन गुंडों को तभी सुरक्षा देंगे , यदि हाई-कोर्ट स्वीकृति दें | यदि खदानों की खुदाई का मुनाफा बहुत बड़ा है, जैसे बेलारी की लोहे के खदान, तब पैसे की कड़ी , सुप्रीम-कोर्ट के जजों और प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री और सी.बी.आई. तक जाती है |(क्योंकि सुप्रीम-कोर्ट के जजों ,प्रधान-मंत्री , केन्द्रीय मंत्री आदि को ज्यादा पैसे में ही रूचि होती है )

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अंतिम परिणाम बहुत खराब होता है— क्योंकि खनिज/खदान रोयल्टी (आमदनी) बहुत कम हैं , सरकार की आमदनी भी बहुत ही कम है |और इसीलिए भारत सरकार को `वैट` जैसे टैक्स लगाने पड़ते हैं , जो छोटे व्यापारियों को बरबाद कर देते हैं और आम-नागरिकों को बरबाद करते हैं , क्योंकि `वैट` प्रतिगामी(रिग्रेस्सिव) है | और आमदनी में कमी से कोर्ट बनाने, पोलिस और सेना के लिए पैसे में भी कमी हो जाती है |
(5) खदान माफिया / गैंग क्या है और इसमें कौन-कौन होते हैं ?

http://www.cpiml.org/liberation/year_2005/february/mahendra_Singh_Murder.htm

ऊपर दिया लेख का लिंक बताता है कि खनन की गैंग कितनी गहरी है |

भारत में बहुत खदान की गैंग है –
1. बेलारी की लोहे की खदानों की गैंग
2. झारखण्ड की कोयला गैंग
3. चूना-पत्थर गैंग, कर्णाटक ,तमिलनाडु में
4. ग्रेनाईट-पत्थर गैंग, कर्णाटक ,तमिलनाडु में

5. कोटा-पत्थर , संगमरमर(मार्बल) का माफिया , राजस्थान में (सोहराबुद्दीन इसी माफिया के वजह से मारा
गया था)
6. चन्दन का माफिया , तमिल-नाडू में
7. हाथी-दांत का माफिया
8. अलुमुनियम माफिया , उड़ीसा में

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ऐसे करीब 50-70 माफिया(गैंग) हैं, भारत में | खदानों की माफिया , जमीन की माफिया से बड़ी है आमदनी के अनुसार | ज्यादातर माफिया राज्य या जिले स्तर पर है , लेकिन सभी सुरक्षा के लिए सीधे (प्रत्यक्ष) या किसी के द्वारा (अप्रत्यक्ष) पैसा केन्द्रीय मंत्रियों, प्रधान-मंत्री, सुप्रीम-कोर्ट के जज और बड़ी पार्टियों के अध्यक्ष को पैसे देते हैं | कुछ विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, ज्यादातर मुख्या-मंत्री, केंत्रिय मंत्री, पार्टियों के अध्यक्ष, सांसद , आई.ऐ.एस. (बाबू) और पोलिस-कर्मी इन खदान-माफिया का हिस्सा हैं |
खदान माफिया भारत में एक बड़ा धंधा है | कोई आश्चर्य नहीं कि कितने युवक आई.ऐ.एस(बाबू), आई.पी.एस (पोलिस-कर्मी) बनना चाहते हैं | और कोई आश्चर्य नहीं कि युवक भा.जा.पा., कांग्रेस, सी.पी.एम. आदि पार्टियों से जुड़ते हैं, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री बनने के लिए | कोई भी राजनैतिक पार्टी इन माफिया को खतम नहीं करना चाहती | भा.जा.पा., कांग्रेस, सी.पी.एम., आदि का घोषणा-पत्र इन खदान माफिया के समस्या की बात तक नहीं करता , ना ही कोई समाधान का प्रस्ताव करता है |

मुख्य खनिज जैसे कच्चा तेल, कोयला, कच्चा लोहा आदि सभी केन्द्र के अधीन हैं | और क्योंकि ये केंद्र और राज्य के सांझे / समवर्ती लिस्ट में है, केंद्र का आदेश , राज्य के आदेश से ज्यादा भारी / हावी होता है | और, केंद्र का आई.ऐ. एस (बाबू), आई.पी.एस(पोलिस-कर्मियों) पर बहुत प्रभाव होता है, जब आई.ऐ.एस., आई.पी.एस. राज्य सरकार के नीचे भी आते हैं, तो भी | मैं ये नकार नहीं रहा कि राज्य सरकार के पास अधिकार हैं —उनके पास हैं | लेकिन केंद्र और राज्य के अधिकार 65:35 के अनुपात में हैं या इससे भी ज्यादा , केन्द्र के पक्ष में | ये जुखी कारण था कि क्यों शिबू सोरेन को ज्यादा रूचि थी, केन्द्र में कोयला मंत्री बनने में , ना कि झारखण्ड का मुख्यमंत्री बनने में | क्योंकि कोयला मंत्री के पास कोयला के खदानों के ज्यादा अधिकार हैं, मुख्यमंत्री से | लेकिन कोयला माफिया , जिसमें उच्च-जाती के ऊंचे लोगों का ज्यादा प्रभाव है , ने उसको रोक दिया क्योंकि शिभु सोरेन , आदिवासियों के ऊंचे लोगों (आम-नागरिक नहीं) को समर्थन करता है  |

