कुछ महत्वपूर्ण सूत्र


*1)पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) – पारदर्शी शिकायत की हम परिभाषा करते हैं जो शिकायत दृश्य हो और जाँची जा सके कभी भी, कहीं भी और किसी के भी द्वारा ताकि कोई बाबु, कोई नेता, कोई जज या मीडिया उसे दबा नहीं सके| ऐसी एक पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली/सिस्टम चैप्टर 1 में देखें | देश को सुधारने के लिए हमें सौ क़ानून चाहिए और यदि हरेक के लिए अन्दोलान करें , तो बहुत समय लगेगा| इसीलिए एक आन्दोलन करके ये प्रणाली(सिस्टम) ले आयें ,तो इस के द्वारा बाकी क़ानून कुछ ही महीनों में आ जाएँगे |

*2)  अमेरिका की अदालतों में फैसले कुछ ही सप्ताह में क्यों आ जाते हैं और भारत में फैसले आने में सालों क्यों लग जाते हैं ? क्योंकि अमेरिका में नागरिकों के पास जज को नौकरी से निकालने का अधिकार है | इसीलिए जज सिस्टम को अच्छा रखते हैं | इसीलिए हमें भारत में भी प्रजा अधीन जज चाहिए |

भारत में यदि एक मुजरिम के खिलाफ मामला दर्ज कोई करता है, तो मुजरिम जज के रिश्तेदार वकील द्वारा उसको पैसे देता है और बदले में जज मामले की तारीख बढा देते है| इससे मुजरिम को गवाहों को खरीदने/धमकाने के लिए समय मिल जाता है | और मामला दर्ज करने वाले का भी मनोबल टूट जाता है और फिर मुजरिम छूट जाता है सालों के मुकदम्मे के बाद भी |

अमेरिका में यदि ज्यादा फैसले आने में ज्यादा समय लगने लगे , तो वहाँ के नागरिक विरोध करने लगते हैं और यदि जज स्थिति को सुधारता नहीं , तो उसे नौकरी से निकाल देते हैं | इसीलिए नौकरी जाने के डर और सज़ा पाने के डर से , 99 % जज पहले से  सिस्टम को अच्छा रखते हैं| और 1% जजों को वहाँ के नागरिक बदल देते हैं |

*3)अच्छे लोगों के इन्तेज़ार करने की आदत कि वो देश का सुधार करेंगे की मूर्खता

 

भारत में हमें  आदत है कि अच्छे लोगों का इंतज़ार करना कि वे सत्ता में आयें और भारत को सुधारें और गरीबी और भ्रष्टाचार को समाप्त करें |

इसके बदले हम ,आम नागरिकों को सत्ता हाथ में लेनी चाहिए मंत्रियों और जजों से | हम `प्रजा अधीन-राजा(शाशक) और जूरी-सिस्टम की मांग कर सकते हैं और सत्ता अपने हाथों में ले सकते हैं | ये पूरी तरह से मूर्खता है कि अच्छे नेता और जज के लिए सत्ता में आने का इन्तेज़ार करना | कहानी की सीख ये है कि भारतीय नागरिक इतने सौभाग्यशाली नहीं रहे पिच्छले 65 सालों से कि उन्हें अच्छा नेता मिला हो |

*4) हमारे देश की सेना इतनी कमजोर है कि  विदेशी देश, हमपर आसानी से हमला कर सकते हैं |

हमारे देश के पडोसी, चीन और पकिस्तान , और पाकिस्तान का मित्र अमेरिका ,हामरे ऊपर हमला कर सकते हैं , अलग-अलग या एक साथ भी | ऐसा किसी ने नहीं सोचा था 1989 में कि अमेरिका इराक के ऊपर हमला करेगा और आधा से ज्यादा इराक को बरबाद कर देगा 1990 में और दूसरा आधा 2004 में बरबाद करेगा | ऐसे ही भारत पर भी दुश्मन देश हमला कर सकते हैं |

यदि भारत के पास हथियार नहीं होंगे तो , वो लड़ाई बुरी तरह हार जायेगा | और 90-99% देश के लोग, लाखों- करोड़ों लोग मार दिए जाएँगे , लूट लिए जाएँगे | इस लिए लड़ाई का मुकाबला करने के लिए , भारत को हथियारों की जरूरत होगी | या तो भारत को फिर, हथियार बाहर के देशों से मंगाने होंगे, या तो भारत को अपने हथियार बनाने होंगे |

हम `प्रजा अधीन-राजा` के कार्यकर्ता, ये विश्वास करते हैं कि हथियार को दूसरे देशों से मंगाने के बजाय, हमें खुद हथियार भारत में बनने चाहिए,क्योंकि हथियार दूसरे देश से मंगाने से दूर्सरा देश, युद्ध के समय मदद करने के बदले , हमारे खानें, तेल के कुँए, स्पेक्ट्रुम, बैंक आदि पर कब्जा कर सकता है और हमारी शिक्षा , खेती बर्बाद करके उनपर खाने, और तकनीकी पर भी निर्भर बना सकता है |

इसीलिए हम `प्रजा अधीन-राजा` कार्यकर्ता ये विश्वास करते हैं कि हमें एक ऐसा शाशन चाहिए जो बड़े स्तर पर अमेरिका के जैसे अच्छे हथियार भारत में बना सकें | और हम `प्रजा अधीन-राजा` केकार्यकर्ता ये विश्वास करते हैं कि ऐसा शाशन बिना `प्रजा अधीन-प्रधानमन्त्री`, `प्रजा अधीन-सुप्रीम-कोर्ट जज `, “सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)`, `प्रजा अधीन-जिला शिक्षा अधिकारी`, और ऐसे अन्य प्रस्तावित क़ानून-ड्राफ्ट के बिना नहीं आ सकते |

*5) कृपया ये देशद्रोही प्रश्न ना पूछें-` क्या आप श्री `क ख ग` को समर्थन करते हैं?` लेकिन  ये देशभक्त प्रश्न पूछें-` कौन से क़ानून-ड्राफ्ट का समर्थन करते हैं देश को विदेशी कंपनियों का गुलाम बनने से रोकने के लिए ?`

हमें अक्सर पूछा जाता है कि क्या आप श्री `क ख ग` का समर्थन करते हैं देस्व्ह के नाम पर ?

ये एक बेकार और देशद्रोही प्रश्न है |

कृपया हमें,जो आम नागरिक जो देश-भक्त हैं , ऐसे प्रश्न ना पूछें | हम अपने परिवार, अपने समाज के प्रति वफादार हैं, फिर अपने राज्य और अपने देश के प्रति वफादार हैं |

इसीलिए , इसके बजाय, ये देश-भक्त प्रश्न पूछें `आप क्या क़ानून-ड्राफ्ट का समर्थन करते हैं अपने देश के लिए और विदेशी कंपनियों के विरुद्ध ताकि वे देश को गुलाम न बना सके और देश की 99% जनता को लूट न ले ?`

विदेशी कंपनियों का मुख्य उद्देश्य खाने-पीने के बाजार पर कब्ज़ा करना नहीं है, जो अर्थ-व्यवस्था/देश के कुल बाजार का 5% से भी कम हिस्सा है, लेकिन हमारी खानों, जमीन पर कब्ज़ा करना है, हमारी हथियार बनने की ताकत, भारत की खेती को तोड़ने , विज्ञानं/गणित की पढ़ाई/शिक्षा को बरबाद करना है , ताकि हमारा देश विदेशी कंपनियों पर खाने, हथियार और तकनीकी पर निर्भर बन जाये | 

विदेशी कंपनियों ने अभी तक 50% , के ऊपर लिखे गए अपने उद्देश्य में सफल हो चुके हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें बहुत समय और पैसा लगा है| `सरकारी लोकपाल/जनलोकपाल बिना `प्रजा अधीन-लोकपाल` और `पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम) ` के क़ानून-ड्राफ्ट के, वे भारत को जल्दी ही अपना गुलाम बना लेंगे कम पैसे और कम समय में |

सेना और हथियार-उत्पादन कमजोर होने के कारण, कोई भी विदेशी देश हम पर आक्रमण कर सकता है और 99% नागरिकों को लूट सकता है |

इसीलिए ये प्रश्न पूछें- ` क्या क़ानून-ड्राफ्ट का आप समर्थन करते हैं देश को विदेशी कंपनियों का गुलाम बनने से और 99% देश के लोगों के लुटने से `  

 

*6)  भ्रष्ट गठबंधन/ साँठ-गाँठ –

इसमें नेता-बाबू-जज-पुलिस-नियामक(रेगुलेटर)-बुद्धिजीवी-विशिष्ट वर्ग(उच्चवर्ग) आते हैं |

