(2) जूरी सिस्टम पर अक्सर पूछे गए प्रश्न


(2) जूरी सिस्टम पर अक्सर पूछे गए प्रश्न

(1) इसकी क्या गारंटी है कि जूरी-सदस्य , जजों के जैसे बिकेंगे नहीं या उनके जैसे भ्रष्ट नहीं होंगे ?क्या गारंटी है कि जूरी-मंडल के सदस्य, जो चुने जाएँगे वो ईमानदार हों ?

जूरी सिस्टम में, 15-30 जूरी-सदस्य चुने जाएँगे , 5 लाख से लेकर 110 करोड़ की आबादी में से | क्योंकि ये जूरी-सदस्य के पास एक ही मामला होगा, वो मामला 99 % मामलों में 5-15 दिनों में समाप्त हो जायेगा | तो पहले तो, इसकी बहुत कम संभावना है, कि कोई वकील ऐसा होगा , जो इन 15 जूरी-सदस्यों का रिश्तेदार होगा या इन जूरी सदस्यों में से 2-4 का भी रिश्तेदार हो  | और ऐसे वकील को 15 दिनों में ढूँढना होगा ,जिससे  मामले पर प्रभाव डालना और भी मुश्किल हो जाता है |
जूरी-सदस्य हर मामले के साथ बदल जाएँगे | क्योंकि जूरी 10 लाख या ज्यादा के जन-संख्या में से बिना क्रम (अंधा-धुंध तरीके से) चुने जाएँगे, ये गारंटी होगी कि वकील के जूरी-सदस्यों के साथ पहले से कोई संपर्क नहीं होंगे , क्योंकि ऐसा होने की सम्भावना 1000 में से 1 से कम है | जब कि जज सिस्टम में जज और वाकी एक दूसरे को बहुत अच्छे से जानते हैं | इसीलिए जज-वकील की मिली-भगत मामला शुरू होने से पहले से ही होती है | और जूरी में ,एक जूरी-सदस्य फिर से जूरी-मंडल में अगले 10 सालों तक दुबारा नहीं आ सकता | इसीलिए वकील या जूरी-सदस्य के लिए कोई “दोहराना” नहीं होगा , जब कि जज सिस्टम में “दोहराना” बहुत ज्यादा होता है |
(2) जाली / नकली जूरी-सदस्यों के होने की क्या संभावना है ?

 

किसी ने भी ऐसा प्रश्न चुनावों के लिए नहीं पूछा | यदि भारत में चुनाव कर सकते हैं, 1% से भी कम नकली मतदान के साथ , तो हम जूरी को भी बिना नकली जूरी सदस्यों के साथ चला पाएंगे |

(3)  क्या संभावना है कि जूरी-सदस्य जज के जैसे मामले लटकायेगा ?

 

जूरी सिस्टम में, 15-30 जूरी-सदस्य 5 लाख से 110 करोड़ की जन-संख्या में से चुने जाएँगे | क्योंकि ये जूरी-सदस्यों के पास केवल एक ही मामला होग, 99 %  मामले 5 से 15 दिनों में पूरा हो जायेंगे |
एक जूरी के पास केवल एक ही मामला होगा , और इसीलिए मामले की सुनवाई लगातार सुबह 10 बजे से लेकर , शाम को 5 बजे होगी और अगली तारीख दूसरे दिन होगी | इसीलिए वकीलों के पास फ़ालतू के तर्क/दलील , घंटों में या कुछ दिनों में समाप्त हो जाते हैं | और जो सिस्टम मैं प्रस्ताव कर रहा हूँ, उसमें 12 में से 9 जूरी सदस्य यदि मत देकर सहमत हों , तो जूरी-सदस्य किसी मामले में से वकील को निकाल सकते हैं , यदि वकील समय-बरबादी के तर्क/दलील कर रहा है तो और ये धारा , वकील और आसिल / मुवक्किल को समय-बरबादी के तर्क/दलील करने से रोकेगा |

(4) जूरी-सदस्यों और जजों को गुंडों के जवाबी करवाई / हमले से बचायेगा ?
हम को कैसे मालूम होगा कि यदि ताकतवर दुश्मन जूरी-सदस्य या उनके परिवार को शारीरिक नुकसान / हानि  पहुंचाना चाहते हैं, तो सरकार उनको जरूरी सुरक्षा देगी (ना केवल दिखावट करेगी) |

 

हम अपनी चर्चा जज सिस्टम और जूरी सिस्टम के बीच तुलना तक सीमित रखते हैं और किसी बिना ड्राफ्ट वाले कोई आदर्श से तुलना नहीं करें | और यदि कोई कमी दोनों सिस्टम में हो, तो उसकी चर्चा नहीं करनी चाहिए | अभी जूरी सिस्टम में भाग लेना , अनिवार्य / जरूरी सेवा है | अभी कुछ संभावना है कि एक अपराधी / गुंडे का साथी ,कोई जूरी-सदस्य को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा | ये ही बात जज सिस्टम पर लागू होती है | गुंडा जज को भी हानि पहुंचाने की कोशिश करेगा | अभी आपका प्रश्न है : जूरी-सदस्यों को कौन गुंडों के जवाबी हमलों से बचायेगा ? ये ही प्रश्न जज सिस्टम प् भी लागू होता है: जज को कौन सुरक्षा देगा ? सरकार पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा दे सकती है और सरकार/पोलिस अपराधी को सज़ा दे सकती है , अपराध हो जाने के बाद , लेकिन जूरी-सदस्य या जज या किसी और को भी “सुरक्षा” नहीं दे सकती गुंडों के खिलाफ |
जूरी सिस्टम में, ताकतवर गैंग-लीडर/मुखिया को एक जूरी-मंडल का नहीं ,बल्कि कई सौ जूरी-मंडल का सामना करना पड़ेगा — एक जूरी-मंडल , उसके खिलाफ हर एक शिकायत के लिए | उदाहरण., एक व्यक्ति जैसे दावूद भाई , जिसके पास 100-200 गुंडे हैं मुंबई में , को 100-200 जूरी के मुकदमों का हर साल सामना करना होगा , उसके खिलाफ या उसके गुंडों के खिलाफ | और दावूद-भाई को इज्जत देते हुए, वो हर साल 2500 जूरी-सदस्यों को धमकी नहीं दे सकता | और जूरी सिस्टम के साथ एक दूसरा क़ानून भी आ जायेगा(`जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव सिस्टम` सरकारी आदेश द्वारा) , जो मैं प्रस्ताव करता हूँ, जिसके द्वारा हम आम-नागरिक जिला पोलिस-कमिश्नर ,जज, मुख्यमंत्री, गृह-मंत्री को बदल सकेंगे |
दावूद-भाई और लतीफ-भाई जैसे गुंडे इसीलिए फलते-फूलते / बढ़ते हैं क्योंकि हाई-कोर्ट के जज, सुप्रीम-कोर्ट के जज, मंत्री और जिला पोलिस-कमिश्नर उनका समर्थन करते हैं | लेकिन जब नागरिकों के पास सुप्रीम-कोर्ट के जज,हाई-कोर्ट जज, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, मंत्री, जिला पोलिस-कमिश्नर को बदलने का अधिकार आ जायेग, तो कोई भी अधिकारी गुंडों का समर्थन करने की हिम्मत नहीं करेगा और फिर दावूद-भाई जैसे गुंडों की ताकत कम हो जायेगी | इस तरह , ये संभव नहीं है कि दावूद-भाई हर साल 2000 जूरी-सदस्यों को धमकी दे सकता है |

सुरक्षा के मुद्दे पर , जूरी सिस्टम जज सिस्टम से ज्यादा अच्छा है, क्योंकि व्यक्तियों की संख्या जूरी सिस्टम में 25,000 गुना ज्यादा है | (एक जज के पास साल में 60 मामले आते हैं, इसीलिए उसके 30 साल के कैरियर में 1800 मामले आयेंगे | जूरी सिस्टम में इन मामलों के लिए 1800×15 = करीबन 25,000 जूरी-सदस्य चाहिए | तो अंदाज से एक जज , 25,000 जूरी –सदस्यों के बराबर है ) | सिसिलिये जूरी सिस्टम में, एक गुंडे को 600-1500 जूरी-सदस्यों को धमकी देना होगा हर साल , जबकि जज सिस्टम में उसे केवल एक जज को ही धमकी देनी होगी | और यदि जज के पास अंग-रक्षक/बॉडी-गार्ड भी हैं ,तो भी जज या उसके परिवार वालों को हर समय सुरक्षा करना संभव नहीं है |
अमेरिका में कितने जूरी-सदस्य मारे गए सज़ा सुनाने के लिए ? कोई नहीं | क्यों ? क्योंकि गैंग टूट जाते हैं, जब भ्रष्टाचार कम होता है ,और बिना गैंग के , संगठित बदला संभव नहीं है |
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और जूरी सिस्टम में , जो मैंने प्रस्ताव किया है, मैंने एक विचार ,पुराने समय के यूनान के जूरी सिस्टम से लिया है | जैसे अपराध और अपराधी का साइज़/आकार ज्यादा बड़ा होता जाये, जूरी-सदस्यों की संख्या भी बड जायेगी | उदाहरण., पुराने यूनान में बड़े अपराध या प्रभाव-शाली व्यक्तियों के लिए 500 लोगों की जूरी-मंडल होता था | सुकरात के मुकदम्मे के लिए 500 जूरी-सदस्य थे | मैंने पूरा तरीका नहीं बनाया है , लेकिन जो सिस्टम मैंने प्रस्ताव किया है, उसमें बड़े अपराधों के लिए 50 जूरी-सदस्य होंगे और बड़े अपराध , प्रभावी व्यक्तियों द्वारा के लिय, 2-10 जूरी-मंडल होंगे, हरेक जूरी-मंडल में 50 जूरी-सदस्य होंगे |

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और अंत में, जो जूरी सिस्टम मैंने प्रस्ताव किया है, जूरी-मंडल का फैसला लोगों के बहुमत द्वारा, `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` द्वारा, रद्द किया जा सकता है | तो यदि बहुमत जूरी-मंडल के खिलाफ है (जिसकी बहुत कम संभावना है,क्योंकि जूरी-सदस्य अंधा-धुंद (क्रम-रहित ) तरीके से, लाखों-करोड़ों नागरिकों में से चुने जाते हैं) , बिना कोई सामना के, बहुमत फैसले को बदल सकता है |

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इस तरह , सुरक्षा का मुद्दा , दोनों जज और जूरी सिस्टम में है | तो बराबर-बराबर | सरकार केवल ये ही कर सकती है ,कि जज या जूरी-सदस्यों को , जो गुंडों द्वारा चोट पहुंचाए गए हों  ,उनको मुआवजा दे | जूरी सिस्टम में, जूरी-सदस्यों को नुकसान पहुँचाना कई गुना ज्यादा मुश्किल / कठिन है | इसीलिए जूरी सिस्टम ज्यादा अच्छा है |

(5) जूरी-सदस्यों को मानसिक धमकी से कैसे बचा सकते हैं , विशेषकर जूरी-सदस्यों को जो पिछड़े इलाके से आते हैं, बिना जरूरी शिक्षा के ? उदाहरण ., यदि जूरी-मंडल में एक किसान, लोहे की कम्पनी का कर्मचारी,और एक `कालेज का पढ़ा-लिखा , आदि हो |

 

हाँ, जूरी-मंडल में हर तरीके के लोग होंते | जूरी सिस्टम में, हर जूरी-सदस्य दूसरे जूरी-सदस्यों को राजी करना चाहेगा कि उसके साथ सहमत हों | तो यदि कोई जूरी-सदस्य ,किसी दूसरे जूरी-सदस्य को धमकी देने की कोशिश करेगा, तो फिर और जूरी-सदस्य उसको सुनना बंद कर देंगे | इसीलिए , ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि कोई जूरी-सदस्य दूसरे जूरी-सदस्य को धमकी दे |

(6) एक ज्यादा महंगा लेकिन उतना ही प्रभावी तरीका होगा, कार्यवाई की विडियो लेकर , पब्लिक को दिखाना ताकि जनता उसका अच्छे से जांच कर सके और इससे कोर्ट पर इतना दबाव पड़ेगा कि कोर्ट में सुस्ती / झूठी गवाई / रिश्वत देना / पक्षपात धीरे-धीरे कम हो जायेगा |

 