हम खदानों से निकले कच्चे माल(अयस्क) की कुल बिक्री के दाम को 4 भागों में बांटते हैं –
1. लागत- मजदूरी , बिजली , ढुलाई आदि
2. रोयल्टी(आमदनी), टैक्स (मतलब वो पैसा जो भारत सरकार को जाता है )
3. खदानों के ठेकेदारों का मुनाफा
4. मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री, विधायक, सांसद, आई.ऐ.एस(बाबू), पोलिस-कर्मी, हाई-कोर्ट जज, सुप्रीम-कोर्ट के  जज को मिलता है
आज (3) और (4) बहुत बहुत ज्यादा है क्योंकि (2) कम है | यदि (2) को बढ़ाया जाये, तब (3) और (4) कम हो जायेगा | लेकिन बुद्धिजीवी, जो ऊंचे/विशिष्ट लोगों के एजेंट हैं, सभी तरीकों से (2) बढ़े ,ऐसा विरोध करते हैं |
यदि रोयल्टी(आमदनी) बढ़ती है, तो रिश्वतें कम होंगी | उदाहरण., यदि कुल लागत 1000 रूपए प्रति तन् है और बिक्री का दाम 5000 रुपये प्रति टन है, तो ज्यादा से ज्याद संभव रोयल्टी (आमदनी) 4000 रुपये प्रति टन है | अब यदि कोई रोयल्टी(आमदनी) की बोली 4000 रुपये लगाता है, तो बाबू, पोलिस-कर्मी, जज और मंत्रियों को जो रिश्वत मिलेगी , वो शून्य ओगी | और यदि कोई खदान का ठेकेदार ,बोली 100 रूपए लगता है, और जीत जाता है, तो उसको 3900 रूपए प्रति टन का मुनाफा होगा और इसीलिए वो बड़ी-बड़ी रिश्वतें दे सकता है | लेकिन 100 रुपये की बोली तभी जीत सकती है,  यदि जो ज्यादा बोलियां लगाने वाले हैं, उनको बुरी तरह से मारा-पीटा जाये और उनको बोली लगाने से रोका जाये | इसीलिए , भारत के सभी मंत्री और सांसद ( भा.जा.पा., सी.पी.एम के भी) खदानों के जिलों में गुंडों को बढ़ावा देते हैं | और ये गुंडे विकास को भी रोकते हैं और ये ही मुख्य कारण है कि खादानों वाले जिलों में कम विकास होता है |

(6) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम)` ,ये क़ानून-ड्राफ्ट कहता है कि ये गरीबों के लिए आमदनी पैदा करेगा और उनके खातों में हर महीने, सीधे पैसे देगा |
पहले तो, गरीबों को काम चाहिए, पैसा नहीं | आप उन्हें पैसा दे सकते हैं, उनको खिलाने के लिए कुछ एक-आध दिन के लिए, उसके बाद क्या ? जब खनिज समाप्त हो जाएँगे , उसके बाद क्या ?

गरीबों को दोनों पैसे और काम चाहिए | `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) रोजगार कम नहीं करता है | असल में, एम.आर.सी.एम ( और प्रस्तावित संपत्ति-टैक्स ) जमीन की जमाखोरी कम करके जमीन का दम कम करेगा और इस तरह रोजगार बढायेगा | `एम.आर.सी.एम` गरीबों को पैसे देता है , बिना नागरिकों से टैक्स लिए , और इस तरह सामान की मांग को बढायेगा और रोजगार बढायेगा | `एम.आर.सी.एम.` की आमदनी में सभी बैंडविड्थ से रोयल्टी(आमदनी) भी होगी , जो हमेशा के लिए होगी |

और खनिज तो 200 साल से ज्यादा चलने की आशा है | और, `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम)`में पब्लिक(सार्वजनिक) के प्लाट पर किराये भी शामिल होंगे और वे हमेशा के लिए होंगे | इसीलिए `एम.आर.सी.एम` गरीबों को पैसा आने वाले दशकों तक देगा | `एम.आर.सी.एम` गरीबी को महीनो में कम कर देता है — जिसको करने के लिए , रोजगार बढ़ाने वाली योजनाओं को सालों लग जाते हैं | और ये केवल 2 लाख बैंक के क्लर्क के साथ लागू किया जा सकता है |