बुद्धिजीवी में पत्रकार,स्तंभकार,संपादक, गैर-तकनिकी विषय के प्रोफेस्सर, कुल-पति , विश्वविद्यालों के गैर तकनिकी विभागों के विभागाध्यक्ष| विशिष्ट वर्ग में धनी लोग आते हैं जैसे मीडिया मालिक, बड़े विज्ञापक | इनमें सबसे कम भ्रष्ट जो मैं मानता हूँ वो पोलिस-सेवक हैं, उससे अधिक भ्रष्ट बाबू, फिर नेता ,फिर जज और सबसे अधिक भ्रष्ट बुद्धिजीवी हैं (बुद्धिजीवी के चुनाव में केवल साक्षात्कार ही होता है जिससे भाई-भातिजेवाद और भ्रष्टाचार को बदावा मिलता है) | और श्रृंखला के शीर्ष में विशिष्ट वर्ग हैं – जो अधिकतर घूस देने वाले हैं |

*7)   क़ानून लागू करने वाले अधिकारी भारत में विधायक / सांसद / मंत्री नहीं लेकिन जज हैं | जज हैं जो गैर जिम्मेदार बाबूओं/पुलिसवालों को सज़ा देकर ये निर्णय करते हैं कि बाबू/पुलिसवाले क़ानून लागू होता है कि नहीं | यदि जज आलसी, भ्रष्ट बाबूओं को सज़ा देते हैं तो ,बाबू भ्रष्टाचार कम कर देंगे और फूर्ती से काम करेंगे और क़ानून लागू/कार्यान्वित होगा | इसीलिए क़ानून इसीलिए लागू नहीं होते भारत में क्योंकि जज जानबूझकर अफसरों को सज़ा नहीं देता जो कानूनों को लागू नहीं करते |

* 8)  90 % से अधिक आम आदमियों के पास पैसे नहीं हैं रिश्वत देने के लिए और कोई अधिकार नहीं है रिश्वत लेने के लिए |

 

* 9)  यदि कोई कहता है कि कोई प्रसिद्द व्यक्ति `क ख ग ` जो कहता है वो सही है और जो एक आम आदमी जो कहता है वो गलत है क्योंकि वो जाना पहचाना नहीं है या उसका कोई परिचय नहीं हो , तो हम इससे सहमत  हैं | व्यक्ति क्या कह रहा है, वो अधिक महत्वपूर्ण है ना कि कौन कह रहा है |

* 10)  लोकतंत्र के स्तंभ / खम्भे-

लोकतंत्र जैसे आज 50 देशों में है और जैसे पिछले 2000 सालों में थी, के कई स्तंभ/खम्भे हैं जिसमें सबसे महत्वपूर्ण हैं-

1. चुनाव ( चैप्टर 40 देखें)

2. हथियार बनाना और हथियार से लैस होना (चैप्टर 29 देखें)

3.  जूरी/प्रजा अधीन न्यायतंत्र (चैप्टर 21 देखें)

4. भ्रष्ट को बदलने की प्रणाली/सिस्टम (चैप्टर 6 देखें)

5.नागरिकों द्वारा सुनवाई/मुकद्दमा बहुमत के आधार पर ( चैप्टर 27 देखें)

चुनाव लोकतंत्र का सबसे कमजोर स्तंभ है और सबसे कम उपयोगी (या सबसे बेकार) है 1-5 में से , और स्तंभ 2-5 के गैर हाज़री/कमी में इसका कोई मूल्य नहीं है| चुनाव प्रक्रिया कोड/नियम को बदलने के प्रस्ताव और 2-5 स्तंभों/बिंदुओं को यथा पूर्व स्थिति रखना( उनको लागू न करना)से हम आम लोगों को कोई सहायता नहीं मिलेगी |चाहे हमारे पास 1000 सांसद हों या 2000 सांसद या 100 सांसद , चाहे हमारा चुनाव का तरीका कोई भी हो , लेकिन ये सब 2-5 स्तंभ के गैर-हाजिरी में , कोई काम के नहीं | इससे कोई कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन चुना जाता है और कैसे चुना जाता है– 2-5 स्तंभों के अभाव में , वे कोई अलग तरह से व्यवहार नहीं करेंगे, और भ्रष्टाचार भी कम नहीं होगा | पद पाने के पहले सभी व्यक्ति अच्छे और ईमानदार होते हैं लेकिन पद पाने के बाद भ्रष्ट हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उनके मालिक, आम नागरिक के पास भ्रष्ट को बदलने / सज़ा देने के लिए अधिकार नहीं है |  भ्रष्ट को बदलने के लिए और सज़ा देने का विवरण अध्याय 2,6,21 देखें |

*11)  हम अपनी शक्ती और समय का 75% भाग से अधिक, अच्छे लोगों का बढावा करने में प्रयोग करते हैं लेकिन ये जरूरी है कि अपनी शक्ति और समय का 25% भाग बुरे का खुलासा करने में लगाएं ,क्योंकि यदि बुरे का खुलासा नहीं होगा , कार्यकर्ता/वालंटियर बुरे का अनुसरण करते रहेंगे और अच्छे लोगों को वालंटियर नहीं मिलेंगे  |

* 12)  राजनीति में मौन शब्दों से अधिक शोर वाला है |

राजनीति में व्यक्ति को उसके शब्दों से नहीं उसके मौन से आंकना चाहिए |

*13) राजनीति ये नहीं है कि शाशक कैसे नागरिकों पर शाशन करेगा, लेकिन ये है कि नागरिक कैसे शाशक को नागरिकों का धन हड़पने/ छीनने से रोक सकते हैं | पारदर्शी शिकायत प्रणाली/सिस्टम और भ्रष्ट को बदलने/सज़ा देने का अधिकार और अन्य जनसाधारण-समर्थक क़ानून/`सरकारी आदेश` इस अच्छी राजनीति को सरल बनाते हैं|

असली राजनीति परिभाषित की जा सकती है कि कैसे नागरिक नेताओं,जज आदि को उनके स्वामी बनने से रोक सकें | यदि नागरिक ये राजनीती के बारे में जागरूक नहीं हैं , तो वे नेताओं, जजों आदि के गुलाम बन जाएँगे |

* 14)  कोई व्यक्ति भ्रष्ट है कि नहीं इसकी अग्नि परीक्षा ये है कि क्या वो व्यक्ति जनसाधारण-समर्थक क़ानून-ड्राफ्ट (मसौदे) का समर्थन करता है या नहीं?

 

15)  क़ानून समझना और क़ानून-ड्राफ्ट बनाना केवल व्यावहारिक ज्ञान है

[1.] क़ानून केवल व्यावहारिक ज्ञान है | क़ानून को एक अनपढ व्यक्ति भी समझ सकता है यदि कोई उस को ये क़ानून-ड्राफ्ट पढ कर सुनाये और वो क़ानून-ड्राफ्ट / मसौदे बना भी सकता है |

[2.] कानूनों के दो भाग होते हैं-तकनिकी और विश्लेषण सम्बन्धी | यदि आपको भवन निर्मार्ण के नियम बनाने हैं तो आपको भवन निर्माण का व्यावहारिक ज्ञान होना चाहिए | सामान्य अकुशल मजदूर भी तकनिकी विषयों के बारे में जज और वकीलों से अधिक जानता है जो केवल कला स्नातक होते हैं | (विश्लेषण में) ये देखना होता है कि किस प्रकार क़ानून बनाएँ कि दूसरा उसको तोड़ न सके | इसमें भी व्यावहारिक ज्ञान की आवश्यकता है जो आम आदमी के पास जज और वकील से अधिक है |

[3.] भ्रष्ट सांसद, विधायक, जज और वकील जानबूझकर क़ानून और फैसलों में कुछ कम उपयोग में आने वाले शब्दों और लंबे वाक्यों का प्रयोग करते हैं जिससे आम आदमी को समझने में कठिनाई हो | कोई भी क़ानून की पुस्तक लीजिए और उसको पड़ना शुरू करें, कम उपयोग में आने वाले शब्दों को आसान शब्दों से बदल दें , लंबे वाक्यों को छोटे वाक्यों में तोड़ दें | इस प्रकार कोई भी क़ानून यदि स्थानीय भाषा में होगा , तो एक अनपढ भी समझ सकता है (केवल बौधिक संपत्ति क़ानून को छोडकर) |

[4.] क़ानून का क़ानून-ड्राफ्ट बनाना केवल शब्दों में डालना है कि “ आप भारत सरकार से क्या चाहते हैं कि वो कोई दिए गए स्थिति में करे |”

[5.] प्रस्ताव उतने ही अच्छे या बुरे होते हैं जितने कि उनके क़ानून-ड्राफ्ट |

सरकार में लाखों कर्मचारी होते हैं | उन कर्मचारियों को किसी प्रस्ताव को लागू करने के लिए , निर्देश या क़ानून-ड्राफ्ट की आवश्यकता होती है | यदि उन्हें इतना ही कहें कि ` भ्रष्टाचार कम करो या गरीबी कम करो` तो प्रस्ताव या तो सही से लागू नहीं होगा या तो बिलकुल भी लागू नहीं होगा | प्रस्ताव अस्पष्ट होता है और क़ानून-ड्राफ्ट स्पष्ट होता है | बिना क़ानून-ड्राफ्ट के प्रस्ताव को लागू करना, ऐसा ही है जैसे बिना कोई डिजाईन/नक़्शे के इंजिनियर/मिस्त्री से घर बनवाना | इसीलिए क़ानून-ड्राफ्ट या प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करें |