जो क़ानून मैंने प्रस्ताव किया है, उसमें सभी कोर्ट के मामलों की विडियो रेकोर्डिंग करनी जरूरी होगी | और वो इन्टरनेट पर दिखाया जायेगा | दूसरे शब्दों में, एक लाख कोर्ट होंगे अभी के 17,000 कोर्ट से बढ़ कर , और हरेक में टी.वी. कमरा होगा ,जो इन्टरनेट से जुड़ा होगा, ताकि भारत में कोई भी कोर्ट का कमरा और सुनवाई लाइव/सीधे देख सके | सुप्रीम-कोर्ट से और हाई-कोर्ट से सीधा प्रसारण एक महीने में शुरू हो सकता है , लेकिन 16,000 से एक लाख निचले अदालतों से सीधा प्रसारण के लिए 4-5 साल लगेंगे |
लेकिन सार्वजनिक (जनता के सामने) खुलासा भ्रष्टाचार और भाई-भातिजेवाद का कोई समाधान नहीं है | क्योंकि हम आम-नागरिकों के पास भ्रष्ट को बदलने का अधिकार नहीं है ,जज,पोलिस खुले-आम रिश्वत लेते हैं और किसी से नहीं डरते | सार्वजनिक खुलासा केवा हमें जानकारी देगी कि हर जज कितना निकम्मा है — वो समस्या का समाधान नहीं देगा | इसीलिए , हालाँकि मैं सभी कोर्ट से इन्टरनेट पर सीधे प्रसारण का समर्थन करता हूँ, कोर्ट में भ्रष्ट्राचार का समाधान भ्रष्ट को बदलने का नागरिकों का अधिकार और जूरी सिस्टम है और इन्टरनेट पर कोर्ट-टी.वी नहीं |

(7) न्यायिक सुधार के साथ, हर आदमी के लिए कोर्ट आसानी से पहुँच सकना बहुत जरूरी है | हर जिला-मुख्यालय में एक हाई-कोर्ट की पीठ / बेंच / शाखा होनी चाहिए और राज्य की राजधानी में सुप्रीम-कोर्ट की शाखा होनी चाहिए | एक सुप्रीम-कोर्ट का जज, चाहे वो नई दिल्ली में हो या बेंगलुरू में , सुप्रीम-कोर्ट की शाखा को वो ही फैसला देना चाहिए क़ानून और सत्य / तथ्यों के आधार पर  | एक गरीब आदमी या कोई भी आदमी को इतनी दूर दिल्ली क्यों जाना पड़े और अपना पैसा-समय बरबाद करे ?

 

ऊपर दी गयी स्थिति में फिर भी ये समस्य होगी कि हाई-कोर्ट जज और सुप्रीम-कोर्ट के जज भ्रष्ट हैं और भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) वाले हैं |

अपील करने की समस्या का मैं जो समाधान प्रस्ताव करता हूँ –
1. पहली सुनवाई जिला-कोर्ट की जूरी करेगी और फैसला देगी |
2. यदि कोई व्यक्ति अपील करना चाहता है, तो वो मामले को किसी क्रम-रहित चुने गए
जिले के महा-जूरी-मंडल के सामने रखेगा | यदि महा जूरी-मंडल, अपील स्वीकार कर
लेता है, तब   वो मामला क्रम-रहित तरीके से चुने गए 3 जिलों की जूरी के पास जायेगा |
3. आसिल(मुवक्किल) विडियो-कांफेरेंस द्वारा भी  हाजिर हो सकते हैं |
4. यदि आसिल(मुवक्किल) एक और अपील चाहता है, तो उसे क्रम-रहित तरीके से चुने तीन
राज्यों में से तीन जिलों की महा जूरी-मंडल के सामने अपनी अर्जी रखनी होगी | यहाँ भी
वो विडियो कांफेरेंस द्वारा भी हाजिर हो सकता है |
5. यदि अपील स्वीकार कर ली जाती है, तो वो मामला पूरे देश के 9 क्रम-रहित तरीके से चुने
गए जूरी-मंडल द्वारा सुना जायेगा |

दूसरे शब्दों में, मैं हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट को पूरे देश में `फैला` रहा हूँ | भारत में, सबसे ज्यादा सत्ता का जमाव / केन्द्रीयकरण मंत्रियों के पास नहीं , लेकिन हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट के जजों के पास है | और एक बार, ये सत्ता `फ़ैल` जाये, तो भारत में बहुत सी बुरायाँ कम हो जाएँगी | हाई-कोर्ट के राज्य के राजधानी में होने से उस राजधानी के ऊंचे लोगों को आम-नागरिक, जो पूरे राज्य में हैं, के मुकाबले ज्यादा फायदा मिल जाता है | और सुप्रीम-कोर्ट के दिल्ली में होने से दिल्ली के ऊंचे/विशिष्ट वर्ग के लोगों को भारत के दूसरे नागरिकों पर ज्यादा फायदा मिल जाता है | एक बार हाई-कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट , इस तरह से फ़ैल` जाएँगे, तो ऊंचे लोगों को ये फायदा नहीं मिलेगा |

 (8) मौत की सज़ा ज्यादा दी जाती है, उन जगहों पर जहाँ जूरी सिस्टम है कि जहाँ जज सिस्टम है ?

 

जूरी सिस्टम में कोई ऐसी कमी नहीं है, जो जज सिस्टम में 10-100 गुना नहीं हो | और रूस में और पूरी दुनिया में ,मौत की सजा उन जिलों में कम है, जहाँ जूरी सिस्टम है | और अमेरिका में भी मौत की सज़ा इसीलिए तब बढ़ गयी , जब जजों ने उन जूरी-दसस्यों को छांटना और निकालना शुरू कर दिया जो मौत के सज़ा के खिलाफ थे !! अमेरिका के जूरी सिस्टम में जज के पास जूरी-सदस्यों को छांटने की बहुत ज्यादा अधिकार हैं, लेकिन मेरे द्वारा प्रस्तावित जूरी-सिस्टम में जज के पास ये अधिकार नहीं हैं | जूरी सिस्टम मौत की सज़ा के खिलाफ , आज की जानकारी में सबसे अच्छी सुरक्षा है |

(9)  भारत में, फैसला किसी आरोपित पर ,उसके पक्ष में या खिलाफ , जाती, धर्म, संप्रदाय और क्षेत्र के अनुसार किया जाता है |  हमारा मीडिया भी इसमें अपना योगदान देता है | और, मीडिया के द्वारा लोगों की सोच को प्रभावित किया जा सकता है |
    जूरी सिस्टम अमेरिका,यूरोप के सभी जिलों में एक सामान नहीं है | इसीलिए मैं जवाब मेरे द्वारा प्रस्तावित जूरी सिस्टम के अनुसार दूँगा |

जूरी-सदस्य किसी भी आबादी से क्रम-रहित(अंधा-धुंध) तरीके से चुने जाएँगे | अपराध और अपराधी कितना बड़ा है, उसके अनुसार, जूरी की संख्या 12 से लेकर 100 या ज्यादा भी हो सकती है (पूराने ज़माने के यूनान में जूरी के मुकदमों में 600 जूरी-सदस्य तक होते थे) | ज्यादातर मामलों में जूरी-सदस्यों की संख्या 12-20 होगी | क्योंकि वे क्रम-रहित तरीके से चुने जाएँगे , कोई भी जाती जूरी-मंडल में हावी नहीं होगी |
ये एक मिथ्या / झूठी बात है है कि मीडिया झूठ को सच मनवा सकता है | मीडिया ज्यादा से ज्यादा सचाई को छुपा सकता है | और आसिल (मुवाकील) है, सच्चाई को जूरी-सदस्यों के सामने रखने के लिए |

मेरा दावा है कि जज में ,जूरी-सदस्यों से कहीं ज्यादा भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) और मिली-भगत है और इसीलिए कहीं ज्यादा भ्रष्टाचार है | जबकि जूरी-सदस्यों में मिली-भगत शून्य है, क्योंकि 12-600 जूरी-सदस्य क्रम-रहित तरीके से चुने जाते हैं , लाखों-करोड़ों की जन-संख्या में से | और वकीलों, गुंडों आदि, के साथ मिली-भगत जूरी-सदस्यों में लगभग शून्य है | और मिल-भगत और भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) से भ्रष्टाचार कई गुना बढ़ जाता है और इसीलिए जज में भ्रष्टाचार जूरी-सिस्टम में भ्रष्टाचार से कहीं ज्यादा है | इसीलिए हमें निचली अदालतों ,हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट में जूरी सिस्टम का प्रयोग करना चाहिए, जज सिस्टम का नहीं | मैंने कभी नहीं कहा कि जूरी-सदस्य तरफदारी / पक्षपात नहीं करते, वो उतना ही पक्षपात करते हैं, जितने कि जज | लेकिन क्योंकि जूरी-सदस्यों की संख्या 12 से 600 होगी , ये पक्षपात आपस में एक दूसरे को काट देगा और इस तरह पूरे जूरी सिस्टम में जज सिस्टम से बहुत कम पक्षपात होगा | लेकिन मुख्य मुद्दा पक्षपात नहीं है- मुख्य मुद्दा भाई-भतिजेवाद, मिली-भगत और भ्रष्टाचार है |


(10) कृपया अपनी जानकारी ताज़ा करें और बताएं कि भारत में जूरी सिस्टम क्यों समाप्त की गयी थी |

 

सुप्रीम-कोर्ट ने नानावटी मामले का बहाना दिया था जूरी सिस्टम को समाप्त करने के लिए | ये एक गलत निर्णय था | जूरी-सदस्यों को पता था कि नानावटी एक हत्यारा है | लेकिन जूरी-सदस्यों ने यदि उसे दोषी करार दिया होता, तो जज ने नानावटी को फांसी दे होती थी | ये उन जूरी-सदस्यों को मान्य नहीं था क्योंकि अपराध (हत्या) गुस्से में आ कर की गयी थी और जिसकी हत्या हुई थी , वो एक शादी-शुदा औरत के साथ शारीरिक संभंध बनाये थे |
उस समय `डी.एन.ऐ ` जांच उपलब्ध नहीं थी, इसीलिए किसी दूसरे की पत्नी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनने का मतलब था एक ऐसे बच्चे का हों, जिसका पिता कोई और हो , और इसीलिए परस्त्रीगमन / व्यभिचार (किसी दूसरे स्त्री / पुरुष के साथ सम्बन्ध) हत्या से जयादा बुरा माना जाता था | और ये देखते हुए कि नानावटी एक सैनिक था और आम-नागरिकों को सैनिकों के लिए इज्जत होती है , उन्होंने फैसला किया कि नानावटी को फांसी नहीं होनी चाहिए | इसीए उन्होंने `निर्दोष` का फैसला सुनाया था |
यदि जूरी-सदस्यों के पास उसे कुछ सालों के लिए कैद करनी की सज़ा सुनाने का अधिकार होता, तो वो ऐसा करते | लेकिन उस समय जूरी-सदस्यों के पास केवल दो ही अधिकार थे : या तो `निर्दोष` करार देना या `दोषी` करार देना | यदि दोषी करार देते, तो जज नानावटी को फांसी दे सकता था , इसीलिए , उन्होंने नानावटी को `निर्दोष` का फैसला सुनाया था |

इसीलिए जूरी-सदस्यों ने सही किया था |

इसीलये हमारे द्वारा प्रस्तावित जूरी सिस्टम में, जूरी-सदस्य ही सज़ा का फैसला करेंगे , जो कोई भी सज़ा हो सकती है, क़ानून में दी गयी सबसे ज्यादा (अधिकतम) सज़ा से कम |

तो नानावटी का मामला ये ही साबित करता है कि जूरी सिस्टम जज सिस्टम से ज्यादा अच्छा है |

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उस समय भारतीय अदालतों में , जज सभी ऊच-जाती के समर्थक थे और वे चाहते थे कि दलित “अपनी औकात में रहें | “ और इसीलिए जूरी में दलित का विचार उनके लिए मान्य नहीं था | 1947 तक, जूरी-सदस्य एक सीमित लिस्ट में से चुने जाते थे (शिक्षा, भूमी की मलिकी आदि एक कसौटी / मानदंड / आधार था ) | 1950 के दशक में, भारत सरकार के पास और कोई रास्ता / विकल्प नहीं था , कि ये लिस्ट में पूरे देश के मतदाताओं को डालने के सिवाय | इसका ये मतलब होगा कि दलित भी जूरी-सदस्य बन सकते थे | तो फिर ऊच-जाती के अंध-भक्त जज इस अधर्म को कैसे स्वीकार कर सकते थे ? ये एक कारण था जूरी सिस्टम को समाप्त करने के लिए |
1950 के दशक का जातिवाद मेरी कल्पना / सोच नहीं है | ये एक कड़वा सच है | अभी भी जज न्यायपालिका में दलितों के खिलाफ हैं ( जज बाला कि नियुक्ति (नौकरी) एक बार रद्द की गयी थी और वो फिर से तभी नियुक्त किया गया था , जब दलित सांसदों और राष्ट्रपति नारायणन खुद ने सयुंक्त राष्ट्र में ये दलितों के प्रति जजों का अत्याचार रखने की मांग का समर्थन किया था )