शुरू में, `सेना और नागरिक के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.ससी.एम)`के लिए हर परिवार के लिए एक खाता खाता खुलेगा, परिवार के मुखिया के नाम |  भारत में 26 करोड़ परिवार है और 95% के पास राशन कार्ड हैं | जिनके पास बैंक के खाते हैं, उनको नए खाते नहीं चाहिए होंगे | मान लीजिए 25 करोड़ परिवारों के मुखिया के पास बैंक या पोस्ट-ऑफिस के खाते नहीं हैं | राशन कार्ड का नंबर और तहसील कोड का इस्तेमाल करके एक पोस्ट-ऑफिस या स्थानीय स्टेट बैंक के ब्रांच/शाखा या अन्य निर्धारित स्थानीय बैंक के शाखा में एक खाता खोला जायेगा |  बाद में हर पैसा पाने वाले , परिवार के सदस्य का अलग खाता होगा |
अभी हर एक स्टेट बैंक या अन्य निर्धारित बैंक के ब्रांच / शाखा या पोस्ट-ऑफिस में , क्लर्क को परिवार के मुखिया का राशन कार्ड नंबर, फोटो, और अंगुली का छाप लेना होगा | यदि एक क्लर्क एक दिन में 50 खाते खोल सकता है, 25 करोड़ खाते खोलने के लिए 25 करोड़ / 50 = 50 लाख देहाड़ी चाहिए | आज के समय में सरकारी बैंकों में , 6 लाख क्लर्क हैं | तो , यदि 2 लाख क्लर्क इस काम पर लगा दिए जाते हैं, तो वो एक महीने में सारे खाते खोल सकते हैं | अब शुरू में , कुछ गलतियाँ हो सकती हैं, लेकिन अंगुली की छाप से सारी गलतियाँ दूर की जा सकती हैं | यदि कोई व्यक्ति दो बार अपने अंगुली के छाप देगा, तो मशीन कुछ ही दिन में उसको पकड़ लेगी |

(7)  मैं फिर से कहता हूँ कि आप पब्लिक / जनता को कसे बताएँगे `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) और अन्य विषयों के बारे में | और यदि आप ने बता दिया , तो वो आपसे कैसे सहमत होंगे ?  मान लीजिए ,कि वे आप से सहमत हो गए, तो पटवारी, कलेक्टर का दफ्तर उनके मत इकठ्ठा करेंगे | क्या (कलेक्टर,पटवारी) को ये ही काम होगा, दूसरा कोई काम नहीं होगा ?इस समय , आप के पास 200 अलग-अलग एफिडेविट हैं, क्या ये संभव है कि उन सब पर मत पाना और दर्ज करवाना ?

मैं 200 एफिडेविट जमा करूँगा कलेक्टर के दफ्तर में | उसके लिए कुछ 500 पन्ने लगेंगे | उसके लिए शुल्क / फी 500 x 20 रुपये = 10,000 रुपये होगी | क्लर्क 500 पन्नों को 2-3 दिनों में स्कैन करके कंप्यूटर में डाल देगा | इसीलिए 10,000 रुपयों से सभी लागत बड़े आराम से पूरी हो जाती है | यहाँ `असंभव` क्या है ? और नागरिक निर्णय करेंगे कि उनको कौन सी एफिडेविट का समर्थन करना है पटवारी/लेखपाल के दफ्तर जाकर | और जब भी उनको समर्थन करना होगा, तो उनको रु. 3 देना होगा | पटवारी का एक क्लर्क दिन में 200 `हा` या `ना` डाल सकते हैं | तो  उसकी एक दिन की वसूली रु.600 होगी और महीने की वसूली 15,000 होगी (यदि महीने में 25 काम-काज के दिन मानें)| इससे उस क्लर्क का रु. 8000 का वेतन, बड़े आराम से पूरा होगा | इस तरह कंप्यूटर, कमरा, आदि का खर्चा भी 5-6 महीनों में निकल आएगा |

यदि 75 करोड़ नागरिक 200 एफिडेविट पर `हा` दर्ज करवाने का निर्णय करते हैं, तो मैं सभी `राईट टू रिकाल` के एफिडेविट को एक एफिडेविट में बना सकता हूँ | ऐसे ही, मैं सभी जूरी वाले एफिडेविट के एक एफिडेविट बना दूँगा | इस तरह सभी 200  एफिडेविट को इकठ्ठा करके मैं 5-8 एफिडेविट बना दूँगा | और 75 करोड़ नागरिकों को हाँ` दर्ज नहीं करना होगा, 50 करोड़ या कम ही काफी होंगे, ये सरकारी आदेश / क़ानून लाने के लिए | तो फिर यदि 50 करोड़ नागरिकों को 8 `हां` दर्ज करना है, और यदि एक क्लर्क एक दिन में 200 `हाँ`दर्ज कर सकता है, तो हमें (400 करोड़ / 200) , मतलब 2 करोड़ क्लर्क की दहाड़ी से कम चाहिए | इसीलिए , इस कार्य को एक लाख क्लर्क 200 दिनों में कर सकते हैं | दूसरे शब्दों में, ये कार्य 6 महीनों में पूरा हो जायेगा |
रु. 3 का शुल्क / फीस जो पटवारी के क्लर्क इकठ्ठा करेंगे, उससे उनके वेतन दिए जाएँगे |

यदि नागरिक `हाँ`-`ना` दर्ज करते हैं कि नहीं, एफिडेविट पर निर्भर करता है | उदाहरण से, यदि आप को `सेना और नागरिक के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) किस कारण से नापसंद है ,तो आप को जर्रूरत नहीं है `हाँ` दर्ज करने के लिए | लेकिन ऐसे 50 करोड़ लोग हैं , जिनको एक दिन का 20 रुपयों से भी कम मिलता है | उनको 100% नैतिक और कानूनी , हर व्यक्ति के लिए महीने का 400-500 रुपये मिलना पसंद आएगा और वे `एम.आर.सी.एम` का समर्थन करेंगे |

(8) यदि `जे.एन.यू.` कालेज को 60 करोड़ जमीन का किराया देना है, तो उसको उतना पैसा बनाना होगा- वो कहाँ से इतना पैसा लाएगा ? ज्यादा संभावना ये ही है, कि वो अपनी फीस बढ़ाएगा—फिर आम-नागरिकों का क्या होगा ?