[6] नागरिकों और सांसदों का कार्य

सांसदों का कार्य है कि-

1)  क़ानून-ड्राफ्ट को अध्यक्ष को देना |

2) अपनी हां/ना कहना जब अध्यक्ष उस क़ानून-ड्राफ्ट / मसौदे पर मतदान तय करे |

सांसद को 1) और 2) , नागरिकों की इच्छा के अनुसार करना होता है |

ये नागरिकों का कर्तव्य है कि क़ानून-ड्राफ्ट / मसौदा तैयार करें और सांसद को दें | जब तक कि नागरिकों ने कोई क़ानून-ड्राफ्ट नहीं दिया है, तब तक सांसदों को एक मांसपेशी भी नहीं हिलानी है (कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं )|

* 16)   आम नागरिक द्वारा राईट टू रिकाल / `भ्रष्ट को आम नागरिक का बदलने का अधिकारका उपयोग / दुरुपयोग करने पर आपत्ति –

कोई किसी को कभी मूर्ख बना सकता है , कोई हमेशा मूर्ख बना सकता है ,सभी को कभी-कभी मूर्ख बना सकते हैं लेकिन सभी को हमेशा मूर्ख नहीं बनाया जा सकता |

आम नागरिक उतने ही अच्छे या बुरे हैं जितने के उच्च या विशिष्ट वर्ग | जब निर्णय करोड़ों आम लोगों द्वारा लिया जाता है बजाय कि कुछ सुप्रीम कोर्ट या हाई-कोर्ट के जजों के , सांठ-गाँठ और रिश्वतखोरी नहीं हो सकती क्योंकि कोई भी कंपनी करोड़ों आम लोगों को रिश्वत नहीं दे सकती , लेकिन कम्पनियाँ कुछ मुट्ठी भर हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट के जजों को रिश्वत दे सकती है | इसीलिए प्रजा अधीन राजा (भ्रष्ट को आम नागरिक का बदलने का अधिकार) के क़ानून-ड्राफ्ट की भ्रष्टाचार से ग्रस्त / प्रभावित होने की कम संभावना है |

*17) गलत / त्रुटिपूर्ण और सही / वास्तविक भ्रष्टाचार का दृष्टिकोण-

गलत / त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण:

(1) एक उचित प्रणाली/सिस्टम मौजूद है जिसमें ईमानदार/न्यायसंगत लोग क़ानून बनाते हैं और क़ानून लागू करते हैं |

(2) इन ईमानदार क़ानून बनाने वालों/क़ानून-निर्माता (विधायक/सांसद आदि) के नीचे कुछ भ्रष्ट लोग हैं और कुछ ईमानदार लोग |

(3) यदि ये ईमानदार क़ानून-निर्माता भ्रष्ट लोगों को सज़ा दें तो वे सुधर जाएँगे |

सही / वास्तविक दृष्टिकोण :

(1) भ्रष्ट लोग सभी उच्च पद पर आसीन हैं | भ्रष्टाचार सत्ता और धन लाती है और सभी सत्ता के पद भ्रष्ट द्वारा कब्ज़ा किये हुए हैं सरकार,नौकरशाही,न्यायतंत्र और पुलिस में |

(2) सभी ईमानदार लोग भ्रष्ट लोगों के नीचे हैं और उनके नियंत्रण में हैं |

(3) क़ानून बनाने वाले भ्रष्ट हैं और कभी भी स्वतः /अपने आप क़ानून नहीं बनायेंगे भ्रष्ट को कड़ी सज़ा देने के लिए |

इसीलिए क़ानून बनाने वालों को मजबूर करना होगा जनसाधारण-समर्थक क़ानून बनाने के लिए जैसे `पारदर्शी शिकायत प्रणाली/सिस्टम`,राईट टू रिकाल/प्रजा अधीन राजा (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, जज, आदि; जूरी सिस्टम, `नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)`(चैप्टर 5 दखें), संपत्ति कर, आदि | इसके लिए हमें देश के सभी लोगों को इन जनसाधारण-समर्थक कानूनों के बारे में जानकारी देनी होगी |जब करोड़ों लोगों इन जन-हित के कानूनों की जानकारी होगी , तो वे उनकी मांग करेंगे और वो कुछ ही समय में आ जाएँगे |

* 18)  प्रजा अधीन राजा(राईट टू रिकाल) / `भ्रष्ट को बदलने नागरिक का अधिकार` अगले जन्म में !

केवल प्रजा अधीन राजा/भ्रष्ट को बदलने का क़ानून-ड्राफ्ट या पारदर्शी शिकायत प्रणाली के क़ानून-ड्राफ्ट का नाम ही `कार्यकर्ता` नेताओं को बेचैन कर देता है | वे इन का ना तो विरोध कर सकते हैं क्योंकि इससे उनकी कार्यकर्ताओं के सामने पोल खुल जायेगी कि वे आमजन विरोधी हैं | और यदि इसे समर्थन करते हैं तो उनके प्रायोजक धन देना बंद कर देंगे | इसीलिए वे ऊटपटांग कहकर `भ्रष्ट को निकालने/बदलने का अधिकार` को टालने का प्रयत्न करते हैं जैसे पहले हमें ये/वो करना चाहिए और इसको अगले जनम में लाना चाहिए | या इस अधिकार को देने के लिए संविधान में बदलाव चाहिए जिसके लिए बहुत समय चाहिए और इसीलिए ये अगले जन्म में आएगा | कोई एक-आध नेता ही इसका समर्थन करेंगे लेकिन अधिकतर नेता तो इसे टालते ही रहेंगे अगले जन्म के लिए लेकिन अधिकतर कार्यकर्ता इसका समर्थन करेंगे | इसीलिए हमें सीधे कार्यकर्ताओं से संपर्क करना चाहिए |

* 19) भारत के बुद्धिजीवी-विशिष्ट/उच्च वर्ग के एजेंट / प्रतिनिधि

भारत के बुद्धिजीवी जो समाचार पत्रों, पाठ्यपुस्तकों, आदि में लिखते हैं, अधिकतर  विशिष्ट/उच्च वर्ग के एजेंट/प्रतिनिधि हैं| और ये बुद्धिजीवियों ने सालों से इतना जहर भर दिया है शिक्षित युवा के दिमाग में पाठ्यपुस्तकों और समाचार पत्र लेख द्वारा कि एक औसत शिक्षित व्यक्ति अभी जनसाधारण-विरोधी है |और जितना अधिक शिक्षा व्यक्ति के पास है, उतनी अधिक संभावना है कि उसने समय लगाया हो पड़ने में जो ये कचरा बुद्धिजीवी लिखते हैं और उतनी अधिक संभावनाएं हैं कि वो जनसाधारण-विरोधी हो |

बुद्धिजीवी लिखते हैं कि भारत का आम नागरिक कम-मिजाज, सनकी, जातिवाद, सांप्रदायिक, बिना राष्ट्रिय चरित्र के हैं और उसके कोई नैतिक मूल्य नहीं हैं , एक चोर है , एक धूर्त है , एक यौन विकृत/भ्रष्ट व्यक्ति है आदि, आदि | और शिक्षित लोग इसको हर समय अपने ग्रन्थ और समाचार पत्र के लेखों में पड़ते हैं और जनसाधारण-विरोधी हो जाते हैं | शिक्षित व्यक्ति को क्या करना चाहिए— आम नागरिक का वो दोष बताना चाहिए जो जजों, बुद्धिजीवी,शिक्षित, पुलिस कर्मी, बाबू,मंत्री आदि में ना हो | सभी जज डबल स्नातक हैं और 95% जज भाई-भातिजेवाद से भरे हुए हैं | सभी भारतीय पोलिस सेवा (आई.पी.एस) काफी शिक्षित हैं और उनमें से 95% हर साल (भ्रष्टाचार द्वारा) एक करोड़ से अधिक बनाते हैं | इसके बावजूद “ आम नागरिक बुरा, विशिष्ट वर्ग अच्छा” के गान चलते रहते हैं |