इसके अलावा, जजों को जूरी सिस्टम में रिश्वत के पैसे से हाथ धोना पड़ता है |

 

(11) लेकिन यदि आप को किसी को सज़ा देनी है, तो क्या आप को जूरी-सदस्यों का एकमत निर्णय नहीं चाहिए होगा ? जिसका मतलब कि यदि आप 12 में से एक भी जूरी-सदस्य को रिश्वत दे कर भ्रष्ट कर दें तो , आप हत्या करके भी छूट जाएँगे या आप को त्रिशंकु (अनिश्चित) फैसला मिलेगा |
 

अमेरिका में सज़ा होने के लिए सभी 12 जूरी-सदस्यों को `दोषी` का फैसला देना होता है | स्कॉटलैंड में ,जूरी में 15 सदस्य हैं और यदि 15 में से 8 `दोषी` कह दे , तो सज़ा होती है |
अमेरिका में कुछ जगह हैं , जहाँ 12  में से 11 जूरी-सदस्य दोषी बोलते हैं, तो भी सज़ा होती है, लेकिन सज़ा कम होती है |
दूसरे शब्दों में कोई निश्चित नियम नहीं है |

जो , जूरी सिस्टम का मैंने प्रस्ताव किया है, उसमें 12 में से 9 जूरी-सदस्य यदि `दोषी` बोलते हैं, तो सज़ा होती है | सामान्य तौर पर, सज़ा देने के लिए जो जूरी-सदस्य की संख्या की आवश्यकता होगी, जिनको दोषी बोलना है = (2/3N +1) ,जहाँ N= कुल जूरी-सदस्यों की संख्या |
जो जूरी-सिस्टम का मैंने प्रस्ताव किया है, उसमें जूरी-सदस्य (और भ्रष्ट, भाई-भातिजेवाद वाले जज नहीं) सज़ा का फैसला सुनायेंगे | तो हरेक जूरी-सदस्य एक संख्या चुनेगा 0 और `सबसे अधिक ` के बीच ( 0 का मतलब `निर्दोष` है और `सबसे अधिक` सबसे अधिक सज़ा है महीनों में , जो उस अपराध के लिए सुनाई जा सकती है ) सभी संख्याओं को घटते क्रम में रखें और शुरू से नौवी संख्या, सज़ा होगी , यदि कुल 12 जूरी-सदस्य हैं या (2/3N =1), यदि कुल `N` जूरी-सदस्य हैं |

(12) कोर्ट के ऊपर पहले से बहुत से बकाया मामलों का बोझ है | आपका जूरी सिस्टम ,इस बोझ को और बढ़ा देगा |

जूरी सिस्टम करीब 20 देशों में रहा है , और बकाया मामले , जिन देशों में जुज सिस्टम है , उसमें ज्यादा है | उसके अलावा, गुंडे कोर्ट पर बोझ डालते हैं, ना कि जज सिस्टम या जूरी सिस्टम |
गलत सज़ा होने की संभावना , जज सिस्टम में ज्यादा है क्योंकि यदि दूसरा पक्ष पैसे वाला है, तो वो जजों को रिश्वत दे सकता है , जज के दलाल वकीलों के द्वारा और झूठी सज़ा करवा सकता है | ये खासकर उन मामलों में सच है ,जब आरोपित इतना कमजोर है कि वो हाई-कोर्ट में अपील भी नहीं कर सकता है |  (आज अपील करने की लागत इसीलिए ज्यादा है क्योंकि जिन वकीलों की मिली-भगत होती है जजों के साथ, वो ही मामला दर्ज करा पाते हैं, और ऐसे वकीलों की फीस बहुत ज्यादा होती है | जूरी सिस्टम में कोई मिली-भगत नहीं होती, इसीलिए वकीलों की फीस कम होगी और कमजोर भी अपील कर पायेगा )

प्रश्न- 12-15  जूरी-सदस्यों के पास एक ही मामला है | तो फिर यदि एक दिन में सौ मामले दर्ज किये जाते है, तो आपको एक दिन में 1200 जूरी-सदस्य चाहिए | यहाँ समय, जगह , वकील और दूसरी सीमाएं होंगी , जिससे दिक्कतें आ सकती हैं |    

 

जब आपराधियों को सज़ा होती है, तो अपराध का दर / रेट कम हो जाता है और कोर्ट में आने वाले मामलों की संख्या भी कम हो जाती है | इसीलिए, जूरी सिस्टम में , जहाँ संगठित अपराधियों को सज़ा मिलती है, कोर्ट में मामलों की संख्या आना कम हो जाती है |

यदि एक जिला है, जिसमें 15 लाख नागरिक हैं | और आप कहते हैं कि हर दिन, उस जिले में 100 मामले आते हैं या कहें 100×250 = 25,000 मामले हर साल या एक लाख पचीस हज़ार मामले पांच सालों में |(साल में औसत 250 कोर्ट के काम-काज के दिन मानें तो )

फिर ये दो संभावनाएं हो सकती हैं –
क) यदि हर अपराध अलग-अलग व्यक्ति द्वारा किया गया है, इसका मतलब , उस जिले के नागरिकों का 1/12 वां हिस्सा अपराधी है ! ये वास्तविक स्थिति नहीं है |

ख) इसीलये केवल एक ही तरीका है कि हर दिन एक जिले में 100 अपराध के मामले दर्ज होते होंगे, कि वो ही लोग दुबारा-दुबारा अपराध करते हों | इसी को मैं `पेशेवर (करियर) अपराधी` बोलता हूँ | ऐसे अपराधी इसीए बढ़ते हैं क्योंकि छूट जाते हैं और फिर वे हर महीने कई अपराध करते हैं | लेकिन वे छूट इसीलिए जाते हैं क्योंकि उनका जज के साथ सांठ-गाँठ होता है | जबकि जूरी सिस्टम में, ये पेशेवर अपराधी सजा पा कर जेल जाते हैं , क्योंकि हर मामले के साथ जूरी-सदस्य बदल जाते हैं और इसीलिए हर साल हज़ारों जूरी-सदस्यों के साथ मिली-भगत नहीं बना सकते | और जैसे `पेशवर मुजरिम` सज़ा पाते हैं , अपराध और मामलों की संख्या कम हो जाती है |

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इसीलिए एक जिले में 100 मामलों की स्तिथि कोई भी जूरी सिस्टम वाले देश में नहीं देखी जाती है | अमेरिका में , जहाँ पश्चिम के देशों में से सबसे ज्यादा अपराध है, वहाँ एक तो अपराध ज्यादा दर्ज होते हैं और भारत में ज्यादातर अपराध दर्ज ही नहीं होते, और अमेरिका में नशा सम्बन्धी अपराध ज्यादा है क्योंकि वहाँ नशे के सामान पर प्रतिबन्ध है | लेकिन अन्य पश्चिम देशों में, जहाँ नशे पर प्रतिबन्ध नहीं है, वहाँ, अपराध का स्तर गिर रहा है और जेल बंद हो रहे हैं , कैदियों की कमी के कारण |

(13) क्या जूरी सिस्टम आज के जातिवाद के चलते सफल होगा ?

 

पहले , हमें जज सिस्टम और जूरी सिस्टम की आपस में तुलना करनी चाहिए | जज उतने ही जातिवाद हैं ,जितने की आम-नागरिक ,और जज सिस्टम कोई जातिवाद का समाधान नहीं है | इसके अलावा, जज सिस्टम में बड़े पैमाने/स्तर पर भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) है ,जो जातिवाद से ज्यादा बुरा है | जूरी सिस्टम में कोई भी भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) संभव नहीं है |
अभी ,मान लीजिए 20 जूरी सदस्य 10 लाख बड़े उम्र के नागरिकों के समूह से क्रम-रहित (अंधा-धुंध) तरीके से चुने जाते हैं , और कोर्ट में हर पक्ष 2 जूरी-सदस्यों को निकाल देती है, ताकि अंत में केवल 12 मुख्य जूरी-सदस्य और 4 अतिरिक्त / एक्स्ट्रा /स्टैंडबाय बचते हैं | अभी ये 12 जूरी-सदस्य सभी जातियों से आयेंगे | और 10 लाख बड़े नागरिकों के क्षेत्र में, (मतलब कि उस क्षेत्र की कुल जन-संख्या 15 लाख होगी ) , कोई भी जाती 20% से ज्यादा नहीं होगी और हर प्रधान जाती , उप-जाती में बंट जाती है और जाती की चेतना / होश खो जाती है |
तो, यदि शिकायत करने वाला और मुजरिम दोनों अलग जाती के हैं, तो जूरी-सदस्य भी सभी जाती के होंगे और बुरी से बुरी स्थिति में , दोनों पक्ष एक दूसरे के जाती के जूरी-सदस्यों को निकाल देंगे और 12 जूरी-सदस्य उन जातियों के होंगे, जो न तो शिकायत करने वाले और ना ही मुजरिम के पक्ष के हैं |

तो जातिवाद का जूरी सिस्टम पर कम असर होगा , जज सिस्टम के मुकाबले |

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बहुत सारे अपराध जमीन के विवाद के नतीजे होते हैं| असल उदाहरण के लिए , एक अहमदाबाद में अमृत पटेल नाम का बिल्डर / निर्माता  था | उसके काम करने का तरीका इस प्रकार था :

क) मान लीजिए वो चाहता है किसी प्लाट के मालिक को अपने प्लाट को बेचने के लिए
मजबूर करने के लिए, क्योंकि उस प्लाट-मालिक का प्लाट अमृत पटेल के लिए फायदे
वाला है (जैसे कि वो प्लाट अमृत के प्लाट के बगल में है )
ख) अमृत पटेल पोलिस-वालों आदि को बोलेगा कि उस प्लाट के मालिक के खिलाफ झूठा
मामला लिखवाये |
ग) फिर अमृत पटेल स्थानीय जज को रिश्वत देगा उसके दलाल या रिश्तेदार वकील के द्वारा और जज प्लाट के मालिक को सज़ा देने की धमकी देगा , अगर वो प्लाट बिल्डर को बेच नहीं देता है तो |

ऐसे सौदे जज सिस्टम में संभव होते हैं, क्योंकि निचली अदालतों के जज 2-4 सालों के लिए एक ही क्षेत्र में होते हैं , और अगला जज उसी राज्य में से होता है, किसी आस-पास के क्षेत्र से(अगला जज आस-पास  के क्षेत्र से होने से , उसके और पहले वाले जज के बीच विश्वास और मिली-भगत बनना आसान हो जाता है ) , और हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट के जज एक ही क्षेत्र में और भी ज्यादा समय के लिए रहते हैं | और हर जज के कुछ 5-10 रिश्तेदार वकील होते हैं, जो बेसब्री से अमीर बिल्डर, अमीर अपराधी आदि ., खोज रहे होते हैं, जो उनको पैसे दे सकें, कुछ उपकार के बदले |
लेकिन ऐसे सौदे जूरी सिस्टम में संभव नहीं हैं, जहाँ हर मामले के बाद जूरी-सदस्य बदल जाते हैं |

(14) जूरी सिस्टम ज्यादा अच्छा चलेगा यदि जूरी-सदस्य अच्छे से चुने जायें |

 

जूरी सिस्टम कोई भी दुनिया के आज तक के जज सिस्टम से कहीं ज्यादा अच्छा है , केवल इसीलिए क्योंकि जूरी-सदस्य क्रम-रहित (अंधा-धुंध) तरीके से चुने जाते हैं, जिले/राज्य/देश के पूरी जन-संख्या से | ये एक संगठित अपराधियों के गैंग को मजबूर कर देती है कि उनको, हजारों-हजारों जूरी-सदस्यों का सामना करना पड़ता है, कोर्ट में , और ये उनके लिए भविष्यवाणी करना असंभव होता है कि कौन अगले मामले में जूरी-सदस्य होंगे , और इसीलिए वो पहले से ही जूरी-सदस्यों से मिली-भगत नहीं बना सकते |  “तुम मेरा काम करो और मैं तुम्हारा काम करता हूँ” जूरी सिस्टम में संभव नहीं है, जब कि जज सिस्टम में निश्चित है |

प्रश्नकर्ता- अमेरिका में, जूरी क्रम-रहित (अंधा-धुंध) तरीके से चुनी जाती है | हमें पता है कि यदि जूरी `क्रम-रहित` तरीके से भारत में चुनी जाये, तब भी उसमें वे सारे लोग हों जो, जज / सिस्टम चाहते हो |

 