 

`जे.एन.यू.` कालेज का प्लाट का दाम कम से कम 16, 000 करोड़ है , यदि कम से कम 40,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर का जमीन का रेट/दर लें तो | तो किराया 480 करोड़ रूपये प्रति साल होगा | और यदि हम ज्यादा रेट लेते हैं, तो थोड़ा ज्यादा मिलेगा | तो हर आम-नागरिक को अंदाज से रु. 5 हर साल मिलेगा `जे.एन.यू.` कालेज के किराये से |
कृपया मुझे समझाएं —आम-नागरिक को कैसे नुकसान होगा ? पहले, `जे.एन.यु.` कालेज के छात्र के कितने % ,आप को लगता है कि `आम-नागरिक` हैं ? भारत में केवल 12% लोग, 18-30 साल के बीच में , कालेज जा पाते हैं | और `जे.एन.यू.` कालेज में जाने के लिए अच्छी अंग्रेजी आनी चाहिए , जो इस 12% में से ,आधे के पास नहीं है | ज्यादातर `जे.एन.यू.` के छात्र शहरों से आते है, जहां कुछ ५०% लोग झुग्गी-झोपडियों में रहते हैं | `कितने `जे.एन.यु` कालेज के छात्र झुग्गी-झोपड़ियों में पले-बढ़े हुए है ? शायद 1% भी नहीं |
रु. 5 जो आम-नागरिकों को मिलेगा `जे.एन.यू` प्लाट में और 800 या ज्यादा रुपये जो सरे खदानों और पब्लिक प्लाट से मिलेगा , आम-नागरिकों को अपनी बुनियादी (प्राथमिक) शिक्षा को सुधारने की ताकत देगा | तो हवाई-अड्डों, `आई.आई.एम.ऐ`, `जे.एन.यू` आदि कालेजों को बिना किराए का(मुफ्त) प्लाट देकर , आप आम-नागरिकों की शिक्षा को बरबाद कर रहे हैं, उनकी मदद नहीं कर रहे |

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जमीन पर किराया केवल `आई.आई.एम.ऐ` और `जे.एन.यू` पर ही नहीं होगा | इसके अलावा सभी पब्लिक (सरकारी) प्लाट पर होगा सिवाय उस संस्था के जो आम-नागरिकों के द्वारा छूट प्राप्त हो , जनमत-संग्रह या जूरी-मंडल सदस्यों द्वारा |
यदि पूरी बात करें –
क) हवाई-अड्डों को जमीन किराया हम आम-नागरिकों को देना होगा
ख) सभी कालेजों , जिनको पब्लिक के जमीन के प्लाट मिले हैं, को हम आम-नागरीकों को जमीन किराया देना होगा (सिवाय उनके जिनका सेना से सम्बन्ध है )
ग) क्रिकेट के मैदान, जिनको पब्लिक(सरकारी) जमीन मिली है, को जमीन का किराया देना होगा
घ) सभी अन्य खेल के मैदानों को भी जमीन का किराया देना होगा
च) ज्यादातर सरकारी विभाग और मंत्रालय जैसे पर्यटन, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण,मानव
संस्सधन विकास,सूचना और प्रसार ,सूचना और तकनीकी ,ग्रामीण विकास , लघु उद्योग एवं कृषि और

ग्रामीण उद्योग, सामाजिक न्याय और अधिकारिता,वस्त्र, शहरी विकास और गरीबी उपशमन, युवा मामले
और खेल, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एन.एच.आर.सी), योजना आयोग
छ) जजों को 10,000 से 30,000 रुपये प्रति महीना ,मकान किराया भत्ता(राशन) मिलेगा या एक 4 बेडरूम-हाल-रसोई का फ्लैट मिलेगा और बंगलों के साथ प्लाट को किराए पर दिया जायेगा | ऐसे ही ज्यादातर आई.ऐ.एस (बाबू), सांसदों और मंत्रियों के लिए | प्रधानमन्त्री, मुख्यमंत्री और कुछ दस एक मंत्रियों को छोड़ कर , किसी को भी 4 बेडरूम-हॉल-रसोई से ज्यादा नहीं मिलेगा |
ज) राष्ट्रपति का पद हटा दिया जायेगा और पूरा राष्ट्रपति के घर का प्लाट बिल्डरों को किराये पर दिया जायेगा|

जो प्लाट निजी व्यक्तियों के हैं या कंपनियों या ट्रस्ट के हैं, या राज्य सरकार या शहर या जिले के मालिकी के है, उनसे किराया नहीं लिया जायेगा | सेना, कोर्ट, जेल,रेलवे, बस-स्टैंड, सरकारी स्कूल कक्षा 12 तक और  टैक्स वसूली दफ्तरों के प्लाट को किराया देना नहीं होगा |

(9) आप सभी भारत के नागरिकों को `सेना और नागरिक के लिए रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) के पैसे बाँटने का काम कैसे करवाना चाहते हैं ? आप पैसे प्राप्त करने वाले नागरिक की जांच कैसे करेंगे कि व्यक्ति सही है कि नहीं ?