अधिकतर प्रसिद्द बुद्धिजीवी विशिष्ट वर्ग/नेता के एजेंट/प्रतिनिधि हैं | इसी तरह वो प्रसिद्द बनते हैं – पहले वे किसी नेता/विशिष्टवर्ग के वफादार सेवक बनते हैं और फिर विशिष्ट वर्ग/नेता उनपर पैसे खर्च करते हैं और अपनी सत्ता का प्रयोग कर उन्हें प्रसिद्द बना देते हैं| अब विशिष्ट वर्ग के लोगों को लोकतान्त्रिक प्रक्रिया जैसे भ्रष्ट को बदलने/सज़ा देने का अधिकार आदि , नहीं चाहिए और इसीलिए उन्होंने अपने पालतू बुद्धिजीवियों को एक भय का वातावरण बनाने के लिए कहा है कि भ्रष्ट को निकालने/सज़ा देने का अधिकार देने से भारत का नाश हो जायेगा | ये भय कैसे पैदा किया जा सकता है विद्यार्थियों और पाठकों के मन में ?  सरल है — भारत के जनसाधारण को कोई हिंसक, सांप्रदायिक, जातिवाद,जंगली, मूर्ख प्रस्तुत करो | जिस कारण पाठ्यपुस्तक और समाचार पत्र के लेख लगातार/निरन्तर भारत के आम नागरिकों को नीचा दिखाते हैं और ये कभी नहीं बताते कि बाबू,पोलिस कर्मी ,जज, बुद्धिजीवी इससे कहीं अधिक बुरे हैं |

शिक्षा किसी व्यक्ति को नफरत नहीं करवाती — वास्तव में यदि किसी को ये जानकारी है कि कैसे भारतीय अदालतें, रिसर्व बैंक, पुलिस आदि काम करती है, तो उसे महसूस होगा कैसे विशिष्ट वर्ग, खनिज खानों के मालिक , पुलिस कर्मी, बाबू, जज, आदि जनसाधारण को लूटते हैं और उसे आम नागरिकों के लिए दया आएगी | तथाकथित निरक्षरता इसीलिए है क्योंकि बुद्धिजीवी आम नागरिकों को निरक्षर/अनपढ रखना चाहते हैं ताकि वे आसानी से दबाये और मारे जा सकें | इसीलिए बुद्धिजीवी उन प्रक्रियाएँ का विरोध करते हैं जिसके द्वारा हम आम नागरिक जिला शिक्षण अधिकारी को बदल सकते हैं या (ईमानदार अधिकारियों का ) बदल जाना रोक सकते हैं ,क्योंकि ऐसी प्रक्रिया एक ऐसा जिला शिक्षण अधिकारी लाएगा जो आम नागरिकों को शिक्षित करने में रूचि रखेगा |

* 20)  हर नागरिक नेता सहित अदालतों की परछाई / झलक है-

अदालत भ्रष्ट हैं ,इसीलिए सज़ा नहीं होती और इसीलीये हर कोई बुरा व्यवहार करता है | समाधान ये है कि

1. कोर्ट की संख्या बढानी चाहिए- दस गुना एक वर्ष में |

2. जूरी प्रणाली /सिस्टम को लागू करें (चैप्टर 21 देखें )|

3. जजों को नागरिक द्वारा बदलने की प्रक्रिया लागू करें|

इस प्रकार कोर्ट का सुधार होगा और अनुशाशन बढेगा |

* 21) इतिहास –

इतिहास की पुस्तकें तथाकथित इतिहासकारों द्वारा बनायीं गए हैं | और इतिहासकारों में एक ज्ञात दोष है जो सभी मनुष्यों में है : वे इतिहास का निर्माण सरकार या उन विशिष्ट वर्ग के लोगों के लिए करते हैं जो उनको प्रायोजन करते हैं | तो वे आसानी से उन पन्नों को निकाल देते हैं जो उनके प्रायाजकों के आर्थिक हित के अनुसार नहीं है|

ये दोष मीडिया वालों में भी है और हम ये दोष देख सकते हैं उनमें क्योंकि , हम देख सकते हैं कि जो वे सूचना दे रहे हैं वो जानबूझकर ढक्का हुआ,अधूरा सच है| और ये ही दोष इतिहासकारों में भी मौजूद है लेकिन हम इसे कभी-कभी ही देख सकते हैं क्योंकि हम इतिहास को अब नहीं देख सकते |
* 22)   भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई समाज के ऊपरी स्तर से हमेशा शुरू होनी चाहिए | ये रट कि केवल निचले स्तर पर ही ध्यान केंद्रित होना चाहिए, केवल शीर्ष के लोगों के लिए स्वर्ग बनाने के लिए ये रट किया जाता है | “ निचले स्तर पर भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करो” का मायना है कि पटवारी/तलाटी/लेखपाल, तहसीलदार आदि से लड़ना और बाबूओं, पुलिस कर्मी, मंत्रियों, सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के जजों को शांतिपूर्वक लूटने देना जितना लूटना चाहें|

मेरे विचार से हमें शीर्ष/सबसे उपरी स्तर पर धावा बोलना चाहिए | ये सामान्य ज्ञान है कि बाबू यदि भ्रष्ट होता है तो चपरासी के लिए रिश्वत लेना आसान हो जाता है |

और ज्ञान को छोडो, कभी-कभी तो ऊपर के लोग निचले स्टारों को पैसा जमा करने के लिए कहते हैं और उसका हिस्सा उन्हें देने के लिए कहते हैं| और ऊपर के लोग निचले और मध्य स्तर के लोगों को भर्ती करते समय लापरवाही से भाई-भातिजेवाद करता है जिससे सभी को भ्रष्ट होने का कारण मिल जाता है |

उदहारण, क्यों एक निचली अदालत के जज अपनी लालच को छोड़े जब उसे पता है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश `खरे` ने एक सजा पाया हुआ, बच्चों से यौनशोषण करने वाले धनी/पैसे वाला स्विस नागरिक को जमानत कर दे है ? और एक पुलिस इंस्पेक्टर रिश्वत क्यों नहीं ले जबकि उसे गृहमंत्री हर इंस्पेक्टर को उसे पैसे इकट्टा कर के देने का लक्ष्य देता है और उसका तबादला करने की धमकी देता है यदि उतना लक्ष्य पूरा नहीं हुआ तो !!

ये सब हो-हल्ला कि हमें केवल निचले स्तर पर लड़ना है और उपरी स्तर को छोड़ देना चाहिए ये सुनिश्चित/पक्का करता है कि बाबू ,जज और मंत्री और सभी सबसे ऊपर स्तर के लोग रिश्वत इकट्टा कर सकते हैं और आराम से सो सकते हैं जब हम पटवारियों और तहसीलदारों से लड़ने में व्यस्त हों |

.*23) कृपया सभी इंडिया अगेंस्ट कर्रप्शन और अन्य कार्यकर्ताओं से विनती है कि पारदर्शी शिकायत प्रणाली और प्रजा अधीन लोकपाल (भ्रष्ट लोकपाल को बदलने का नागरिक का अधिकार )के खंड प्रस्तावित जन लोकपाल बिल में जोड़ें ताकि लोकपाल लाखों लोगों कि शिकायत को नजरंदाज न कर सके और लोकपाल भ्रष्ट हो जाये तो उसे आम नागरिक बदल सके |

प्रस्तावित कलमें जो प्रस्तावित लोकपाल बिल में जोड़नी हैं

मैं निम्न सैक्शन लोकपाल क़ानून-ड्राफ्ट में डालने का प्रस्ताव करता हूँ –

1.सैक्शन-जनता की आवाज़
खंड 1 .कोई भी नागरिक यदि कलेक्टर के दफ्तर में आता है  यदि अपनी सूचना अधिकार का आवेदन अर्जी या भ्रष्टाचार  के खिलाफ फरियाद या कोई भी हलफनामा(एफिडेविट) कलेक्टर को देता है तो उसकी पहचान पत्र कि   जांच करके कोई भी दलील दिये बिना कलेक्टर (या उसके द्वारा नियुक्त कार्यकारी मेजिस्ट्रेट) उस हलफनामा(एफिडेविट) को प्रति पेज 20 रूपये  लेकर सीरियल नंबर दे कर लोकपाल  की वेबसाइट पर रखेगा |

खंड 2. (2.1) कोई भी नागरिक मतदाता अपनी हाँ/ना खंड न. 1 द्वारा दी गयी फ़रियाद पर दर्ज कर सकता है  रु .3 शुल्क दे कर पटवारी (तलाटी) के दफ्तर में अपना पहचान पत्र दिखा कर और पटवारी उसकी हाँ /ना लोकपाल के वेबसाइट पर नागरिक मतदाता के नाम और पहचान पत्र संख्या के साथ रखेगा |

(2.2) नागरिक अपने हाँ/ना को बदल भी सकता है पटवारी को रु. 3 की फी देकर  I
(2.3) `गरीबी के नीचे रेखा`(बी.पी.एल) कार्ड धारक के लिए यह फी/शुल्क रु 1. होगी I

 

ये सैक्शन सुनिश्चित करेगा कि यदि लोकपाल करोड़ों लोगों की शिकायत को नजरंदाज कर रहा है तो उसकी पोल खुल जायेगी और उसकी पोल खुल सकती है इसलिए वो करोडो की शिकायतें को नजरंदाज नहीं करेगा |

2.सैक्शन- प्रजा अधीन लोकपाल अध्यक्ष
खंड-1 (साधारण घोषणा)-नागरिक शब्द का तात्पर्य रेजिस्त्रिकृत वोटर होगा .