जब चुनाव एक स्थूल ( आखों से देखे जा सकने वाले) तरीके से किया जाता है , जैसे 10 अंधे व्यक्ति महा-जूरी-सदस्यों के सामने पांसा फेकना , तो भगवान भी नहीं बता सकते कि कौन जूरी-मंडल में चुना जायेगा | अमेरिका में जूरी सिस्टम कमजोर हो गया है क्योंकि जज 200 जूरी-सदस्यों तक को बुलाते हैं और उनका साक्षात्कार / इंटरवीयू लेकर 150 जूरी सदस्यों तक को निकाल देते हैं | इससे जज ताकतवर होते हैं और आसानी से सिस्टम में आसानी से छेड़-छाड़ और हेर-फेर कर सकते हैं |
जो जूरी सिस्टम मैंने प्रस्ताव किया है, उसमें केवल 20 जूरी-सदस्य होंगे और कोर्ट में हर पक्ष 2 को निकाल देगा और बाकी 16 जूरी-सदस्य होंगे , जिनमें से 12 मुख्य जूरी-सदस्य होंगे और 4 अतिरिक्त / एक्स्ट्रा जूरी-सदस्य होंगे | इनमें यदि ज्यादा जूरी-सदस्यों की आवश्यकता होगी तो भी इसी फोर्मुले द्वारा चुनाव किया जायेगा |

प्रश्नकर्ता- हम एक भरोसे वाला जूरी सिस्टम कैसे बना सकते हैं ? 
    जूरी सिस्टम जहाँ जज के पास कम से कम अधिकार / नियंत्रण / कंट्रोल है , ऐसे सिस्टम से भगवान भी छेड़-छाड़ नहीं कर सकते हैं, ना ही तोड़ सकते हैं | और जजों को और कमजोर बनने के लिए , मेरा प्रस्ताव है है कि जजों को बदलने का अधिकार आम-नागरिकों को होना चाहिए |

प्रश्नकर्ता- बहुत अच्छा विचार है …. लेकिन भारत के नेता इस सिस्टम को भी धोखा देने का तरीका निकाल लेंगे |

 

एक बार मैंने, मेरे एक ग्राहक के लिए कोड बनने का एक सिस्टम बनाया | लेकिन मेरे ग्राहक को संदेह था — क्या कोई सुपर कंप्यूटर के साथ , इसका पास-वर्ड नहीं तोड़ सकता है ? मैंने कहा,” देखो , यदि वो एस कर सकता है, तो वो बैंक का पास-वर्ड और सुरक्षा भी तोड़ सकता है , औरइसीलिए वो तुम्हारा सस्तें तोड़ने की नहीं सोचेगा, वो बैंक के सिस्टम को तोड़ने का सोचेगा| ‘ उसको विश्वास हो गया |
यदि भारत के नेता जूरी सिस्टम को तोड़ सकते हैं, तो वे भारत छोड़ कर अमेरिका में बस गए होते , और अमेरिका को अभी तक लूट लिया होता | वे अमेरिका गए नहीं है और अमेरिका के जूरी सिस्टम को अभी तक तोड़ा नहीं है, क्योंकि अच्छे जूरी सिस्टम को तोड़ना, भगवान की भी बस की बात नहीं है , क्योंकि जूरी-सदस्यों का चुनाव बड़े जनसंख्या से क्रम-रहित (अंधा-धुंध) तरीके से होता है |

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(15)  जजों का चुनाव , आम-नागरिकों द्वारा एक मूर्खता है | क्या आप सोच सकते हैं कि अनपढ़ लोग क़ानून की बारीकियों को समझ पाएंगे ? और यदि आप एक सीमित मतदाताओं को ये अधिकार देंगे, तो फिर किसाधर पर ये अधिकार दिए जाएँगे ?

नहीं, सीमित मतदाताओं को ही ये जजों को चुनने का अधिकार नहीं दिया जायेगा, मैं सभी मतदाताओं को ये अधिकार देने का प्रस्ताव कर रहा हूँ |
आप को हम अनपढ़ , आम-नागरिकों का अपमान करन अच्चालागता है , सही है ? आप कहते हैं कि मूर्ख लोग कैसे फैसला कर सकते है कि कौन जज होना चाहिए ? क्या केवल पढ़े-लिखे लोग , जैसे जज, वकील , आदि ही क़ानून की बरिकोइयाँ समझ सकते हैं? क्या हम आम-नागरिक क़ानून नहीं समझ सकते ? क़ानून तो अनपढ़ लोग भी समझ सकते हैं | क़ानून केवल सामान्य-ज्ञान है | क़ानून पढ़ना और बनाना, वकीलों, जजों का काम नहीं है, आम-नागरिकों का है |

अमेरिका के टेक्सास में, 1870 से सभी जज, मेजिस्ट्रेट से टेक्सास के हाई-कोर्ट के जज तक, सभी का चुनाव किया जाता रहा है | और 1870 के टेक्सास से आज के भारत में पढ़े-लिखे लोग ज्यादा हैं | अमेरिका में, एक शताब्दी से ज्यादा के लिए, 50  में से  20  राज्यों में चुनाव द्वारा जज बनाये जाते रहे हैं | और जिला पोलिस-कमिश्नर भी चुने जाते हैं | और अद्धे से ज्यादा दण्ड-अधिकारी अमेरिका में एक शताब्दी से ज्यादा चुने जाते हैं | आपके दलील के अनुसार, अमेरिका अभी तक एक नर्क बन चाहिए था | लेकिन क्या क्या सच्चाई आपके दलील के अनुसार है ? ऐसा क्यों है कि जहाँ जजों का चुनाव होता है, वहाँ विकास है, बजाय कि जहाँ जजों की नियुक्ति / अपोइंट-मेंट होती है ?
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चुनाव की प्रक्रिया भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) से मुक्त है | गुजरात के हाई-कोर्ट को लें | वहाँ 32 हाई-कोर्ट जज हैं, जिसमें से 16 बनिया और ब्राह्मण हैं , सभी इसीलिए जज हैं , क्योंकि उनके पिता या चाचा जज या नागरिक दंडाधिकारी थे या अच्छे वकील थे | चुनाव बहुत जरूरी है, न्यायपालिका में ये फैला-हुआ, भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) को समाप्त करना है तो |
और यदि जज को बदलने का आम-नागरिकों का अधिकार होता है, तो वो कम निकम्मा होगा एक नियुक्त/तैनात किया हुआ जज से , जो आम-नागरिकों द्वारा न निकाला जा सके |

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प्रश्नकर्ता- जज को सांसद द्वारा निकालने की प्रक्रिया / तरीका कठिन बनाई गयी है ,जिससे सांसद इसका दुरुपयोग / बुरा उपयोग ना कर सके | जज के निकालने की प्रक्रिया को आसान बना कर , आप न्यायपालिका को सांसद द्वारा दुरुपयोग करना आसान बना रहे हैं |

जज को निकालने के लिए सांसद के पास कोई अधिकार नहीं होना चाहिए | स्थानीय जज या सुप्रीम-कोर्ट के जज को निकालने / बदलने का अधिकार केवल हम आम-नागरिकों के पास होना चाहिए ,और किसी के पास नहीं |

जजों के लिए ये प्रक्रियाएँ होनी चाहिए –

क) प्रक्रिया जिसके द्वारा हम आम-नागरिक सुप्रीम-कोर्ट के जज, हाई-कोर्ट के जज और
स्थानीय जज को निकाल / बदल सकें |
ख) 5 सबसे सीनियर / बड़े जजों का राष्ट्रिय स्तर पर हम आम-नागरिकों द्वारा चुनाव होना
चाहिए |
ग) बाकी जजों का लिखित परीक्षा द्वारा नौकरी पर रखा जाना चाहिए |
घ) स्थानीय कोर्ट में , हाई-कोर्ट में और सुप्रीम-कोर्ट में, कोई भी मामले में, फैसला – सज़ा या/और जुर्माना जूरी-सदस्य द्वारा दिया जाना चाहिए ,ना कि जजों द्वारा

जज सिस्टम में स्वभिविक रूप से भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) है | और इसीलिए जज को फैसला देने का अधिकार नहीं होना चाहिए, केवल जूरी-सदस्यों को ही फैसला दिए जाने का अधिकार होना चाहिए , सभी स्तरों पर | और जजों को जाओं को नियुक्ति (नौकरी पर रखने) का अधिकार नहीं होना चाहिए , क्योंकि इससे बड़े स्तर पर भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) होता है |


प्रश्नकर्ता- एक जज के पास कानूनी कुशलता ,फैसला करने की क्षमता और इमानदारी होनी हहिये , जिसका एक राष्ट्रिय चुनाव द्वारा फैसला नहीं किया जा सकता है | चुनाव में ये सभी मुद्दों पर कभी बात नहीं होती | एक आम-नागरिक में इतनी क्षमता नहीं है कि वे किसी के कानूनी ज्ञान के बारे में कैसे फैसला दे सकें, इसीलिए जजों के लिए चुनाव बेहूदा है |

इमानदारी के बारे में बात करते समय, हम जजों को नेताओं से क्यों तुलना करते हैं ? हम  जजों की तुलना जूरी-सदस्यों से करें , तो पता चलेगा कि जज कितनी बुरी तरह से फेल हो जाएँगे | कोर्ट में सबसे ज्यादा जरूरी चीज होती है कि फैसला देने वालों का पहले से वकीलों, मुजरिमों , ऊच वर्ग के लोगों या किसी और के साथ मिली-भगत नहीं हो | कृपया , इस मुद्दे पर जज और जूरी-सदस्यों की तुलना करें | कितने जजों का अपने रिश्तेदार वकीलों के साथ मिली-भगत है ? कितने वकीलों और ऊंचे वर्ग के लोगों की मिली-भगत है ? इसके विपरीत, जूरी-सदस्य और वकीलों की मिली-भगत कभी सुनी नहीं जाती है और किसी भी जूरी सिस्टम के विरोधी ने एक भी मामला , जूरी-सदस्यों में भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) का बताया है |
और यदि , क़ानून का ज्ञान इतना जरूरी है, तो सुप्रीम-कोर्ट के जज, हाई-कोर्ट के जजों को नौकरी पर रखते समय क्या लिखित परीक्षा लेते हैं ? कोई नहीं | यदि क़ानून का ज्ञान इतना जरूरी है, तो जज क्यों नहीं लिखित परीक्षाएं देते ? क्योंकि यदि वे ऐसा करेंगे, तो वे अपने रिश्तेदारों को जज की नौकरी पर नहीं रख पाएंगे |

प्रश्नकर्ता- आप को ऐसा क्यों लगता है कि लोग अपने वोट , उम्मीदवारों के जाती, धर्म आदि को देखे बिना करेंगे ?

 

अमेरिका में टेक्सास में, आम-नागरिक जजों को 100-120 सालों से जजों का आम-चुनाव कर रहे हैं |
आप कहते हैं कि हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट के जज यदि आम-नागरिकों द्वारा चुने गए ,तो वो जाती, धर्म आदि पर होगा | तो क्या अपोइंत्मेंट की प्रक्रिया / तरीका , इसको कम कर देगा | लोगों को नियुक्त करने में भी ये दोष हो सकते हैं | उससे बुरा कि , उसमें भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) (रिश्तेदारों की तरफदारी) हो सकता है |
और आपका जातिवाद के बारे में विचार सही नहीं हैं | मान लीजिए , पूरा राज्य 10 हाई-कोर्ट के जजों का चुनाव करता है ,जहाँ हर मतदाता के पास 10 वोट हैं | अभी हर जाती के पास किसी भी राज्य में राज्य के कुल जन-संख्या का 51% नहीं है | ज्यादा से ज्यादा, किसी  जाती के पास 20% की संख्या है, और वो भी उप-जातियों में बंटी हुई है |दूसरे शब्दों में, जहाँ चुनाव-क्षेत्र बड़ा है, जातिवाद कोई मुद्दा नहीं होता | इसीलिए यदि हाई-कोर्ट के जज पूरे राज्य द्वारा चुने जाते हैं, तो जातिवाद की ना के बराबर भूमिका होगी |

प्रश्नकर्ता- असल में, जज चुनने की प्रक्रिया / तरीके से समय और पैसे की बरबादी होगी और दूसरे गलत बर्ताव भी होते हैं , चुनावों के समय |

 

चुनाव महंगे इसीलिए है क्योंकि चुनाव कमिश्नर, चुनाव करवाने के बेकार तरीके का प्रयोग करता हैं | नहीं तो, चुनाव कि लागत, आज के समय की लागत से आधी या एक तिहाई भी की जा सकती है | और भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) से होने वाला फायदे , लागत से कहीं ज्यादा होंगे | न्यायपालिका में रिश्वत-खोरी यदि देखें, वो चुनावों के लागत से कहीं ज्यादा है  |
प्रश्नकर्ता – जैसे मैंने कहा है, भाई-भतिजेवाद को पूरा समाप्त नहीं किया जा सकता है | जब तक किसी को चुनने का अधिकार है, तो वो व्यक्ति अपने खुद की पसंद के अनुसार ही निर्णय करेगा |