पैसे हर आम-नागरिक के खाते में , स्थानीय पोस्ट ऑफिस या स्थानीय स्टेट बैंक शाखा में जमा होंगे | यदि हर आम-नागरिक महीने में 2 बार पैसे निकालता है , और हमारे पास 114 करोड़ नागरिक हैं, तो एक महीने में 228 करोड़ बार पैसे निकाले जाएँगे | ये पैसे का निकालना केवल 100-100 रुपये के नोटों में हो सकते हैं | इसीलिए क्लर्क का काम आसान होगा ,उसे केवल 100-100 के रुपयों के नोट रखने और देने होंगे | अभी के समय ,एक क्लर्क एक दिन में 200 चेक के लिए नकद दे सकता है या 5000 चेक एक महीने में , के लिए नकद दे सकता है | इस तरह 228 करोड़ लेन-देन के लिए हमें 228 करोड़ / 5000 , 5 लाख क्लर्क से कम की जरूरत है | ये लेन-देन की ऊपरी सीमा है, क्योंकि बहुत ऐसे लोग होंगे जो केवल महीने में एक ही बार पैसे निकालेंगे | केवल बड़े / बुजुर्ग ही पैसे निकालेंगे , इसीलिए आम-नागरिकों की संख्या जो पैसे निकालेंगे असल में 80 करोड़ होगी और 114 करोड़ नहीं | यदि हम 120करोड़ लेन-देन , हर महीना का आंकड़ा लेते हैं, तो हमें 2.5 लाख से कम क्लर्क चाहिए | अभी के समय , स्टेट बैंक के पास 3.5 लाख क्लर्क हैं | इस तरह , एम.आर.सी .एम का पैसा 114 करोड़ नागरिकों को देना बड़ी आसानी से हो सकता है | और जैसे समय के साथ, `ऐ.टी.एम` आदि के साथ , ये और भी आसान हो जायेगा |

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भारत में लगभग 3 से 5 करोड़ वैध युवा नागरिक हैं, जिनके पास कोई भी पहचान-पत्र नहीं है | पहले चरण में, उनको केवल तहसीलदार के दफ्तर जाना है और अपने अंगुली के छाप देकर, उनका नाम बताना है | तहसीलदार उनकी फोटो लेगा और उनका पहचान–पत्र बनाएगा |
बाद में (4 महीनों के अंदर) अतिरिक्त जानकरी ली जायेगी जैसे माता-पिता के नाम, बहन-भाई के नाम, बच्चों के नाम और उन सबके पहचान पत्र के संख्या नंबर क्या है |

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बाकी युवा नागरिकों के पास पहचान पत्र हैं, वे कोई भी पहचान-पत्र का प्रयोग कर सकते हैं | जब एक व्यक्ति `एम.आर.सी.एम.` दो बार लेने आयेगा, तो सिस्टम उसके अँगुलियों के छाप से पकड़ लेगा और उसे सजा होगी |

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आप “व्यक्ती के जांच “ के समस्या के बारे में बात कर रहे हैं ? आज के समय, हमारे पास बहुत ही खराब सिस्टम है, व्यक्ति के जांच के लिए और इसीलिए कुछ जाली व्यक्ति तो आ पाएंगे | लेकिन 5 % से कम | ये `नरेगा` या `आई.आई.इम.ऐ.` के लिए आर्थिक सहायता या `जे.एन.यु.` के लिए आर्थिक सहायता या हवाई-अड्डों के लिए आर्थिक सहायता से अच्छा है, जहाँ 80% जाली व्यक्ति होते हैं | इस तरह यदि , `एम.आर.सी.एम` यदि आज शुरू होता है, तो कम से कम 95% पैसा हम ,आम-नागरिकों को जायेगा , केवल 5% जाली व्यक्तियों को जायेगा | और जैसे समय बीतेगा, ये और कम किया जा सकता है, `राष्ट्रिय पहचान-पत्र` सिस्टम  लागू करवा कर |

(10) किस आधार पर हम `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) भारत के सभी  आम-नागरिकों को हर महीने देंगे ? क्या ये मुफ्त / फ़ोकट का पैसा है या संपत्ति का बदली / तबादला / हस्तांतरण / ट्रान्सफर  है या ये पैसा टैक्स द्वारा इकट्ठी की जायेगी ? ये प्रस्ताव , उस प्रस्ताव से कैसे अलाग है , जिसमें टैक्स की छुट देने की बात हो , ताकि आम-नागरिकों के पैसे खर्च करने की ताकत बढ़ाई जा सके ?