खंड-2 (कलेक्टर के लिए प्रक्रिया)- यदि भारत का कोई भी नागरिक,30 वर्ष से अधिक हो और  लोकपाल अध्यक्ष बनना चाहे और वो खुद या वकील के द्वारा  कलेक्टर को  हलफनामा/एफिडेविट देता है, तो कलेक्टर उसकी लोकपाल अध्यक्ष की उम्मीदवारी की अर्जी  ले लेगा शुल्क लेने के बाद जो सांसद के चुनाव के समान होगी और उसे लोकपाल की वेबसाइट पर रखेगा |

खंड-3.(पटवारी या उसके क्लर्क के लिए प्रक्रिया ) यदि नागरिक स्वयं पटवारी के दफ्तर आ कर, रु.3 शुल्क देकर , अधिकतर पांच व्यक्तियों का अनुमोदन/स्वीकृति करता है लोकपाल अध्यक्ष के पद के लिए तो पटवारी उसके अनुमोदन/स्वीकृति कंप्यूटर में डाल देगा और उसे उसके वोटर पहचान पत्र संख्या,तिथि/समय ,अनुमोदित व्यक्ति के नाम वाली रसीद देगा.गरीबी रेखा के नीचे लोगों के लिए शुल्क रु.1 होगा. यदि नागरिक अपने अनुमोदन/स्वीकृति रद्द करने आते हैं तो पटवारी बिना कोई शुल्क लिए एक या अधिक अनुमोदन/स्वीकृति रद्द करेगा|

खंड-4. (पटवारी या उसके क्लर्क के लिए प्रक्रिया)- पटवारी नागरिक के अनुमोदन/स्वीकृति लोकपाल के वेबसाइट पर रखेगा  नागरिक के वोटर पहचान पत्र संख्या सहित |

खंड-5.(लोकपाल सचिव के लिए प्रक्रिया)- हर महीने के पांचवी तारीख पर लोकपाल सचिव पिछले महीने के आखरी तारीख की  अनुमोदन/स्वीकृति संख्या प्रकाशित करेगा हर प्रत्याशी के लिए.

खंड-6.-(लोकपाल के लिए प्रक्रिया)- यदि किसी प्रत्याशी को 37 करोड़ नागरिक वोटर के अनुमोदन/स्वीकृति मिलते हैं तो लोकपाल अध्यक्ष पद त्याग सकता है और लोकपल सदस्यों को सर्वाधिक अनुमोदन/स्वीकृति वाले प्रत्याशी की नियुक्ति के लिए निर्देशित कर सकता है |

प्रजा अधीन लोकपाल अध्यक्ष की कलमें किसी लोकपाल को पद पर कायम रखने के लिए भी प्रयोग की जा सकती हैं यदि लोकपाल अध्यक्ष ईमानदार है और सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश उसे निकालता है |

ऐसी स्थिति में नागरिक अपने अनुमोदन/स्वीकृति रख सकेगा उस ईमानदार लोकपाल अध्यक्ष के लिए और उसे फिर से लोकपाल अध्यक्ष बनाएगा |

फिर से दोहराऊंगा यदि प्रजा अधीन लोकपाल अध्यक्ष स्वीकार करने के लिए बहुत अधिक है , तो हमें लोकपाल के किसी एक सदस्य को प्रजा अधीन बनाने के लिए सहमत हो जाना चाहिए जो `जनता का सदस्य लोकपाल` कहलायेगा |

*24) क्यों ये कहना ` एक नेता या संगठन के नीचे/नेतृत्व में एक हो जाओ ` देश के लोगों को बांटने वाला है और ये कहना की ` एक क़ानून-ड्राफ्ट / मसौदे / प्रक्रिया के नीचे/नेतृत्व में एक हो जाओ` देश के लोगों को आपस में जोड़ने वाला है ?

यदि कोई कहे `मेरे नेता/संस्था को समर्थन करो` , तो दूसरी नेता/संस्था के समर्थक को ऐसा लगेगा कि वो अपने नेता/संस्था के प्रति बेईमानी कर रहा है | इसीलिए हर एक नेता/संगठन का समर्थक ये ही प्रयास करेगा कि दूसरे लोग उसके नेता/संगठन को समर्थन करें | इसीलिए ये वाक्य `एक नेता/संगठन के नीचे एक हो जाओ` लोगों को बांटने वाला है | लेकिन यदि ये कहते हैं कि `इस क़ानून-ड्राफ्ट /मसौदे को समर्थन करो` तो किसी को भी अपने नेता/संगठन को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है और इसीलिए अपने नेता/संगठन के प्रति बेईमानी या इमानदारी का प्रश्न ही नहीं उठता है | इसीलिए क़ानून-ड्राफ्ट /प्रक्रिया ही हमारा नेता है | क़ानून-ड्राफ्ट को बदनाम करना या नुक्सान पहुंचाना संभव नहीं है , नेता/संगठन को नुक्सान पहुंचाना, दुश्मन के लिए संभव है | (अधिक जानकारी के लिए अध्याय 15 देखें )

*25) हम दान के खिलाफ हैं | आप के समय की आवश्यकता है प्रचार के लिए , दान की नहीं |

ज्यादा से ज्यादा, हम लोगों को ये जन-हित क़ानूनों के प्रचार के लिए अपने खुद का पैसा खर्च करने के लिए कहते हैं जैसे पर्चे बांटना, समाचार पत्र में प्रचार करना आदि , ताकि ये जन-हित के कानूनों की जानकारी  सारे देश वासियों को हो जाये | और फिर करोड़ों लोग इन जनहित के कानूनों की मांग करेंगे विशेषकर `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) और ये क़ानून आ जाएँगे | (अधिक जानकारी के लिए अध्याय 20 देखें )

*26) भारत के संविधान के भूमिका के अनुसार भारत के नागरीकों ने संविधान लिखा है और भारत के नागरिक सर्वोच्च / सबसे ऊंचे हैं | हम,भारत के 120 करोड़ नागरिक, मालिक हैं और जज, नेता, अफसर हम, भारत के नागरिकों के नौकर हैं |

इसीलिए संविधान और कानूनों का अर्थ , जो भारत के नागरिक लगाएंगे, वो ही आखरी होगा, ना की कोई वकील, जज , या नेता जो कानूनों का अर्थ लगते हैं | नौकर यदि सही से काम नहीं करे तो मालिक (भारत के नागरिक) को उन्हें नौकरी से निकालने का अधिकार होना चाहिए | (अधिक जानकारी के लिए अध्याय 2,21 देखें )

*27) हर साल 100 मामलों में फंसे पेशेवर मुजरिम के लिए 5-6 जजों के साथ सेटिंग बनाना और छूट जाना आसान है , क्रमरहित तरीके(बिना लाइन के) से चुने गए 2000 जूरी के सदस्यों ,यदि जज के बदले यदि फैसला दें, के साथ सेटिंग/सांठ-गाँठ बनाना संभव नहीं है जिससे मुजरिम को सज़ा हो जायेगी |

मान लीजिए एक पेशेवर मुजरिम है , जिसके खिलाफ हर साल 100 मामले दर्ज होते हैं| वे सौ मामले 5-6 जजों के पास जाते हैं | अब मुजरिम का संपर्क इन 5-6 जज के रिश्तेदार या जान पहचान के वकीलों से होता है जिनके द्वारा वे जज को रिश्वत दे सकते हैं| जज पैसे छूते भी नहीं, केवल उनके  रिश्तेदार वकील रिश्वत  `सलाह लेने  की फीस` के रूप में दिया जाता है या और जज को सस्ते दाम पर भूमि या बाहर के देश के खाते में पैसा जमा कर दिया जाता है | इस तरह 5-6 जजों के साथ पेशेवर मुजरिम के लिए सेटिंग /सांठ-गाँठ बनाना आसान है |

लेकिन यदि ये ही 100 मामलों का फैसला यदि क्रमरहित तरीके से चुने गए 2000 लोग करें , हर मामले में 15-20 जूरी सदस्य फैसला दें और हर मामले में नए 15-20 लोग फैसला दें और क्योंकि ये 15-20 लोगों के पास एक ही मामला है, इसीलिए फैसला 7-10 दिनों में आ जायेगा | ऐसे में पेशेवर मुजरिम के लिए इन 2000 लोगों के साथ सेटिंग/सांठ-गाँठ बनाना संभव नहीं है  और इसीलिए मुजरिम को सजा हो जायेगी यदि जूरी सिस्टम लागू हो जाये |जूरी सिस्टम की अधिक जानकारी के लिए अध्याय 21 में देखें |

*28) जजों में भाई-भतीजावाद / परस्पर(आपसी) भाई-भातिजेवाद और भ्रष्टाचार

जजों की चुनाव में अधिकतर साक्षात्कार/इंटरवीयू ही होने से जजों में खूब भाई-भतीजावाद होता है| उनके रिश्तेदार ही चुने जाते हैं | परस्पर(आपसी) भाई-भातिजेवाद भी होता है ,जिसमें जज एक दूसरे के रिश्तेदारों को नौकरी पर रखते हैं | इस के समाधान के लिए पहले तो सुप्रीम कोर्ट और हाई-कोर्ट के प्रधान जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार आम नागरिकों को होना चाहिए| और दूसरे देशों की तरह, प्रस्तावित जजों के नाम सार्वजनिक, इन्टरनेट पर, नौकरी पर रखे जाने से तीन-चार महीने पहले ही सार्वजनिक कर दिए जाते हैं , ताकि यदि कोई आपत्ति करना चाहें तो कर सकता है |

जजों की सारी संपत्ति उन ट्रस्टों में होती है जिसमें वे या उनके रिश्तेदार सदस्य हैं | इसीलिए,जजों के ट्रस्ट और उनके रिश्तेदारों के ट्रस्ट, जिसमें वो सदस्य हैं , की संपत्ति सार्वजनिक होनी चाहिए और हर साल इन्टरनेट पर राखी जानी चाहिए |

*29)     महंगाई का असली कारण क्या है ?