 

कृपया बताएं कि भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) कैसे संभव है जब 10 लाख आम-नागरिक एक स्थानीय जज का चुनाव करेंगे या 5 करोड़ गुजराती , गुजरात का हाई-कोर्ट जज चुनेंगे | क्या कोई लाखों-करोड़ों आम-नागरिकों का रिश्तेदार हो सकता है ?
इतना काफी होगा कहना कि हाई-कोर्ट के चुनाव की प्रक्रिया / तरीका, हाई-कोर्ट जजों में फैला-हुआ भाई-भतिजेवाद जो आज हम देखते हैं, को समाप्त करेगा |

प्रश्नकर्ता- इंटरवीयू / साक्षात्कार चयन का सबसे जरूरी हिस्सा है, चाहे वो आई.ऐ.एस , आई.आई.एम. में हो, या एन.डी.ऐ. में | हां , मैं मानता हूँ कि इंटरवीयू काफी समय छांटने का साधन बन जाता है, जब इंटरवीयू लेने वाले को किसी विशेष तरह के  व्यक्ति के लिए नफरत हो | लेकिन इंटरवीयू के फायदों को नकारा नहीं जा सकता |

 

केवल पसंद या नापसंद की बात नहीं है | उच्च-जाती के लोग `आई.ऐ.एस`, `आई.आई.एम` और दूसरे कालेजों में इंटरवीयू को दलितों को छांटने के लिए प्रयोग करते हैं और भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) के लिए करते हैं | न्यायपालिका में , जज इंटरवीयू द्वारा `वरिष्ठ अधिवक्ता (सीनियर वकील)` का शीर्षक (टायटल) देते हैं  और ये भी बड़े स्तर पर भाई-भातेजेवाद का साधन बन गया है |
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वो तरीका , जिसमें सबसे कम गलत बर्ताव हैं, वो लिखित परीक्षा हैं , बिना इंटरवीयू के | इंटरवीयू नर्क हैं और सभी गलत बर्तावों की जन्मदाता हैं – जातिवाद, छांटना, भाई-भतिजेवाद, भ्रष्टाचार, आदि, …. आप जो सोचें | लेकिन लिखित परीक्षा के अलावा, चुनाव में सबसे कम गलत बर्ताव है , इंटरवीयू और नियुक्ति / तैनाती (नौकरी पर रखना ) से बहुत कम |
कारण, क्यों नेता-बाबू-जज-पोलिस-नियामक-बुद्धिजीवी-ऊंचे लोग अल्प-लोकतांत्रिक (कुछ ही लोगों को अधिकार मिलना ) तरीके , जैसे एक जज, दूसरे जज को नियुक्त/तैनात करना ; और लोकतान्त्रिक सिस्टम (सभी लोगों को अधिकार) का विरोध करते हैं , इसीलिए ताकि वे पब्लिक (सरकारी) जमीनों , खदानों और अन्य अर्ध-प्राकृतिक अल्पाधिकार ( वो क्षेत्र जहाँ कई सौ खिलाड़ी नहीं हो सकते है ) जैसे दूरसंचार/फोन, बिजली, रोड आदि को नियंत्रण/कंट्रोल कर सकें |


(16) आपकी संविधान के बारे में समझ बताएं | नागरिक फैसले कैसे दे सकते हैं ?

 

मैं अपनी सामान्य तौर पर संविधान की समझ बताता हूँ | संविधान के पहले कुछ शब्द (“ हम , भारत के लोग…”) से ये साफ़ हो जाता है, कि भारत में , सभी राज्य, राष्ट्र और संविधान के अधिकार हम 120 करोड़ आम-नागरिकों के पास हैं , और उन आम-नागरिकों के नौकर जैसे सुप्रीम-कोर्ट के जज, हाई-कोर्ट के जज, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, आदि कुछ अधिकार का प्रयोग केवल और केवल हम आम-नागरिकों के सहमति , इच्छा/पसंद और खुशी से  करेंगे |
संविधान इस सत्य को कुछ शब्दों का हवाला देते हुए , फिर से पक्का करता है –
क) राजनीतिक न्याय
ख) लोकतांत्रिक
ग) गणतंत्र
घ)  समानता

ये सभी शब्द दृढ़ता-पूर्वक / निश्चित से ये कहते हैं कि आम-नागरिकों के नौकर या एजेंट , जैसे सुप्रीम-कोर्ट, हाई-कोर्ट जज,प्रधानमंत्री, आई.ऐ.एस (बाबू), पोलिस-कर्मी, आदि अपने पद पर तब तक रह सकते हैं जब तक आम-नागरिक उनको बदलना / हटाना नहीं चाहें | इसीलिए प्रधानमन्त्री , मुख्यमंत्री, हाई-कोर्ट के जज, सुप्रीम-कोर्ट के जज, आई.ऐ.एस (बाबू), पोलिस-कर्मी आदि को बदलने / निकालने का अधिकार निहित (छिपी हुई) है , भारत के संविधान में, जो कि हम आम नागरिकों द्वारा अर्थ लगाया जायेगा |
ये शब्द “ राजनैतिक न्याय” और “समानता” बताते (सूचित करते) हैं और सिद्ध करते हैं कि हर एक व्यक्ति का संविधान का अर्थ लगाना / व्याख्या का कुछ मूल्य होगा | इस कारण , यदि आम लोगों का बहुमत सुप्रीम कोर्ट के जजों के फैसले को असंवैधानिक बोलते हैं, तो वो फैसला भले ही 24 सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा वैध घोषित किया गया था, फिर भी वो फैसला  असंवैधानिक और व्यर्थ हो जाता है | दूसरे शब्दों में , सुप्रीम कोर्ट का फैसला मान्य तभ है जब तक कि हम आम लोग उसे असंवैधानिक घोषित नहीं कर देते |

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केवल समस्या है — प्रक्रियाओं का अभाव | लेकिन प्रक्रिया के अभाव से अधिकारों का अभाव का मायना/अर्थ नहीं है | इसका यही मायना है कि हमें एक अधिनियम/सरकारी आदेश की जरुरत है एक प्रक्रिया बनाने के लिए जिसके द्वारा संविधान का अर्थ लगाना `हम आम` लोगों द्वारा किया जा सके |  इसका ये मतलब नहीं कि `हम आम लोगों ` द्वारा अर्थ लगाना जजों द्वारा अर्थ लगाने से निम्न है | और मेरा एक उद्देश्य है कि इस इस प्रक्रिया की कमी को पूरा करना , ऐसे प्रक्रियाएँ ला कर जीसे हम अपने संविधान के हमारे नौकरों/एजेंटों को बदलने/निकालने के अधिकारों का प्रयोग कर सकते हैं |

मैं इन पदों के लिए सीधे चुनाव का प्रस्ताव करता हूँ-

1) सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान जज
2) हाई-कोर्ट के प्रधान जज
3) जिलों के प्रधान जज
4) प्रधानमंत्री
5) मुख्यमंत्री
6) महाह्पौर (मेयर)
7) सांसद
8) विधायक
9) पार्षद
10) जिला पोलिस-कमिश्नर

नीचे लिखे हुए पदों पर लिखित परीक्षाओं पर नियुक्ति / तैनात होना चाहिए –
1) एक लाख स्थानीय जज
2) क्लर्क
3) जिला पोलिस-कमिश्नर
आदि |
सभी बीच के स्तर के पद-अधिकारी को उनके सेवाओं और परीक्षाओं में प्राप्त नंबरों के आधार पर तरक्की देनी चाहिए |
तो रेलवे के क्लर्कों को चुनने की जरूरत नहीं है, यदि उनके चुनाव के लिए लिखित परीक्षाएं हों तो |
उनके लिए जूरी-आधारित तरीका होना चाहिए उनको निकालने के लिए |

इन पदों को नियुक्त / तैनात करना चाहिए, लेकिन हम आम-नागरिकों को निकालने/बदलने का अधिकार/तरीके होना चाहिए |

1) गृह-मंत्री
2) जिला शिक्षा अधिकारी
3) रिसर्व बैंक का गवर्नर (मुखिया)
4) प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सुप्रीम-कोर्ट के जज, हाई-कोर्ट के जज
आदि |

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ज्यादातर आम-नागरिकों का ये मानना है कि न्यायपालिका में भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों में तरफदार) आसमान जितनी ऊंची है , राजनीति से भी ज्यादा | लेकिन ऐसा नहीं कि नेताओं में कम भाई-भतिजेवाद है , लेकिन चुनावी के तरीकों से भाई-भतिजेवाद कम हो रही है , नेताओं में | उदाहरण के लिए , मोदी एक छोटे शहर के छोटे किराने का व्यापारी का बेटा है | इनकी तुलना के पदों वाले , हाई-कोर्ट के जज देखें | सभी वकीलों के परिवारों से आते हैं | और ये सत्य बहुत कुछ बताता है — आम-नागरिकों के बच्चे मुख्यमंत्री, `आई.ऐ.एस.`,  बन सकते हैं , लेकिन हाई-कोर्ट के प्रधान जज और सुप्रीम-कोर्ट के जज नहीं बन सकते हैं |
कोई एक-आध अपवाद/छूट हो सकता है, जैसे सुप्रीम-कोर्ट के जज बाला, लेकिन वो 1992 के पहले था जब हाई-कोर्ट के जज मुख्यमंत्री के द्वारा नियुक्त/तैनात किये जाते थे , ना कि हाई-कोर्ट के प्रधान जज द्वारा और इस लिए आम-नागरिक अंदर आ सकते थे | लेकिन 1992 के बाद, जजों ने जजों को नियुक्त / तैनात करना शुरू कर दिया , और न्यायपालिका में , जजों के बच्चों और उनके करीबी दोस्तों के बच्चों के लिए 100% आरक्षण हो गया | न्यायपालिका , खुद एक जाती में तेजी से बिगड़ कर बदलती जा रही है |

और निचले अदालतों में बहुत ज्यादा भ्रष्टाचार है | हाई-कोर्ट के जज और सुप्रीम-कोर्ट के जज इस समस्या को ठीक क्यों नहीं कर रहे ? क्योंकि, असल में निचली अदालतों के जजों का एक बड़ा हिस्सा , हाई-कोर्ट के जाओं के रिश्तेदार हैं | इसीलिए कोई आशा नहीं है कि हाई-कोर्ट के जज , निचली अदालतों में भ्रष्टाचार कम भी करेंगे |
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और `आई.ऐ.एस`(बाबूओं) में भ्रष्टाचार , केवल इसीलिए बड़ा है क्योंकि जजों ने भ्रष्ट आई.ऐ.एस को सज़ा नहीं दी है |
जब तक कोर्ट को सुधार नहीं जाएगा , तब तक कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं सुधेरेगा | और हम कोर्ट को कैसे सुधर सकते हैं, जब सुप्रीम-कोर्ट के जज भ्रष्ट है , भाई-भातिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) वाले हैं | इसी तरह हाई-कोर्ट के जज हैं | नेता और आई.ऐ.एस कोई खास अच्छे नहीं हैं |
तो केवल एक ही रास्ता है कि हम आम-नागरिक स्थिति को अपने हाथों में लें | दंगे करके नहीं, लेकिन आम-नागरिकों के `हाँ`/`ना` के दर्ज करने के अच्छे तरीकों द्वारा भ्रष्ट को निकालना/बदलना |

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नहीं तो , यदि सुप्रीम-कोर्ट और हाई-कोर्ट के जजों पर , और बुद्धिजीवी, नेता, आई.ऐ.एस (बाबू) ., आदि पर छोड़ दिया जाये , तो हम एक और पकिस्तान बन जाएँगे और फिर अमेरिका के गुलाम बन जाएँगे |

 (17) जूरी सिस्टम में भी जज सिस्टम के समस्याएं हो सकती हैं  ?