ये मुफ्त / फ़ोकट  का पैसा नहीं है | ये पैसा खदानों की आमदनी और पब्लिक (भारत सरकार) की जमीन के किराये से आएगी | और जैसा आप को पता है, भारत सरकार के ये प्लाट जैसे आई.आई.एम.ऐ. प्लाट, दिल्ली हवाई-अड्डा प्लाट आदि, हम आम-नागरिकों के हैं | तो हम आम-नागरिक को इन प्लाट से किराया और खदानों से आमदनी क्यों नहीं मिलना चाहिए ? `आई.आई.एम.ऐ` का प्लाट 100 एकड़ है और कम से कम 40,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर भी जमीन का दम लगाया जाये, तो जमीन का दम 2000 करोधई और किराया यदि हर साल , इसका 3% लिया जाये , तो हर साल , 60 करोड़ रुपये या 60 पैसे प्रति नागरिक हर साल बनता है |
और दिल्ली हवाई-अड्डा 2000 एकड़ है और कम से कम एक लाख प्रति वर्ग मीटर के रेट से, उसकी जमीन का दाम 2 लाख करोड़ है | और उसपर 3% सालाना किराया के हिसाब से , 6000 करोड़ रुपये या 60 रुपये प्रति नागरिक हर साल होता है |  भारत सरकार के पास पूरे देश में ऐसे हज़ारों प्लाट हैं | इन प्लाट में से किराया से , हम आम-नागरिकों के लिए काफी पैसा मिल सकता है | ये मुफ्त का पैसा नहीं है | ये किराया है उन प्लाट से जिसके हम 120 करोड़ आम-नागरिक मालिक हैं और आमदनी है उन खदानों से, जिसके हम मालिक हैं |

ये संपत्ति का तबादला या टैक्स में छूट नहीं है | `आई.आई.एम.ऐ` प्लाट, `जे.एम.यू` के प्लाट , हवाई-अड्डे के प्लाट आदि से किराया वसूली संपत्ति का तबादला नहीं है | हम भारत के 120 करोड़ आम-नागरिक, उस जमीन के बराबर के मालिक हैं | अभी तक, ये प्लाट ऊंचे लोग द्वारा इस्तेमाल किये गए , फ़ोकट में | अभी हम `प्रजा अधीन-राजा` समूह के लोग इस फ़ोकट-पण को समाप्त करना चाहते हैं |
टैक्स की छूट से केवल ऊंचे /वशिष्ट लोगों को फायदा होता है, हम आम-नागरिकों को नहीं | मैं ऊंचे/विशिष्ट लोगों को टैक्स लगा कर आम-नागरिकों को देने के खिलाफ हूँ | मैंने जो संपत्ति-टैक्स, आय-कर, और विरासत-टैक्स का जो प्रस्ताव किया है, वो केवल सेना, कोर्ट, पोलिस, `राष्ट्रिय पहचान-पत्र सिस्टम` बानाने, सभी आम-नागरिकों को हथियार-प्रयोग की शिक्षा देने के लिए ही है | ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है ऊंचे/विशिष्ट लोगों पर टैक्स लगाने के लिए , ताकि आम-नागरिकों को पैसा दिया जा सके | लेकिन यदि हमारे बजट में घाटा है, तो कोई टैक्स की छुट नहीं होनी चाहिए | ऐसी स्थिति में सम्पाती-टैक्स और विरासत-टैक्स को बढ़ाना चाहिए बजट के घाटे को शून्य करने के लिए |

यदि सरकार ये जमीन पर किराये और खदानों की आमदनी का पैसा अपने पास रखती है और पैसा खर्च करती है , तो भ्रष्टाचार की समस्या आएगी | और जैसे आप को मालूम है, 100 में से 99 आई.ऐ.एस.(बाबू). पोलिस-कर्मी, जज, मंत्री, पूरी तरह भ्रष्ट हैं | तो जब सरकार पैसा इकठ्ठा करती है , तो नेता-बाबू-जज-पोलिस-प्रबंधक(नियामक)-बुद्धिजीवी-ऊंचे लोग अमीर होते हैं और हम आम-नागरिक भूखे मरते हैं | मैं सेना ,कोर्ट, पोलिस, परमाणु हथियार आदि पर सरकार द्वारा खर्चा करने का समर्थन करता हूँ, लेकिन ये सभी आम-नागरिकों के हित में है, कि खदानों की रोयल्टी(आमदनी) और पुबिक जमीन का किराया सीधे 120 करोड़ आम-नागरिकों को जाये |
पब्लिक जमीन पर किराया कोई टैक्स नहीं है | 2% निजी/प्रायवेट जमीन के दाम पर टैक्स का प्रस्ताव मैंने सेना, कोर्ट ,पोलिस आदि को चलाने के लिए किया है | और ये टैक्स का पैसा आम-नागरिकों को नहीं जाएगा | लेकिन पब्लिक जमीन से किराया , जैसे `आई.आई.एम.ऐ` का प्लाट, दिल्ली हवाई-अड्डे का प्लाट आदि का 33% सेनाके लिए जायेगा और 67% हम आम-नागरिकों को जायेगा |

(11)  आप ने दिल्ली हवाई-अड्डे से किराये की बात की है, लेकिन कृपया ये बताएं कि ये किराया कौन देगा ? हवाई जहाज-कंपनी (एयरलाइन) ? लेकिन हवाई जहाज-कम्पनी (एयरलाइन) इस किराये को यात्रियों के ऊपर डाल देगा , हवाई-जहाज का किराया बढ़ा कर और यात्री फिर हवाई जहाज से उड़ना बंद कर देंगे ऊंचे किरायों के वजह से |