सामान्य तौर पर महंगाई तभी बढती है जब रुपये (एम 3) बनाये जाते हैं लोन,आदि के रूप में और भ्रष्ट अमीरों को दिए जाते हैं, जिससे प्रति नागरिक रुपये की मात्रा बढ जाती है और रुपये की कीमत घाट जाती है और दूसरे चीजों की कीमत बढ जाती है जैसे खाद्य पदार्थ/खाना-पीना, तेल आदि | भारतीय रिसर्व बैंक के आंकडो के अनुसार, प्रति नागरिक रुपये की मात्रा (देश में चलन में कुल नोट,सिक्कों और सभी प्रकार के जमा राशि का कुल जोड़ को कुल नागरिकों की संख्या से भाग किया गया ) 1951 में 65 रुपये प्रति नागरिक थी और आज, 2011 में लगभग 50,000 रुपये है प्रति नागरिक |

सब चीजों का मूल्य सापेक्ष/तुलनात्मक है और मांग और आपूर्ति/सप्लाई के अनुसार निर्धारित/पक्का होता है | मान लो , केवल एक बाजार है और कुछ नहीं ,आसानी से समझने के लिए | बाजार में , एक बेचनेवाला है जो 10 किलो आलू बेच रहा और एक खरीदार जिसके पास सौ रुपये हैं | मान लो अगली स्थिति में, बेचनेवाले के पास 10 किलो आलू के बजाय 20 किलो आलू हो जाते हैं, तो क्या अब आल का दाम घटेगा कि बढेगा ?

आसान सा अनुमान / अंदाजा – आलू का दाम घटेगा क्योंकि आलू की सप्लाई / आपूर्ति बढ गयी है |

एक और स्थिति में , मान लो बेचने वाले के पास 10 किलो आलू हैं लेकिन अब दो खरीदार हैं और दोनों के पास 100-100 रुपये हैं | अब, आलू का दाम घटेगा या बढेगा ?

आसान सा अंदाजा / अनुमान- आलू का दाम बढेगा क्योंकि रुपयों की सप्लाई बढ गयी है और इसीलिए रुपये की कीमत घटेगी और दूसरे सामान का दाम बढेगा जैसे खाना-पीना, पेट्रोल, गैस, आदि |

असलियत में भी ऐसे ही होता है |

प्रश्न- ये रुपये कौन बनाता है और ये रूपये कहाँ से आते हैं(रुपये=एम3 देश में सभी नोट,सिक्के और सभी प्रकार के जमा राशि का जोड़ है ) ?

रिसर्व बैंक के पास लाइसेंस है रुपयों को बनाने का और अनुसूचित बैंक(बैंक जिनको रिसर्व बैंक ने लाइसेंस दिया है रुपयों को बनाने का जमा राशि के रूप में ) के पास भी | कोई स्वर्णमान (गोल्ड स्टैण्डर्ड) अभी नहीं है (कि जितना सोना है , उतना ही पैसा बना सकते हैं) , क्योंकि वो कई दशक पहले पूरी दुनिया में रद्द हो गया है | रिसर्व बैंक गवर्नर/राज्यपाल रुपयों को सरकार के कहने पर बनाता है |

केवल रिसर्व-बैंक ही नोट छाप सकती और सिक्के बना सकती है लेकिन अनुसूचित बैंक जैसे स्टेट बैंक, आई.सी.आई.सी.आई., आदि, भी रुपये (एम 3) बना सकते हैं जमा राशि के रूप में | ये रुपयों की सप्लाई/आपूर्ति में बढने से रुपयों का मूल्य/दम कम हो जाता है और ये दूसरे सामान का दाम बड़ा देता है जैसे  खाना-पीना , तेल के दाम,आदि  और सामान्य महंगाई का मुख्य कारण है |

 

प्रश्न- रिसर्व-बैंक और अनुसूचित बैंक रुपये क्यों बनाते हैं ?

वे ऐसा अमिर,भ्रष्ट लोगों के लिए करते हैं | मुझे एक उदाहरण देने दीजिए | मान लीजिए एक अमीर कंपनी है, जिसके रिसर्व बैंक-गवर्नर(राज्यपाल), वित्त मंत्री के साथ सांठ-गाँठ है | वे एक सरकारी बैंक से 1000 करोड़ रुपयों का कर्ज लेते हैं और वापस 200 करोड़ रुपये चूका देते हैं | और क्योंकि उनके सांठ-गाँठ है, वे रिसर्व-गवर्नर, वित्त मंत्री आदि को बोलेंगे कि वे उनको हिस्सा/रिश्वत देंगे और बदले में उनको उनकी कंपनी को दिवालिया/`डूब गयी` घोषित करने दिया जाये |

फिर कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है | अभी, यदि बैंक ये 800 करोड़ का घाटा लोगों को घोषित कर देता है , तब बैंक भी दिवालिया हो जायेगा और बैंक के ग्राहक को भी अपनी जमा राशि खोनी पड़ेगी और ग्राहक, जो आम नागरिक-मतदाता हैं शोर करेंगे और सरकार को जनता का गुस्सा झेलना पड़ेगा | इस स्थिति से बचने के लिए, सरकार रिसर्व बैंक-गवर्नर/अनुसूचित बैंकों को 800 करोड़ रुपये बनाने के लिए कहती है | ये ज्यादा रुपयों की सप्लाई , जब बाजार में आ जाती है, तो रूपए की कीमत घट जाती है और सामान की कीमत बढ जाती है, यानी महंगाई हो जाती है |

 

प्रश्न-महंगाई व्यापारियों द्वारा सामान की जमाखोरी से या निर्यात/`देश से बाहर भेजना` से होती है क्योंकि इससे सामान की कमी होती है या सत्ता बाजार या कम पैदावार से भी महंगाई हो सकती है |

क्या तेल-पेट्रोल की कीमतें बढ़ने से महंगाई बढती है ?

ये सभी स्थानीय कारण हैं और ये सामान्य, व्यापक स्तर कीमतें नहीं बढाते हैं| सामान की जमाखोरी से सामान की कमी आती है लेकिन कोई भी हमेशा के लिए सामान को जमा नहीं कर सकता और बाजार में सामान को छोड़ने पर , कीमतें कम होंगी और सामान्य कीमतों के बढने में कीमतें केवल एक ही दिशा में, ऊपर की ओर जाती हैं और कीमतें एक बार जब बढ जाती हैं तो कभी भी गिरती नहीं हैं |

ऐसे ही कीमतों का उतार-चदाव का रुख/झुकाव देखा जा सकता है, खाने-पीनी की चीजों और दूसरे सामानों के सट्टे में |

और सभी चीजों देश से बाहर नहीं भेजी जाती, इसीलिए सामान का देश से बाहर भेजना कीमतों की ऊपर की ओर सामान्य झुकाव के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकता |

तेल की कीमतों का और माल की ढुलाई की कीमत कीसी भी वास्तु/चीज के दाम का 2-5% से अधिक हिस्सा नहीं होता| इसीलिए तेल के दाम बढ़ने से चीजों के दाम यानी महंगाई नहीं होती | और तेल के दाम भी कुल रुपयों की मात्रा (एम 3) बढ़ने के कारण ही होते हैं |

 

प्रश्न- ये कीमतों का बढ़ना=महंगाई सभी नागरिक, गरीब और अमीर,सांठ-गाँठ के साथ और बिना कोई सांठ-गाँठ के , दोनों को एक समान असर करती है ?

नहीं | जो लोग गरीब हैं, बिना किसी सांठ-गाँठ/संपर्क के , वे और गरीब हो जाते हैं जब सामान के दाम बढ जाते हैं | और अमीर, विशिष्ट वर्ग के लोग सरकार के साथ मिली-भगत बना लेते हैं और रुपयों को बनवा लेते हैं मुफ्त में !! इस तरह, अमिर, सांठ-गाँठ/संपर्क वाले लोग गरीब, बिना कोई राजनैतिक या ऊच संपर्क के, आम लोगों को लूट रहे हैं !!