ये बात सही नहीं है | जूरी सिस्टम पर भाई-भात्रिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफार) और मिली-भगत का कोई भी प्रभाव नहीं होना साबित हो चुका है, जबकि 99% जज , पश्चिमी देश और सभी देशों में, भाई-भतिजेवाद और मिली-भगत वाले साबित हो चुके हैं | भारत में भी जब जूरी सिस्टम था, तो एक भी भाई-भतिजेवाद या मिली-भगत का मामला नहीं था , जबकि जज सिस्टम व्हुरुवात के दिनों से ही भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) वाला रहा है , उदाहरण., पी.एन.भगवती हाई-कोर्ट के जज तभी बन पाये थे क्योंकि उनके पिता सुप्रीम-कोर्ट के जज थे |

राजनीति में अपराधियों का भर जाना , न्यायपालिका में भाई-भतिजेवाद और भ्रष्टाचार के कारण हुआ है | जजों ने स्थानीय मुजरिमों का समर्थन किया है क्योंकि वे बहुत पैसा दे रहे थे जजों के रिश्तेदार वकीलों को | इसीलिए जजों ने ये अपराधियों का समर्थन किया और ये अपराधी ज्यादा ताकतवर बन गए और बाद में राजनीति में आ गए |
और हम आम-नागरिक जजों को मुजरिमों/गुंडों का समर्थन करने से नहीं रोक सके क्योंकि हम आम-नागरिकों के पास जजों को बदलने/निकालने का अधिकार नहीं है |
इसीलिए आप की बात कि जजों को निकालने/बदलने का आम-नागरिकों के अधिकार से समाज में अपराधी बढ़ेंगे बिलकुल गलत है , जबकि इसका उल्टा सही/सत्य है | कोई भी ऐसा तरीका नहीं है जिससे आम-नागरिक भ्रष्ट जज को बदल सकें , जिससे समाज में अपराधियों की ताकत बढ़ती जा रही है |

(18)  प्रधान-मन्त्री / मुख्यमंत्री कोर्ट की संख्या क्यों नहीं बढाते ?

 

जब तक कि सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान जज और हाई-कोर्ट के प्रधान जज कोर्ट की संख्या को बढ़ाने की मांग नहीं करते, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री कोर्ट की संख्या बढ़ा नहीं सकते | और जब भी सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान जज और हाई-कोर्ट के जजों ने कोर्ट के संख्या बढ़ाने के लिए कहा , तो कुछ ही हफ़्तों या महीनों में, प्रधान-मंत्री / मुख्यमंत्री ने इसको पूरा किया है | इसीलिए यदि कोर्ट की संख्या कम है , तो इसके लिए जिम्मेदार सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान जज , हाई-कोर्ट के प्रधान जज , सुप्रीम-कोर्ट के जज और हाई-कोर्ट के जज हैं |
क्या आप फिर भी कहेंगे कि ऐसे हाई-कोर्ट के प्रधान जज अपने पदों पर बने रहें कि निकाल दिए जायें ?

(19) जज कैसे नियुक्त / तैनात होते हैं ?

 

ये लिंक देखें-

http://lawmin.nic.in/ncrwc/finalreport/v2b1-14.htm

1992 से पहले , प्रधानमंत्री और सांसद राष्ट्रपति को निर्देश/आर्डर देते थे  , जो जजों को नियुक्त करता आता , सुप्रीम कोर्ट और हाई-कोर्ट के जजों से सलाह ले कर | `सलाह लेना ` जरूरी नहीं था |
1993 में , सुप्रीम-कोर्ट के जजों ने जान-बूझकर संविधान का गलत मतलब निकाला और सुप्रीम-कोर्ट के जजों को नियुक्त / तैनात करने की सारे अधिकार छीन लिए और भारत के कोर्ट को अपनी जागीर बना दिया | सुप्रीम-कोर्ट के जजों ने ये शब्द `सलाह लेना` को बंधनकारी / जरूरी होने का मतलब निकाला |
और ये गडबडी चली जा रही है, इसीलिए क्योंकि हम आम-नागरिकों के पास ऐसे तरीके नहीं हैं सुप्रीम-कोर्ट के जजों को निकालने के लिए , संविधान को बचाने के लिए |
असल में , इस प्रकार जज नियुक्त / तैनात किये जाते हैं :
1. सूप्रीम-कोर्ट के जज ,सुप्रीम-कोर्ट के जजों और जो नेता, ई.ऐ.एस (बाबू) , आई.पी.एस.,
ऊंचे वर्ग के लोगों, विदेशी कम्पनियाँ , जो हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट के जजों को
एहसान/उपहार देते हैं, उनके द्वारा नियुक्त / तैनात किये जाते हैं | इन जजों की हाई-कोर्ट
से सुप्रीम-कोर्ट तरक्की होती है |
2. हाई कोर्ट के जज , हाई कोर्ट के प्रधान-जज ,हाई-कोर्ट के जज, और सुप्रीम-कोर्ट के जज,
और जो नेता, `आई.ऐ.एस`(बाबू), पोलिस-कर्मी, ऊंचे-वर्ग जिन्होंने हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट
के जजों के लिए एहसान/उपहार दिया था, उनके द्वारा नियुक्त/तैनात किये जाते हैं | उन

नियुक्त/तैनात होने वालों में से लगभग 50% वकील होते हैं और 50% सत्र-न्यायलय (सैशन

कोर्ट) के जज होते हैं |

3. सत्र-न्यायलय (सैशन कोर्ट) के जज , हाई-कोर्ट के जजों द्वारा नियुक्त / तैनात  हैं , उनके
अधिकार द्वारा | उन नियुक्त/तैनात होने वाले जजों में से लगभग 50% वकीलों में से लिए
जाते  हैं और 50% मेजिस्ट्रेट में से लिए जाते हैं |
4. मेजिस्ट्रेट लिखित परीक्षाओं द्वारा नियुक्त/तैनात किये जाते हैं और उसके बाद इंटरवियू होता
है ,जो हाई-कोर्ट के प्रधान-जज द्वारा चुने गए हाई-कोर्ट के जज या रिटायर हुए हाई-कोर्ट के
जज लेते हैं | इंटरवीयू एक धोखा हैं | असल में , केवल जजों के रिश्तेदार या नजदीकी
दोस्त ही मजिस्ट्रेट बनते हैं |

—-

लिखित परीक्षाएं केवल न्यायपालिका के निचले जजों के लिए ही है —- मेजिस्ट्रेट और जूनियर जज | वहाँ भी इंटरवीयू/साक्षात्कार केवल चुने हुए लोगों द्वारा ही लिया जाता है | केवल जजों के रिश्तेदार या जान-पहचान के लोग ही चुने जाते हैं इन इंटरवीयू में |

जज भ्रष्ट और भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) वाले हो गए हैं , क्योंकि आम-नागरिकों के पास इनको बदलने का कोई भी तरीका नहीं है | आम-नागरिकों को जजों को  बदलने का अधिकार के अभाव में , कोई भी तैनात / नियूक्त  करने का तरीका क्यों ना हो ,पहले ही दिन से जज भाई-भतिजेवाद वाले हो जाते हैं और दूसरे दिन से भ्रष्ट हो जाते हैं |
—-

लेकिन अब भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) और अभी नकद द्वारा सौदे खुले आम होते हैं , इंटर-वीयू में | हाई-कोर्ट के प्रधान जज एक 3 रिटायर या वर्त्तमान जजों की कमीटी / समीति बनाते हैं और ये समीति इंटर-वीयू के अंक / नंबर देते हैं | ये इंटरवीयू में जजों के पास पूरे अधिकार होते हैं और इन इंटरवियू का प्रयोग केवल खुले-आम रिश्तेदारों की तरफदारी के लिए होता है |

जज सिस्टम के समर्थक जान-बूझ कर ये इंटरवीयू के सिस्टम का समर्थन करते हैं |
विष्णुचंद्र गुप्त (ऊर्फ चनाक्य-भाई) ने मुझे कुछ 2300 साल पहले बोला था : जो हानि नहीं पहुंचा सकता , उसका गुस्सा बेकार है | मैं इसके आगे ये कहूँगा : जो हानि नहीं पहुंचा सकता , उसका अस्तित्व (होना) बेकार है | और मैं ये भी कहूँगा : जो हानि नहीं पहुंचा सकता है, उसका सारा धन लूट लिया जायेगा और वो गुलाम/दास बन जायेगा |
`आई.ऐ.एस`(बाबू), पोलिस-कर्मी, जज, मंत्रियों ने हम आम-नागरिकों को कैसे गुलाम बनाया है ? क्योंकि हम आम-नागरिकों के पास प्रक्रियाएँ/तरीके नहीं हैं, उनको हानि पहुँचाने के लिए — उनको नौकरी से निकालने के लिए, उनकी संपत्ति जब्त करने और उनको जेल में डालने के लिए | इसलिए, यदि हम `तेज और सस्ते नागरिकों द्वारा भ्रष्ट को बदलने के तरीके ` नहीं लाते, तो वो हमें लूटते रहेंगे |

—–

प्रश्नकर्ता- तो फिर अब (1992 के बाद) , न्यायपालिका नेताओं द्वारा छेड़छाड़ नहीं की जा सकेगी , मतलब कि 1992 के व्यवस्था के परिवर्तन के बाद | फिर इसमें क्या दिक्कत है ?

 

देखिये, भारत के सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान जज को वरिष्टता के अनुसार निर्णय करने से कोई हानि नहीं है | लेकिन सुप्रीम-कोर्ट के जजों ने ये क्यों फैसला किया कि सुप्रीम-कोर्ट के जज ही सुप्रीम-कोर्ट के जज और हाई-कोर्ट के जज नियुक्त / तैनात करेंगे ? यदि नेता इतने बुरे हैं, तो कई सारे दुस्सरे तरीके हैं सुप्रीम-कोर्ट और हाई-कोर्ट के जजों को चुनने के लिए | (उदाहरण , अमेरिका में , आम-नागरिक जजों का चुनाव करते हैं ) ये ऐसा हुआ कि “ बाकी सभी बुरे हैं, इसीलिए हम (जज) सारे अधिकार छीन लेते हैं “, जैसे की ये जज दूसरों से ज्यादा अच्छे हैं |
कारण कि सुप्रीम-कोर्ट के जज ने सारे अधिकार छीन कर खुद को दे दिए , कि वो चाहते थे कि सारा (दो नंबर का ) माल उन्हीं को मिले | `भ्रष्ट नेता` तो केवल एक बहाना था |

प्रश्नकर्ता – जज बनने के लिए बहुत कड़े योग्यता / गुण चाहिए |

 

सुप्रीम-कोर्ट के जज बनने के नियम :

“3) एक व्यक्ति सुप्रीम-कोर्ट का जज नहीं बन सकता यदि वो खुद भारत का नागरिक नहीं हो और –
(क) वो कम से कम पांच साल के लिए हाई-कोर्ट का जज या दो या अधिक ऐसे कोर्ट में लगातार रहे हों  ; या
(ख) पिछले दस सालों के लिए हाई-कोर्ट के वकील रहे हों या दो या अधिक ऐसे कोर्ट में लगातार रहे हों : या
(ग) राष्ट्रपति के राय में एक माना हुआ जूरिस्ट (जो क़ानून के बारे में विवेक बुद्धि रखता हो )
स्पष्टीकरण 1: इस धारा में ,”हाई-कोर्ट” का मतलब, एक हाई-कोर्ट जो अभी या इस संविधान के लागू होने से पहले , भारत के क्षेत्र में , का कहीं भी अधिकार हो |
स्पष्टीकरण 2: ये धरा के लिए , वो समय का गणित करने के लिए जब वो वकील रहा हो , वो समय भी शामिल होगा ,जिसमें व्यक्ति न्यायिक पद जो जिला जज से कम नहीं हो ,पर रहा हो वकील बनने के बाद भी |
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हाई-कोर्ट के जज बनने के लिए वो व्यक्ति को केवल ये ही जरूरी है कि वो 10 साल के लिए वकील रहा हो |ऐसे एक लाख लोग होंगे जो ये आवश्यकता / जरूरत पूरी करते हैं | इसमें इतना कड़ा क्या है ? ऐसा नहीं कहा गया है कि उसे इतने `क` मामले लड़ने हैं |
और सुप्रीम कोर्ट का जज ,होने के लिए उसे हाई-कोर्ट का जज होना जरूरी है, जैसा कि मैंने पहले बताया है या हाई-कोर्ट में वकील होने की जरूरत है 10 साल के लिए | ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है , क्योंकि ऐसे हज़ारो वकील होंगे हाई-कोर्ट में |
सुप्रीम-कोर्ट के जज होने के लिए कोई लिखित परीक्षाओं की जरूरत नहीं है | सुप्रीम-कोर्ट के 3 जजों की कमीटी/समिति निर्णय करती है कि कौन सुप्रीम-कोर्ट के जज बनेंगे | चुनने का तरीका पूरी तरह भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) ,ऊंचे वर्ग के लोग ,जो जजों के रिश्टार वकीलों को पैसा देते हैं,आदि के सिफारिश से होती है | जी हाँ, हर कोई सुप्रीम-कोर्ट का जज नहीं बन सकता, केवल पैसे वाले लोग ही बन सकते हैं |