दिल्ली हवाई-अड्डा का विचार कीजिये | वो हर साल 2 करोड़ यात्रियों की सेवा करता है | उसके प्लाट का किराया , 6000  करोड़ हर साल आ सकता है , यदि कम से कम बाजार का दाम लगाया जाये- एक लाख रुपये प्रति वर्त्ग मीटर | इस तरह ये किराया हर यात्री के लिए 3000 रुपये होगा | एक ऊंचे / विशिष्ट वर्ग के व्यक्ति का विचार करें जो दिल्ली हवाई-अड्डे का प्रयोग साल में 20 बार करता है | उस पर जमीन का किराया न लगा कर, उसकी अमीरी 6 लाख से बढ़ जायेगी | और भारत का हर आम-नागरिक को हर साल 60 रुपयों का घाटा होगा क्योंकि उसको दिल्ली हवाई-अड्डे के जमीन से किराया नहीं मिला , जो जमीन में उसकी हिस्सेदारी है | तो क्या आप ये कह रहे हैं कि ऊंचे/विशिष्ट वर्ग के लोगों को किराए देने में छूट होनी चाहिए और हम आम-नागरिकों को भूखे मारना चाहिए ?

अभी एक यात्री जो दिल्ली हवाई-अड्डा आता है, एक होटल में रहेगा जो कम से कम 5000 रूपए एक दिन का लेगी | क्या वो होटल को किराया नहीं देता है ? उसी तरह , उसे हवाई-अड्डे का प्लाट इस्तेमाल करने के लिए किराया देना चाहिए | माफ कीजिये ,कोई फ़ोकट-पन्ना या समाजवाद नहीं |

(12) करोड़ों आम-नागरिकों को कैसे पता चलेगा कि `सेना और नागेरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी) (एम.आर.सी.एम)` का एफिडेविट दर्ज कर दिया गया ?
    मैं पहले एक असली घटना बताऊंगा | 2002 के साल में, भारत सरकार ने एक योजना बनाई थी कि हर बुजुर्ग नागरिक , जिसकी आमदनी 5 लाख हर साल स कम है , को 200 रुपये हर महीना मिलेगी | (ये पेंशन पोस्टल आर्डर द्वारा पहुंचाई जाती हैं ,उनके घरों तक और एक एफिडेविट चाहिए आमदनी के घोषणा के लिए ; गलत एफिडेविट के लिए, छे महीनों की सज़ा है ; इसीलिए बहुत कम भ्रष्टाचार की संभावनाएं हैं ) | भारत सरकार ने कोई भी टी.वी , समाचार-पत्र या रेडियो, कही भी इसका प्रचार नहीं दिया था | फिर भी, 9-10 महीनों के छोटे से समय में, हर बुजर्ग नागरिक जो पात्र / योग्य था , इस योजना में दर्ज हो गया था | फिर बात कैसे फैली ? जब कोई चीज किसी के सीधे , खुद के फायदे की होते है , और समझने और करने के लिए सरल होती है, तो बात बिजली के करंट के तरह फैलती है |
एक बार नागरिक प्रधानमंत्री को मजबूर कर देते हैं ` जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)` को भारतीय राजपत्र में डालने के लिए, और एक बार `सी और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी) (एम.आर.सी.एम)` कि एफिडेविट दर्ज कर दी जाती है—क्योंकि `एम.आर.सी.एम` आम-नागरिकों के सीधे, खुद के हित में है, तो `एम.आर.सी.एम` एफिडेविट की बात बिजली के करंट जितने तेज फैलेगी | नागरिक का काम सिर्फ इतना है — उसे पटवारी /लेखपाल के दफ्तर जाना होगा 10-15 मिनट के लिए और उसे 3 रुपये देना होगा (गरीब के लिए एक रूपया) | और क्योंकि `एम.आर.सी.एम` उसके सीधे, खुद के फायदे की बात है ,तो वो अपना सारे रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसियों को उसके बारे में बताएगा | इस तरह `एम.आर.सी.एम` के एफिडेविट की बात करोड़ों नागरिकों तक कुछ ही दिनों तक पहुँच जायेगी |

आज, मीडिया (समाचार-पत्र, टी.वी, रेडियो, पाठ्यपुस्तक आदि)  ऐसी जानकारी देते हैं जो जाँची नहीं जा सकती हैं और इसीलिए भरोसे वाली नहीं होती है | लेकिन `जनता की आवाज़` ऐसी जानकारी देगा , जो हर नागरिक द्वारा खुद जाँची जा सके , कभी भी | इसलिए जब कुछ लाख लोग भी `एम.आर.सी.एम` का समर्थन करेंगे, `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` द्वारा, तो देश के दूसरे लोगों को इसके बारे में पता चल जायेग कि कुछ है जो लोग सही मायने में समर्थन कर रहे हैं , कुछ जो देश के हित में है | फिर, `एम.आर.सी.एम` आग की तरह फैलेगा |

प्रश्नकर्ता- हम ऐसी स्तिथि कैसे संभालेंगे जब मिलते-जुलते कई एफिडेविट फाइल किये जायेंगे ? उदाहरण- यदि `सेना और खनिज आमदनी` ड्राफ्ट हम या कोई दर्ज करता है, नेता अपना अलग इस ड्राफ्ट का रूपांतरण दर्ज कर सकते हैं और भ्रम पैदा कर सकते हैं और `प्रजा अधीन राजा समूह` के ड्राफ्ट के बारे में झूठा प्रचार कर सकते हैं, `बिकी हुई मीडिया` के सहायता से | ऐसी स्तिथि में लोगों का मत बिखर जायेगा और ड्राफ्ट के लिए दबाव कमजोर हो जायेगा | एक ड्राफ्ट कहेगा कि केवल पब्लिक भूमि का किराया ही जनता और सेना को जाना चाहिए और दूसरा मिलता-जुलता ड्राफ्ट ये कह सकता है कि निजी जमीन भी जनता में बांटनी चाहिए, सेना को कुछ भी किराया नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे आम-नागरिकों को ज्यादा पैसा मिलेगा |     

