अध्याय 15


 प्रिय कार्यकर्ता, क्‍या आपकी कार्रवाई पर्याप्‍त और क्‍लोन पॉजिटिव है?

(15.1) यह कैसा प्रश्‍न है ? और यह क्‍लोन पॉजीटिव होना क्‍या बला है?

भारत में स्‍वार्थ-रहित कार्यकर्ता बुरी तरह असफल हो रहे हैं। वर्षों के प्रयास के बावजूद खाद्य-गरीबी(स्वस्थ, सस्ता, भोजन प्राप्त करने में असमर्थता) में कोई कमी दिखाई नहीं पड़ रही है। पुलिस/न्‍यायालय में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ता ही जा रहा है। पश्‍चिमी देशों में कार्यकर्ता अपने देशों में गरीबी और भ्रष्‍टाचार कम करने में सफल रहे हैं जबकि हम असफल होते रहे हैं। क्‍यों? स्‍वार्थ-रहित कार्यकर्ता इसलिए नहीं असफल हो रहे हैं कि उनकी संख्‍या कम है बल्‍कि भारत में सभी स्‍वार्थ-रहित कार्यकर्तागण अपर्याप्‍त और क्‍लोन निगेटिव  कार्यों में लगे हैं । इसलिए “अपर्याप्‍त” कार्य क्‍या है? और यह क्‍लोन पाजिटिव होना और क्‍लोन निगेटिव होना क्‍या होता है?

(15.2) इस पाठ का उद्देश्‍य / प्रयोजन

इस पाठ और इससे अगले पाठ में कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत की गई है। इस पाठ और इससे अगले पाठ में मैं यह दिखलाने का प्रयास करूंगा कि कैसे मेरा प्रस्‍ताव (यह कि कार्यकर्ताओं को नागरिकों से कहना चाहिए कि वे प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्रियों, महापौरों पर `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) कानून पारित करने के लिए दबाव डालें), अधिकांश अन्‍य दूसरे तरीकों से, जिसका प्रस्‍ताव अन्‍य कार्यकर्ता नेता कर रहे हैं, कम महंगा और ज्यादा प्रभावशाली है। लेकिन मेरा उद्देश्‍य यह नहीं है कि मैं दूसरे संगठनों के कार्यकर्ताओं से कहूं कि वे अपना संगठन छोड़कर मेरे संगठन में आ जाए। मेरा प्रयोजन कार्यकर्ताओं को इस बात के लिए राजी करना है कि वे अपने नेताओं से कहें कि वे (नेता) अपने समूह के ऐजेंडे में `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम), प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) आदि को शामिल कर लें । मेरे विचार से, यह भारत में `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम), प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) लाने में ज्‍यादा तेज तरीका है और कार्यकर्ताओं से `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम), प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) को अपने संगठन के एजेंडे में शामिल करने के लिए कहना क्‍लोन पाजिटिव है।

(15.3) सबसे महत्‍वपूर्ण खतरा जिसका सामना भारतीय कर रहे हैं – और अधिकांश सक्रियवादी नेता इसकी अनदेखी कर रहे हैं

यदि मैं पांच सबसे बड़े और महत्‍वपूर्ण खतरे के बारे में पूछूं जिनका सामना आज भारत कर रहा है तो कोई व्‍यक्‍ति इस्लामी आतंकवाद अथवा नक्‍सलवाद अथवा गरीबी अथवा भ्रष्‍टाचार अथवा शिक्षा की गिरती हालत आदि को बताएगा। ये खतरे वास्‍तव में पहले पांच खतरों की सूची में रखे जाने लायक हैं, इनमें कुछ व्यक्तिगत धारणा हो सकती है। लेकिन ज्‍यादातर नागरिक उस सबसे बड़े खतरे की अनदेखी कर रहे हैं जिसका सामना आज भारत कर रहा है। यह है भारतीय सेना का कमजोर होते जाना। और तब इसका परिणाम होगा भारत का इराकीकरण और लिबरेशन ऑफ इंडिया अर्थात  पश्‍चिमी देशों द्वारा भारत को फिर से गुलाम बनाया जाना।