प्रश्नकर्ता- भ्रष्टाचार और भाई-भतिजेवाद न्यायपालिका में है, लेकिन उतनी ही जितना कि राजनीति में या चिकित्सा में या सेना में है |

 

सेना में भ्रष्टाचार , जजों के भ्रष्टाचार से बहुत, बहुत कम है | और भाई-भतिजेवाद भी बहुत ,बहुत कम है | असल में , बोअहुत से सैनिकों के लड़के अब सेना में नहीं जाना चाहते क्योंकि सेना में वेतन बहुत कम है | जजों में भी वेतन बहुत ज्यादा नहीं है ,लेकिन वहाँ सीधे या रिश्तेदार या दलाल वकीलों और व्यापारियों के द्वारा रिश्वेतें लेना आसान है | इसीलिए जज बनने की लाइन हर दिन लंबी ही होती जाती है , जबकि सेना के अफसरों में 20% खाली जगह है और ये दिनों-दिन बढ़ रही है |
न्यायपालिका में भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) राजनीति से ज्यादा है | राजनीति में ,मतदाता कभी भी रिश्तेदारी के आधार से वोट नहीं देते | विधायक के क्षेत्र में भी 2 लाख मतदाता हैं और किसी को भी 1000-2000 से ज्यादा रिश्तेदारों या जानने वालों से वोट नहीं मिल सकते हैं | इसीलिए, आप राजनीति में , “ आम-नागरिकों के औलाद ” जैसे मोदी को शीर्ष के पदों तक अभी भी पहुँचते देख सकते हैं | लेकिन उदाहरण हाई-कोर्ट के जजों की नियुक्त / तैनात होने में 1992 के बाद नहीं देख सकते |
इसीलिए हमें जजों में भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) को नजरंदाज नहीं करना चाहिए ,ये कह कर कि भाई-भतिजेवाद तो सभी जगह है —- दूसरे जगहों की तुलना में , जजों में भाई-भतिजेवाद बहुत-बहुत ज्यादा है |

प्रश्नकर्ता – किसी न किसी के पास तो अधिकार होंगे, जजों के नियुक्त / तैनात करने के लिए , जिसके कारण थोड़ी-बहुत तो भाई-भतिजेवाद रहेगा | लेकिन हम इसको कम कर सकते हैं, , ये अधिकार केवल जजों को न देकर | 

    हां, अधिकार तो रहेगा किसी न किसी के पास | लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि बिना भाई-भतिजेवाद वाले तरीके नहीं हैं | एक लाख से ज्याद मतदाताओं वाले चुनाव क्षेत्र में चुनाव में 995 भाई-भतिजेवाद नहीं होता क्योंकि किसी के भी 1000 से ज्यादा रिश्तेदार नहीं हो सकते | और दस लाख से ज्यादा वाले चुनाव क्षेत्र में, भाई-भतिजेवाद ( रिश्तेदारों की तरफदारी) 0.1% से भी कम होती है | तो सभी प्रधान जजों और 4 सबसे वरिष्ट/सीनियर जज (जिला,राज्य,राष्ट्र स्तर पर) के चुनाव होने से भाई-भतिजेवाद नहीं होगा |
(20) मैंने राष्ट्रीय न्यायिक आयोग (कमीशन) बनने के लिए हमेशा के लिए समर्थन किया है , जिसमें दो सीनियर/वरिष्ट जज, एक वकील , राजनैतिक प्रतिनिधि और एक मान्य नागरिक होगा |

ये 5-6 लोग खुले-आम ,फैला हुआ परस्पर-भाई-भतिजेवाद करेंगे ( मतलब `क`, `ख` के रिश्तेदार की तरफदारी करेगा और `ख`, `क` के रिश्तेदारों की तरफदारी करेगा |

(21) न्यायपालिका(कोर्ट) में भ्रष्टाचार ज्यादा है लेकिन इतनी ज्यादा नहीं जितनी हमारे राजनीति में या नगरपालिका में या राज्य के दूसरे विभागों में |

“भाई-भातिजेआद (रिश्तेदारों की तरफदारी) न्यायपालिका में सबसे ज्यादा है क्योंकि जज ही जजों को नियुक्त / तैनात करते हैं और जज ही फैसले भी देते हैं | और जजों में भ्रष्टाचार , राजनीति में भ्रष्टाचार जितनी ही जयादा है सिवाय इसके कि जज पैसे को खुद कभी नहीं छूते | वे सारे सौदे रिश्तेदार या दलाल वकीलों द्वारा ही करते हैं | इसीलिए इस बारीकी को छोड़ कर, हाई-कोर्ट के जजों और सुप्रीम-कोर्ट के जजों में भ्रष्टाचार अभी मंत्री, आई.ऐ.एस (बाबू), पोलिस-कर्मी जितनी ही है या कभी-कभी उससे भी ज्यादा |
प्रश्नकर्ता- सुधार के लिए मैं आज के मुजरिम नेताओं से कोई आशा नहीं रखता ये मुजरिमों के साथ मिली-भगत समाप्त करने के लिए क्योंकि उनको ही सबसे ज्यादा फायदा होता है , क्योंकि वे खुद मुजरिम हैं | सांसद में बड़ा हिस्सा हत्यारों और चोरों का है … इसको रोकने के लिए चुनाव आयोग(कमीशन) को चुनाव-सुधार लाने होंगे | एक साफ़-सुथरा सांसद ही ऐसे क़ानून ला सकता है , जिससे जजों, वकीलों और मुजरिमों के बीच मिली-भगत कम की जा सके |

 

यदि वकीलों और मुजरिमों के साथ (सीधे या वकीलों के द्वारा) एक जुर्म है, तो कोर्ट में बहुत सारे ऐसे जज हैं जिन्होंने ये अपराध किया है |
जज वैसे तो खूनी नहीं हैं , लेकिन कोर्ट में किसी खूनी की मदद करना (जैसे जज भयाना ने मनु शर्मा की मदद की थी और उसे छूटने देना , बहुत सारे सबूतों और गवाहों के बावजूद भी, एक बहुत बड़ा अपराध है (हत्यारे की मदद करना) | और जज ऐसे कई सौ हत्यारे और जबरदस्ती वसूली करने वालों की मदद करते हैं | वे सांसदों से अभी कम नहीं हैं |

अलग : आप सहमत हैं कि सांसद सब निकम्मे हैं | फिर भी , आप एक ऐसे तरीके का विरोध करते हैं , जो आम-नागरिक कानूनों पर अपनी राय भी दे सकें | आप बोलते हैं कि आज के सांसद मुजरिम आदि हैं | फिर भी आप ऐसे तरीकों का विरोध करते हैं , जिसके द्वारा आम-नागरिक सांसद ,विधायक , मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि को बदल / निकाल सकें | दूसरे शब्दों में, यदि सांसद बुरे हैं, तो फिर आम-नागरिकों को उनके कुछ अधिकार देने का विरोध क्यों ? या क्या आप हम आम-नागरिकों को सांसदों से ज्यादा नफरत करते हैं ?

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बहुत से जज चाहते हैं कि प्रधानमंत्री उनके रिश्तेदारों को जनता का दंडाधिकारी तैनात / नियुक्त करें | और , रिटायर हुए जजों को कमीशनों में पद चाहिए (मानव अधिकार, महिला अधिकार,पशु अधिकार, दलित अधिकार, अल्पसंख्यक अधिकार ,कानून कमीशन ., आदि आदि ) | और मंत्रियों अक्सर इन रिटायर जजों को कहते हैं कि वर्त्तमान जजों से कुछ काम करने के लिए | और बहुत से जज , नेताओं और बाबुओं से काम होता है (जैसे अपने रिश्तेदारों के लिए ठेके., आदि) | इस तरह नेताओं और जजों के बीच मिली-भगत और आपसी लेन-देन होता रहता है |

(22) कोर्ट में बकाया मामले क्यों बहुत ज्यादा हैं ,क्योंकि बाबू उचित करवाई नहीं करते ?

 

अभी प्रश्न है कि : बाबू उचित कारवाई क्यों नहीं करते ? क्योंकि जज निकम्मे बाबूओं को निकालता नहीं है और बाबू निकम्मे ही रहते हैं | यदि जज ,बाबुओं के साथ मिली-भगत नहीं बनाता और कुछ निकम्मे बाबूओं को निकलता , तो बाबुओं का निकम्मापन कम हो जाता |
अब प्रश्न है कि : जज इन निकम्मे बाबूओं को निकालता क्यों नहीं है ? उत्तर है : मिली-भगत | बाबू जजों के लिए कई काम करते हैं ., उदाहरण के लिए जज के रिश्तेदार जनता का (सरकारी) दंडाधिकारी नियुक्त / तैनात किये जाते हैं और सरकार से मोटे मामले मिलते हैं, जिसमें वे करोड़ों कमाते हैं, हारकर !! इसीलिए जज, निकम्मे बाबुओं को नहीं निकालते ?

(पश्चिम में, बाबू के निकम्मेपन का मामला जूरी-सदस्यों के पास जाता | क्योंकि जूरी सिस्टम में मिली-भगत नहीं है , इसीलिए वे तुरंत निकम्मे बाबू को निकाल देते | क्योंकि बाबू को पता है कि जूरी सिस्टम में मिली-भगत होना संभव नहीं है, वे अपनी सीमा में रहते हैं और भारत के बाबू जितने निकम्मे नहीं होते )

इसीलिए कोर्ट में बहुत सारे बकाया मामले, इसीलिए होते हैं क्योंकि जज निकम्मे/भ्रष्ट हैं |
और जो आप कहते हैं “ कोर्ट में बहुत सारे बकाया मामले इसीलये हैं क्योंकि बाबू वो नहीं करते जो उनको करना चाहिए “ सही है , लेकिन बहुत सारे मामले ऐसे भी हैं जहाँ सरकार के दफ्तर के बहुत सारे मामले भी बकाया रहते हैं, क्योंकि जज बाबूओं के काम में रुकावट डालते हैं ., उदाहरण :अवैध निर्माण (गैर-कानूनी बनाना) | बहुत सारे मामलों में जब बाबू उन अवैध निर्माणों को तोड़ने जाते हैं, तो जज ,रिश्वत लेकर , रोक आदेश (स्टे-आर्डर) दे देते हैं | (भारतीय जज रोक आदेश (स्टे-आर्डर) के लिए बदनाम हैं | एक बहुत खराब मामला, जो मुझे पता है, निजी/प्रायवेट प्लाट पर झुग्गियों को तोड़ने पर स्टे-आर्डर था ….मामला 12 सालों तक चला ) |

और इसी तरह, एक कारण क्यों मुजरिम की संख्या बढ़ती जा रही है क्योंकि जज उनको सज़ा नहीं देते , उनकी वकीलों के द्वारा , मुजरिमों के साथ मिली-भगत | इसलिए जब लोग देखते हैं कि मुजरिमों को जमानत मिल रही है और छूट जाते हैं , और ज्यादा लोग मुजरिम बन जाते हैं और , इसीलिए अपराध बढ़ते हैं और कोर्ट के मामले भी बढ़ते हैं | जैसे ज्यादा मुजरिम होते हैं, पोलिस और कोर्ट का बोझ बढ़ता है | तो यहाँ भी जजों के कारण पोलिस और प्रशासन पर बोझ बढ़ता है , इसके उल्टा नहीं |

(23)  `जूरी द्वारा अपील` संभव कैसे होगा ?