 

ऊतर –

`सेना और नागरिकों के लिए खनिज आमदनी (एम.आर.सी.एम)`-1 : कुल आमदनी की 66% नागरिकों के लिए बांटी जाये, सेना के लिए 33%,  निजी जमीन पर कोई भी किराया नहीं लिया जायेगा |

`एम.आर.सी.एम`-: कुल आमदनी 100% नागरिकों के लिए बांटी जाये, सेना के लिए 0% और निजी भूमि पर भी किया लिया जाये |

अब नागरिक दोनों पर अपनी `हां` दर्ज कर सकता है | या मानें कि केवल `एम.आर.सी.एम`-2 पर `हाँ` दर्ज करते हैं | लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में `विदेशी लोबियों` को भारी नुकसान होगा, और उनकी मीडिया को खरीदने की क्षमता कमजोर होगी | राईट टू रिकाल-दूरदर्शन अध्यक्ष और पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली आने से `बिकी हुई मीडिया` ना के बराबर हो जायेगी |

और कार्यकर्ताओं कोक सेना का महत्त्व भी समझाया जा सकता है | इसीलिए बाद में, 33% सेना को आमदनी ड्राफ्ट में जोड़ी जा सकती है |
`निजी भूमि पर किराया` वाले ड्राफ्ट के बहुत कम समर्थक होंगे | कार्यकर्ता बेवकूफ नहीं हैं | वे देखेंगे कि यदि निजी भूमि-मालिक को भूमि पर किराया देने के लिए कहा जाता है, तो वो उनकी भूमि छिन जाने के बराबर है | ये संभव है कि ऐसा ड्राफ्ट जबरन लाया जाये लेकिन यदि ऐसा किया जाता है, तो समर्थ निजी-भूमि मालिक वाले व्यक्ति जैसे डॉक्टर, इंजिनीर, आदि सभी अमेरिका भाग जायेंगे | फिर नागरिकों की सेवा कौन करेगा ? बाबू ? समाज-सेव्वक ? कार्यकर्ता ? नेता ?

दूसरे शब्दों में, कार्यकर्ताओं को तब तक बेवकूफ बनाया जा सकता है, जब तक उनके हाथ ड्राफ्ट नहीं आ जाता | लेकिन `पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली` बहुत ज्यादा ड्राफ्ट-केंद्रित है | इसीलिए ड्राफ्ट कार्यकर्ताओं से छिपाया नहीं जा सकता | इसीलिए बुरे ड्राफ्ट की बुराई सामने आएगी |

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`बिकी हुई मीडिया` शक्तिशाली है, लेकिन उसकी सीमाएं भी देखें | `बिकी हुई मीडिया` आपको ये नहीं विश्वास दिलवा सकती कि 2 +2 = 5 है | दूसरे शब्दों में, ठोस तथ्यों के सामने, `बिकी हुई मीडिया` विफल हो जाती है | ज्यादा से ज्यादा `बिकी हुई मीडिया` तथ्यों को दबा सकती है |
और `बिकी हुई मीडिया` की कमजोरी देखने के लिए, ध्यान दीजिए इस तथ्य पर — अन्ना और अरविन्द केजरीवाल दोनों को मजबूर होना पड़ा , राईट टू रिकाल को दिखावटी समर्थन करने के लिए | उनकी इच्छा थी कि `राईट टू रिकाल` का मुद्दा ही नहीं उठे |  लेकिन कुछ ही गिने चुने `राईट टू रिकाल` के प्रचारकों ने अन्ना-अरविन्द के कई सौ कार्यकर्ताओं को `राईट टू रिकाल` का ड्राफ्ट बताया और फिर और फैला | और `बिकी हुई (पेड) मीडिया` के पूरी प्रयासों के बावजूद कि राईट टू रिकाल को दबाया जाये ; अन्ना-अरविन्द के बिना ड्राफ्ट के `राईट टू रिकाल` के झूठे समर्थन और सुब्रमनियम स्वामी और अन्य राईट टू रिकाल के विरोधियों का पूरा प्रचार करने के बावजूद — राईट टू रिकाल के ड्राफ्ट ने अब तक इतना विकास किया है |
और ये सब हुआ , बिना `पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली` और बिना राईट टू रिकाल-दूरदर्शन अध्यक्ष के | लेकिन पारदर्शी शिकयत / प्रस्ताव प्रणाली के लागू होते, `बिका हुआ मीडिया` मुकाबला नहीं कर पायेगा |

मूल बात ये है कि कार्यकर्ताओं को आम-नागरिकों को ड्राफ्ट बताना चाहिए और उन्हें झूठा, बिना ड्राफ्ट का समर्थन पर विश्वास नहीं करने के लिए कहना चाहिए |

 

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