(अधिक जानकारी के लिए अध्याय 23 देखें )

*30)  सारे हथियार बाहर देशों से आने से हमारी सेना कमजोर हो गयी है और यदि शत्रु देश-चीन, पाकिस्तान, अमेरिका आदि हमला कर दें तो देश गुलाम हो जायेगा क्योंकि बाहर से लाये गए हथियार कभी भी शत्रु देश नष्ट कर सकता है उसमें छुपी `रेडियो चिप` द्वारा | सेना को मजबूत बनने के लिए हमें सभी रक्षा के लिए हथियार देश में ही बनाना होगा | भ्रष्ट प्रधानमंत्रियों ने ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं की है जिससे ये हो सके  | इसके लिए राईट टू रिकाल-प्रधानमन्त्री (भ्रष्ट प्रधानमंत्री को बदलने का नागरिक का अधिकार) | और हमें उद्योगों को बढावा देने के लिए कानून लाने होंगे जैसे `सेना के लिए संपत्ति कर`,300% सीमा शुल्क | (अधिक जानकारी के लिए अध्याय 24,26 देखें)

इसके अलावा , नागरिकों को हथियार रखने और बनने के लिए लाइसेंस मुक्त कर देना चाहिए ताकि यदि सेना दुश्मन देश से हार जाती है, तो भी यदि नागरिकों के पास हथियार हों तो दुश्मन देश के भीतर नहीं आ सकेगा |

जिन देशों में ज्यादातर नागरिकों के पास हथियार हैं, वहाँ अपराध और अपराधी कम होते हैं,क्योंकि अपराधी को तो कैसे भी हथियार प्राप्त हो जाते हैं लेकिन नागरिकों को भी हथियार मिलने से अपराधी लूट नहीं सकते और अपराध कम हो जाता है |

उन देशों में जहाँ ज्यादातर नागरिकों के पास हथियार हैं, वहाँ के अधिकारी, नेता  नागरिकों को लूट नहीं सकते क्योंकि वो हथियारों से लैस ,आम नागरिक से डरते हैं और इसी लिए भ्रष्टाचार भी कम होता है | जिन देशों में ज्यादातर नागरिकों के पास हथियार हैं और हथियार बनने की छूट है , उन देशों में असली में लोकतंत्र, यानी जनता का राज होता है |  ( अधिक जानकारी के लिए अध्याय 29 देखें )

*31) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)`-

मान लीजिए आप के पास एक किराये का मकान है और आप ने उसको किराये पर दिया है, तो फिर किराया किसको जाना चाहिए, आपको या सरकार को ? आप कहेंगे कि आप को जाना चाहिए | ऐसे ही आप को यदि पूछें कि यदि एक मकान जिसके दस बराबर के मालिक हैं , किराये पर दिया है, तो किराया किसको जाना चाहिए ? आप कहेंगे कि दस मालिकों को बराबर-बराबर किराया जाना चाहिए | इसी तरह यदि कोई बहुत बड़ा प्लाट हो , जिसके 120 करोड़ मालिक हैं ,यानी पूरा देश मालिक है और वो किराये पर दिया है ,तो उसका किराया पुरे देश वासियों ,120 करोड़ लोगों में बराबर-बराबर बटना चाहिए | ऐसे प्लाट हैं जिसके 120 करोड़ मालिक हैं? जी हाँ , आई आई एम ए प्‍लॉट, जे एन यू प्‍लॉट, सभी यू जी सी प्‍लॉट, अहमदाबाद एयरपोर्ट प्‍लॉट, सभी एयरपोर्टों के प्‍लॉट और हजारों ऐसे भारत सरकार के प्‍लॉटों से मिलने वाला जमीन का किराया और भारत के सभी खनिजों, कोयला और कच्‍चे तेल से मिलने वाली सारी रॉयल्‍टी हम भारत के नागरिकों और हमारी सेनाओं को जानी चाहिए किसी और को नहीं। और यह रॉयल्‍टी व किराया सीधे ही मिलना चाहिए किसी योजना या स्‍कीम के जरिए नहीं। एक तिहाई हिस्सा सेना को जाना चाहिए देश की रक्षा के लिए और बाकी दो तिहाई नागरिकों को बराबर-बराबर बटना चाहिए | एक अनुमान से यदि ऐसा होता है तो हर एक नागरिक को लगबग 400-500 रुपये महीना मिलेगा  जिससे देश की गरीबी कम हो जायेगी| (अधिक जानकारी के लिए अध्याय 5 देखें )

* 32) टैक्स / कर के द्वारा गरीब, आम नागरिक कैसे लुटता है ?

हमारे देश में अमिर और गरीब दोनों टैक्स/कर देते हैं |

सभी खाद्य पदार्थ और अन्य सामान जैसे चाय, रेल टिकेट और अन्य टिकेट पर जो टैक्स/`कर` लगता है, उससे गरीब को अपने आमदनी के अनुसार ज्यादा प्रतिशत कर देना पड़ता है जिसे प्रतिगामी कर कहते हैं | मान लें कि एक गरीब, जिसकी रोज की दस रुपये आमदनी है, दो रुपये की एक चाय रोज पीता है | उस चाय पर मान लीजिए कि 50 पैसे टैक्स/कर है | इस का मतलब उसके 5% आमदनी चाय के टैक्स/कर में जाती है | और एक अमिर आदमी, जिसकी रोज की आमदनी 100 रुपये है, वो दस चाय के कप नहीं पी सकता ; मान लीजिए वो दो चाय पीता है, तो एक रुपये चाय का कर देता है रोज. जो उसकी आमदनी का 1% है | इस प्रकार गरीब आदमी अपनी आमदनी का ज्यादा प्रतिशत कर देता है |

सरकार ऐसे ही टैक्स /कर लगाती है जो गरीबों के लिए ज्यादा और अमीरों के लिए कम होते हैं क्योंकि सरकार की भ्रष्ट अमिर लोगों के साथ सांठ-गाँठ/मिली-भगत है |

इसका समाधान है की ऐसे टैक्स/कर लगाये जाएँ जो आमदनी के प्रतिशत के अनुसार `समान`हैं . यानी `सामान कर` जैसे संपत्ति कर(टैक्स) , जो 25 वर्ग मीटर से अधिक भूमि पर 1 % पर देना होगा | संपत्ति कर की चोरी करना संभव नहीं है और ये और `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)` जमीनों के दाम घटाएगा, उद्योग को बढावा देगा रोजगार बढाएगा और गरीबी घटाएगा | इसका उपयोग सेना के लिए हथियार और  कोर्ट बनने के लिए उपयोग होना चाहिए, जिससे सेना मजबूत होगी, देश सुरक्षित रहेगा और कोर्ट और जजों की संख्या बढने से जल्दी न्याय मिलेगा |  संपत्ति कर और आयकर की चोरी रोकने के उपाय की अधिक जानकारी के लिए अध्याय 25 देखें |

33)  एक और चीज जो `प्रजा अधीन-रजा` के विरोधी बोलते हैं कि ` हमें क्यों सेना को मजबूत बनाने के लिए पैसे देना चाहिए टैक्स के रूप में , जैसे `विरासत टैक्स`, सीमा-शुल्क , `संपत्ति टैक्स` आदि ? वे अपने बारे में अधिक सोचते हैं, बजाय कि देश के |

अरे, यदि वे ये सब टैक्स नहीं देंगे , तो देश की सेना, पोलिस और कोर्ट देश की सुरक्षा नहीं कर पाएंगी , विदेशी कंपनियों और देशों को हमें गुलाम बनाने से , और सबसे पहले तो पैसे-वाले ही लूटे जाएँगे , और देश का 99% धन लूट लिया जायेगा |

और यदि कोई अपना धन-संपत्ति खुद सुरक्षा करने की कोशिश करता है , तो उसको कहीं ज्यादा खर्च करना होगा , मिलकर धन (सामूहिक धन-संपत्ति) की सुरक्षा करने पर जो खर्च होगा, उसकी तुलना में  |

इसीलिए दोनों, आर्थिक(पैसे ) के नजरिये से और अच्छे-बुरे(नैतिक) के नजरिये से , ज्यादा पैसे-संपत्ति वालों को ज्यादा टैक्स देना चाहिए , कम पैसे और संपत्ति वालों कि तुलना में |

*34)  बहुमत के अनुमोदन / स्वीकृति द्वारा सच्‍चाई सीरम (सच बुलवाने वाली औषधि) जांच करना(नारको जांच बहुमत के अनुमोदन / स्वीकृति द्वारा)

ये नार्को जांच उन व्यक्तियों पर होगी जिसके लिए 51% जनता अपना अनुमोदन/स्वीकृति देगी |