 

“जूरी द्वारा अपील” संभव है | हम को केवल एक 4-5 पन्नों का क़ानून चाहिए, सांसद में पारित करने के लिए | अपील दो तरीकों से लागो की जा सकती है –

पहला तरीका-
1) जिला कोर्ट की जूरी में 12 नागरिक होगी , जो पूरे जिले में से क्रम-रहित तरीके से चुने
जाएँगे |
2) अपील के लिए , राज्य के इघ-कोर्ट की जूरी में 12 और नागरिक होंगे , जो पूरे राज्य में
से क्रम-रहित तरीके से चुने जाएँगे | यदि जूरी-सदस्य पहले वाले फैसले को रद्द कर देते हैं
, तो फिर से मामले की सुनवाई होगी कोई दूसरे जिले में , उस राज्य में |
3) आगे अपील करने के लिए , राष्ट्र का सुप्रीम-कोर्ट जूरी में 12 और नागरिक होंगे, जो पूरे
देश में से क्रम-रहित तरीके से चुने जाएँगे | यदि जूरी-सदस्य पहले वाले फैसले को रद्द
कर देते हैं, तो फिर से मामले की सुनवाई होगी ,देश के किसी दूसरे जिले में |
दूसरा तरीका है :
1) एक मामला जूरी द्वारा जिला कोर्ट में सुना जाता है |
2) यदि व्यक्ति को अपील चाहिए, तो वो हाई-कोर्ट की महा-जूरी-मंडल के सामने अपील कर
सकता है | यदि महा-जूरी-मंडल की बहुमत इजाजत / अनुमति दे देते हैं , तो वे मामले

को पांच क्रम-रहित तरीके से चुने गए जिले के कोर्ट को भेजेंगे , ये निर्णय लेने के लिए

कि पहले वाली जूरी का फैसला सही था कि नहीं |

3) पांचो जिलों में मामले एक साथ चल सकते हैं , यदि दोनों पक्ष सहमत हो जाते हैं ,या
एक के बाद एक चलेंगे |

4)  यदि 5 जिला कोर्ट की जूरी-मंडलों में से 3 ने पहले वाली जूरी का फैसला गलत बताया, तो
पहले वाली जूरी का फैसला रद्द होगा |
5)  आगे अपील के लिए , सुप्रीम-कोर्ट की महा-जूरी मंडल के सामने मामला लाना होगा |

यदि महा-जूरी-मंडल की बहुमत इजाजत / अनुमति दे देते हैं , तो वे मामले

को नौ क्रम-रहित तरीके से चुने गए जिले के कोर्ट को भेजेंगे , ये निर्णय लेने के लिए

कि पहले वाली जूरी का फैसला सही था कि नहीं |

6)  नौ जिलों में मामले एक साथ चल सकते हैं , यदि दोनों पक्ष सहमत हो जाते हैं ,या
एक के बाद एक चलेंगे |
7)  यदि 9 जिला कोर्ट की जूरी-मंडलों में से 5 ने पहले वाली जूरी का फैसला गलत बताया, तो
पहले वाली जूरी का फैसला रद्द होगा |

हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट के जजों से असल में , छुटकारा पाना संभव है और जूरी-सदस्य का  जजों के बदले फैसला देना संभव है |
फायदा जबरदस्त है —- हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट के जज में बहुत ज्यादा मिली-भगत है , ऊंचे वर्ग के लोगों और बड़े मुजरिम जैसे टैक्स की बड़ी-बड़ी चोरी करने वाले, बड़े-बड़े लोन वापिस ना देने वाले., आदि के साथ | इन मिली-भगत के कारण , ताकतवर आर्थिक अपराधी , कोर्ट से छूट जाते हैं, कितने भी धोखे करने के बाद भी | लेकिन ये मुजरिम , हजारों जूरी-सदस्यों के साथ मिली-भगत नहीं बना सकते पूरे राज्य/देश में और इसीलिए वे सज़ा पाएंगे |

 

(24) मेरे पास काफी ज्ञान है ये कहने के लिए कि सुप्रीम-कोर्ट के जज , कुल-मिलाकर बहुत ईमानदार हैं

फिर आप सुप्रीम-कोर्ट में भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) कैसे है ? एक ईमानदार व्यक्ति रिश्तेदारों और अपने जान-पहचान के लोगों की तरफदारी क्यों करेगा ?
सुप्रीम-कोर्ट में भाई-भतिजेवाद ,भ्रष्टाचार में बदल जाता है | सुप्रीम कोर्ट के जज नियम से क़ानून के मंत्रालय के बाबूओं को अपने बेटे या रिश्तेदारों को जनता का (सरकारी) दंडाधिकारी नियुक्त/तैनात करने के लिए कहते हैं | और ये जन-दंडाधिकारियों को करोड़ों रुपये मिलते हैं बड़ी-बड़ी कंपनियों से , मामला हारने के लिए | एक व्यक्ति , जो गलत काम करता है , अपने-आप को या उसके बेटे या उसके रिश्तेदार को पैसे-वाला बनने के लिए, और `हम आम-नागरिक लूटे जाते हैं `|
और कृपया , ये भी समझाएं कि सुप्रीम-कोर्ट के जजों ने जज भयाना (जसिका बहन वाला मामला ) को दिल्ली हाई-कोर्ट भेज कर ,कैसे तरक्की देने का फैसला किया ? भयाना रिश्वत लेने के लिए बदनाम था और सुप्रीम-कोर्ट के जजों को पता था कि वो जान-बूझकर मामले को लटका रहा है ,मुलजिम को बचाने के लिए | जज भयाना के निकम्मे होने के बारे में पूरी जानकारी होने के बावजूद , सुप्रीम-कोर्ट के जजों ने उसको तरक्की दी | देखिये , उस मुजरिम के पिता की करोड़ों की संपत्ति थी, जिससे सुप्रीम-कोर्ट के जज ने क्यों ऐसा किया, आसानी से पता चल जाता है |
सुप्रीम कोर्ट और हाई-कोर्ट के जज, अपने अधिकारों का गलत उपयोग कर रहे हैं |

उन लोगों की लिस्ट देखें जो सुप्रीम-कोर्ट और हाई-कोर्ट के जज नियुक्त/तैनात किये गए , और किसी को उनके रिश्तेदारों के बारे में पूछें | 100 में से 99 मशहूर जजों और मशहूर वकीलों के भाई, भतीजे,आदि हैं |
गुजरात हाई-कोर्ट में, मैंने अभी तक, 10 वकीलों की लिस्ट बनाई है , जिन्होंने अपनी 10-12 सालों की वकालत से केवल 5लाख कमाए | उनके पिता/चाचा जज बन जाते हैं , और 3 सालों के अंदर, उनकी आमदनी 50 लाख पार कर जाती है |
प्रश्नकर्ता- मुझे पक्का नहीं कि सुप्रीम-कोर्ट के जज , ऐसे व्यवस्था बना सकते हैं , इस समस्या का हल करने के लिए , जो हमारे कोर्ट में है- फैला हुआ जज-वकील की मिली-भगत और फैली हुई जज-मुजरिम (सीधे या वकील द्वारा) मिली-भगत |

 

सुप्रीम-कोर्ट के जज ये बदलाव कर सकते हैं –
क) कोई भी व्यक्ति ,जिसका नाम हाई-कोर्ट के जज के लिए विचार किया जा रहा है, उसका
नाम का खुलासा 6 महीने पहले , उसके हाई-कोर्ट के जज बनने से पहले | ताकि यदि
कोई आम-नागरिक को उसके निकम्मेपन की कोई भी जानकारी है, तो वो सुप्रीम-कोर्ट
के जजों को लिखा सकता है और इन्टरनेट पर भी डाल सकता है |
ख) उसकी और उसके रिश्तेदारों की संपत्ति और उन ट्रस्ट की संपत्ति , जिसमें वो या उसके
रिश्तेदारों सदस्य हैं ,इन्टरनेट पर डाली जायेगी (जैसे की सांसदों के उम्मीदवारों को
अपनी संपत्ति घोषित करनी पड़ती है )
ग) अभी के कोर्ट और पहले के कोर्ट में ,उसके रिश्तेदारों के नाम इन्टरनेट पर डाले जाएँगे |

क्या उन्होंने ऐसा किया है ? नहीं | क्यों नहीं ?

ये तीन कदम उनके अपने रिश्तेदारों को कोर्ट में , तरक्की देने के क्षमता को बहुत कम कर देगा |
अमेरिका में, जजों के नाम 3-4 महीने पहले घोषित कर दिए जाते हैं, उनके जज बनने से पहले , और आम-नागरिक को छूट है , वो कारण लिखने के लिए, कि क्यों उस व्यक्ति को जज नहीं बनाया जाना चाहिए | फिर भारतीय जज , जज बनने वाले लोगों का नामों का खुलासा करने का क्यों विरोध करते हैं ?
और बहुत सार्थक/अच्छे लोकतंत्र में, जज और बुद्धिजीवी आदि जूरी-सदस्यों का भी विश्वास करते हैं | भारत में ऐसा नहीं करते | तो क्या भारत में लोकतंत्र का कोई मतलब है ?

(25)  भारत में बैंक गुंडों का इस्तेमाल क्यों करते हैं कर्जे पर दिए हुए पैसों की वसूली के लिए ?

क्योंकि भारत में जज निकम्मे हैं | जज बैंकों को कर्जे की वसूली करने में कोई सहायता नहीं करते और यदि कोई मुजरिम गिरफ्तार होता है, तो जज उसको छोड़ देते हैं , यदि वो जज के रिश्तेदार वकील की सेवाएं लेता है तो |
इसीलिए कर्जे की वसूली के लिए अपराधियों का प्रयोग , जजों के निकम्मे होने के कारण है
|
और इसी तरह, राजनीति भी अपराध का क्षेत्र बन गया है, जजों के निकम्मे होने के कारण | जजों का , वकीलों , आदि के साथ मिली-भगत होने से वे मुजरिम को छोड़ देते हैं , और मुजरिम ताकतवर बन जाता है और राजनीति से अच्छे लोग भाग जाते हैं | इसीलिए अंत में , मतदाताओं को केवल 3-4 मुजरिमों में से ही चुनना होता है |

(26) भारत में कानूनों का पालन क्यों नहीं सही से कराया जाता ?

भारत में कानूनों का पालन करवाने वाले अधिकारी , विधायक या सांसद या मंत्री नहीं हैं , लेकिन जज हैं | जी, हाँ, जज ही हैं , जो गैर-जिम्मेदार बाबू,पोलिस वाले को सज़ा सुना कर ये तय करते हैं कि बाबू और पुलिसवाले कानूनों का पालन करवाएंगे के नहीं | यदि जज आलसी या भ्रष्ट बाबुओं को सज़ा दें , तो बाबुओं में भ्रष्टाचार कम होगी और क़ानून का अच्छे से पालन होगा | तो कानूनों का अच्छे से पालन इसीलिए नहीं हो रहा भारत में , क्योंकि जज जान-बूझकर उन अफसरों को सज़ा नहीं देते जो कानूनों का पालन नहीं करवाते |

(27) नेता-बाबू-जज-पोलिस-नियामक (प्रबंध करने वाले )-बुद्धिजीवी-ऊंचे वर्ग के लोग के ट्रस्ट की संपत्ति की घोषणा क्यों होनी चाहिए , न कि केवल उनकी व्यक्तिगत (खुद की) संपत्ति ?

 

अधिकतर नेता-बाबू-जज-पोलिस-नियामक-बुद्धिजीवी-ऊंचे लोग अपनी सारी संपत्ति , ट्रस्ट और कंपनियों में रखते हैं , अपने नाम पर नहीं रखते |  मेरे विचार से , हमें एक ऐसा क़ानून को लागू करना चाहिए , जिससे सभी ट्रस्ट की संपत्ति , और ट्रस्ट-सदस्यों की टैक्स पहचान-पत्र को सार्वजनिक/पब्लिक कर देना चाहिए | इस तरह हमें पता चल जायेगा कि कितना पैसा, जमीन ,आदि, नेता-बाबू-जज-पोलिस-नियामक=बुद्धिजीवी-ऊंचे लोगों का ट्रस्ट में है |
(28) क़ानून बनाना किसका काम है , क़ानून बनने का स्पेशलिस्ट / विशेषज्ञ कौन है ?

    क़ानून बनाना किसका काम है ? वकील का ? नहीं | वो तो मामले लड़ते हैं | जज का ? नहीं | वो तो फैसला सुनाते हैं | सांसद/विधायक का ? नहीं | वे तो केवल क़ानून को  पास करवाते हैं | जी हां, ये आप का और मेरा काम है, क़ानून बना कर सांसद/विधायक को देना और उसको पास करवाने के लिए दबाव डालना |
लेकिन इस के लिए हम को कुछ क़ानून पहले पढ़ना होगा, फिर ही हम क़ानून बना सकते हैं |
अनपढ़ भी क़ानून-ड्राफ्ट समझ सकते हैं |
कृपया नागरिकों की अपना कर्तव्य निभाएं , कानून-ड्राफ्ट पढ़ कर , और संसद/विधायक पर दबाव डालें कि उनको पास करें |

(29)  कोर्ट को मंत्रियोंसांसदों सीबीआई आदि के माध्यम सेन्यायाधीशों आदि पर जांच करने कीया उन्हें सज़ा देने की शक्ति नहीं है |

कोर्ट के पास ,किसी भी व्यक्ति के खिलाफ जांच करने के लिए और देश में व्यवस्था रखने के लिए किसी को भी कैद करने की शक्ति है | केवल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, जब सत्ता में हों, को कैद होने से छूट है |

कृपया सुप्रीम-कोर्ट के इस बयान को देखें-

“सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रयोग की जा सकने वाले शक्ति की सीमा आकाश ही है ,जब यह अन्याय का पीछा करता है |”

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा है –

http://www.thehindu.com/news/national/article2288114.ece

सुप्रीम-कोर्ट ,अपने कहे अनुसार, ऐसा नहीं कर रहा है, से ये पता चलता है कि सुप्रीम कोर्ट के जज भ्रष्ट हैं |

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