भ्रष्ट सुप्रीम-कोर्ट के जजों ने ये राय दी है की नारको जांच/सच्चाई सीरम जांच “असंवैधानिक” है  क्योंकि उनको डर है कि मुजरिम उन जजों के नाम और उनको दिए गए रिश्वतों की पोल न खोल दें |हमें पहले इन जजों का सार्वजनिक/सारी जनता के सामने नारको जांच करवानी चाहिए | नारको जांच भारत के संविधान की किसी भी खंड का उलंघन नहीं करता है |

नार्को एक प्रमाण नहीं है, लेकिन ये महत्वपूर्ण सुराग दे सकता है , उदहारण से –नार्को जांच में, कोई व्यक्ति ये कह सकता है “ मेरे पास एक बैंक का लाकर है मेरे भतीजे के नाम `कखग` स्थान पर “ और ये एक महत्वपूर्ण सुराग दे सकता है | अभी नारको जांच के विशेषज्ञ एक विस्तृत दल/पैनल से चुना जायेगा आखरी समय में, इसी लिए सांठ-गाँठ/मिली-भगत होना संभव नहीं है अधिकतर मामलों में | नार्को जांच का भय ही अपने आपस से लोगों को अपराध करने से रोकेगा | और नारको जांच का भय भ्रष्ट लोगों के आपसी सहयोग को रोकेगा | इसको विस्तार से/ पूरा बताने दीजिए |

मान लीजिए कोई भ्रष्टाचार को 10 लोगों का समर्थन चाहिए — दो मंत्री, 4 भारतीय प्रशासनिक सेवा(आई.ऐ.एस) के लोग, 4 जज | फिर , हर एक चिंतित होगा कि यदि कल को , उनमें से कोई की नार्को जांच होती है, उसका नाम भी सामने आ जायेगा | अधिकतर बड़े सौदों में कई अधिकारीयों, मंत्रियों, जजों की आवश्यकता होती है और ये सौदों में कमी आएगी, दूसरे व्यक्ति/सहयोगी के नार्को जांच के भय से |

नार्को जांच का प्रस्ताव `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) और प्रजा अधीन रजा/राईट टू रिकाल(भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) आने के बाद आयेगा क्योंकि इन प्रक्रियाओं के बिना , नारको जांच का कोई फायदा नहीं है क्योंकि तब ये केवल ऊपर के लोगों को ही मदद करेगा | (अधिक जानकारी के लिए अध्याय 27 देखें )

*35) अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति और अन्‍य पिछड़े वर्ग के गरीब लोगों के समर्थन से आरक्षण कम करना ,आर्थिक-चुनाव द्वारा, दलितों के हाँ द्वारा-

गाँव में सरपंच का बेटा आगे आकार आरक्षण का लाभ उठाता है और आर्थिक तंगी एवं निरक्षरता /अनपढ़ होने के कारण बाकी गांववालों को कुछ नहीं मिलता , यह स्वतंत्रा के बाद हर पीड़ी में होता आया है | उस सरपंच के बेटे को लाभ मिलने से ज्यादा अगर बाकी गांववालों को 600 रुपया मिल जाये तो कल को वो अपने बच्चों को स्कुल में भेजना भी शुरू कर सकते हैं |  उन्हें आरक्षण नहीं आर्थिक सहायता की जरुरत है|

क्योंकि 80 प्रतिशत से अधिक गरीब अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग 12 वीं कक्षा तक भी पास नहीं कर पाते और इस प्रकार उनके लिए आरक्षण का कोई अर्थ नहीं है। पांच सदस्यों के एक परिवार को हर वर्ष 3000 रूपए मिलेंगे यदि वह परिवार आर्थिक-चुनाव के तरीके को स्वीकार करता है और इसमें उसका कुछ नुकसान नहीं होगा। 80 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्‍य पिछड़े वर्ग के लोगों द्वारा आर्थिक-विकल्प/चुनाव चुनने के साथ ही – आरक्षण कोटा घटकर 10  प्रतिशत से भी कम रह जाएगा। अब योग्यता सूची/मेरिट लिस्‍ट में वैसे भी 10 प्रतिशत ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्‍य पिछड़े वर्ग के लोग तो रहते ही हैं । इसलिए प्रभावी/लगाया जाने वाला आरक्षण घटकर न के बराबर रह जाएगा। इसलिए यदि एक बार `जनता की आवाज- पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` पर हस्ताक्षर हो जाए और यदि आर्थिक-चुनाव/विकल्प की मांग करने वाला एफिडेविट जमा हो जाए तो 80 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्‍य पिछड़े वर्ग के लोग हां दर्ज करवा देंगे। (अधिक जानकारी के लिए अध्याय 8, 36 देखें)

 

*36) कैसे विदेशियों द्वारा हमारी पढ़ाई / शिक्षा कमजोर की जा रही है –

गुजरात, जहाँ पर नरेन्द्र मोदी मुख्य-मंत्री है , में जो गणित और विज्ञान के परीक्षाएं बनाई गयीं कक्षा 12 के लिए , उसमें हर एक प्रश्न सीधे पाठ्य-पुस्तक में से था !! यहाँ तक की उसमें नंबर भी नहीं बदले | यदि पाठ्य-पुस्तक में लिखा था कि `ट्रेन 70 किलोमीटर प्रति घटा से जा रही है` , तो परीक्षा के पेपर में भी ये ही लिखा था रफ़्तार-70 किलोमीटर प्रति घंटा !! वैसे तो बिका हुआ मीडिया ये बताता है कि नरेंद्र मोदी पूरी तरह समर्पित है  गणित की पढ़ाई को गुजरात में सुधारने के लिए , लेकिन जब हम को ज्यादा जानकारी मिलती हैं जैसे परीक्षा के पेपर, तो हम को कुछ और ही पता चलता है |

इसीलिए हमें `प्रजा अधीन-मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री` चाहिए ताकि मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री विदेशियों के हाथ न बिक सकें और देश की शिक्षा को बरबाद न कर सकें |

इसके अलावा, आज सरकारी स्चूलों में हालत बहुत बुरी है , बच्चों के पढ़ने के लिए पर्याप्त साधन नहीं होते, मास्टरों को पूरा वेतन ना मिलना, मास्टर ठीक से ना पढाना या स्कूल से गायब रहना , आदि समस्याएं हैं |

इसका मुख्य कारण जिला शिक्षा अधिकारी का भ्रष्टाचार है | इसके लिए हमें `प्रजा अधीन-जिला शिक्षा अधिकारी`(भ्रष्ट जिला शिक्षा अधिकारी को छात्रों के माता-पिता द्वारा निकालने का अधिकार) और `सत्या सिस्टम` (जिसमें इनाम दिए जाते हैं शिक्षक और छात्र को , योग्यता के आधार पर , और कोई वेतन नहीं मिलता शिक्षक को) | (अधिक जानकारी के लिए अध्याय 30 देखें )

 

*37) ‘तुरंत निर्णायक मतदान(आई. आर. वी.)’ / अधिक पसंद अनुसार मतदान के लाभ

‘तुरंत निर्णायक मतदान (आई. आर. वी.)’ पर क्‍लोन प्रभाव का कोई असर/प्रभाव नहीं है और इसलिए ‘तुरंत निर्णायक मतदान (आई. आर. वी.)’ में फर्जी उम्‍मीदवार खड़े नहीं किए जा सकते हैं। इसलिए हमारे विरोधी ऐसे उम्‍मीदवार को प्रायोजित करने वाले हमारा समय बरबाद नहीं कर पाएंगे। साथ ही, ‘तुरंत निर्णायक मतदान (आई. आर. वी.)’ मतदाता को अच्छे उम्‍मीदवार को वोट देने में समर्थ/सक्षम बनाता है। इस प्रक्रिया/तरीके द्वारा चुनाव न जीतने की अधिक सम्भावना लगने वाले उम्मीदवार ,लेकिन सबसे अच्‍छे उम्‍मीदवार को पहली पसंद/प्राथमिकता दी जा सकती है। और तब जीतने की अधिक संभावना लगने वाले उम्‍मीदवार को चौथी या अन्य पसंद/प्राथमिकता/स्‍थान पर वोट दिया जा सकता है।

इस प्रकार मतदाता सुरक्षित महसूस करते हैं। और चुनाव न जीतने की अधिक संभावना लगने वाले, सबसे अच्छा उम्‍मीदवार सबकी नजर में आकर महत्‍वपूर्ण हो जाता है। और` न जीतने की अधिक संभावना लगने वाले उम्‍मीदवार भी वास्‍तव में जीत सकता है !! ‘तुरंत निर्णायक मतदान(आई. आर. वी.)’ का एक और महत्‍वपूर्ण, अच्छी बात यह है कि नए उम्‍मीदवार की मीडिया मालिकों पर आसरा/निर्भरता कम होती है। और चुनाव के परिणाम को असर/प्रभावित करने में मीडिया मालिकों की ताकत भी कम हो जाती है। इसलिए ‘तुरंत निर्णायक मतदान(आई. आर. वी.)’ चुनाव की मीडिया मालिकों पर आसरा/निर्भरता कम कर देता है |

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