अधिकांश भारतीय समाचारपत्र मालिकों,टेलिविजन चैनल मालिकों और प्रमुख/प्रसिद्द  बुद्धिजीवियों के बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों से आर्थिक सम्बन्ध हैं । और वे इस बात पर सहमत हो गए हैं कि – भारतीय सेना दिनों-दिन कमजोर होती जा रही है – इस समस्‍या को उजागर नहीं करेंगे। लेकिन, भारतीय सेना आज इतनी कमजोर है कि पश्‍चिमी देश /चीन जिस दिन भारत पर आक्रमण करने का निर्णय कर लें उस दिन भारत को नाश/तहस-नहस कर सकते हैं और अब हमलोगों के पास केवल कुछ ही वर्ष बचे हैं जिसके बाद पश्‍चिमी देश/चीन भारत को गुलाम बनाने का निर्णय कर सकते हैं। पश्‍चिमी देश/चीन भारत पर सीधे आक्रमण न करके पाकिस्‍तानी सेना को धन, हथियार और सेटेलाइट/उपग्रह द्वारा प्राप्‍त सूचनाएं दे सकते हैं और भारत में एक जातिसंहार करवा सकते हैं अथवा पश्‍चिमी देश/चीन नक्‍सलियों को सबसे आधुनिक/अच्‍छे हथियार देकर भारतीय सेना को तहस-नहस करने के लिए कह सकते हैं (जैसा कि नेपाल में हुआ है)। और यदि हम अगले कुछ वर्षों में अपनी सेना में सुधार नहीं करते हैं तो भारत एक “इराक” बन सकता है। अब सेना में सुधार करके उसे अमेरिका के बराबर ताकतवर बनाना आसान है, यदि एक बार कुछ अच्‍छे कानून पारित हो जाएं। लेकिन इन कानूनों को लागू करवाने के लिए कार्यकर्ताओं का समय चाहिए और यदि कार्यकर्तागण इन कानूनों को लागू करवाने के लिए समय नहीं देने का निर्णय कर लेते हैं तो मुझे भारतीय सेना में सुधार लाने को कोई रास्ता नहीं दिखता ।

इसलिए जो कार्यकर्ता, जिसके मुद्दों में “सेना में सुधार” के लिए आवश्‍यक कानूनों/नीतियों के क़ानून-ड्राफ्ट शामिल नहीं हैं तो वह भारतीयों को उस सबसे खतरनाक खतरे से बचाने में मदद नहीं कर रहा है, जिस खतरे का सामना भारत को आनेवाले भविष्‍य में करना पड़ेगा। एक तुलना के रूप में ,एक शहर पर विचार कीजिए जो अगले 24 घंटे में एक भीषण बाढ़ का सामना करने वाला है। अब, आज के भारत के सभी कार्यकर्ता जिनके ऐजेंडे में “सेना में सुधार” की नीतियां/कानूनों के क़ानून-ड्राफ्ट नहीं हैं, वे उस शहर में वैसे “भलाई करने वाले” की तरह हैं जो सभी अच्‍छे कार्य तो कर रहे हैं, लेकिन वे नागरिकों को आने वाले बाढ़ की सूचना/जानकारी नहीं दे रहे हैं, और न ही उन्‍हें बाढ़ से बचने अथवा बाढ़ न आने देने के तरीके/रास्‍ते ही बता रहे हैं। मैं सभी सच्‍चे कार्यकर्ताओं से अनुरोध करूंगा कि वे वैसे ऐजेंडों/कार्यसूची से बचें और उन ऐजेंडों को अपनाएं जिनमें “सेना में सुधार” एक महत्‍वपूर्ण मुद्दा/बिन्‍दु है।

(15.4)  अच्छी राजनीती बनाम  दुकानदारी राजनीति

आम व्‍यावसायिक राजनीती वह है जहां लोग राजनीतिक दलों में शामिल होते हैं अथवा मतदाताओं को लुभाने/प्रभावित करने के लिए दान-भलाई का काम करते हैं, जिससे चुनाव जितने में मदद मिलती है और फिर चुनाव जीतने के बाद घूस वसूलना शुरू हो जाता है अथवा चुनाव जीतनेवालों से आर्थिक मदद मिलती है। यह व्‍यावसायिक राजनीति कई प्रकार से विपणन/मार्केटिंग/दुकानदारी से मिलता-जुलता काम है। साम-दाम-दण्‍ड-भेद लगाकर/हर तरीके अपनाकर भी व्‍यावसायिक राजनीतिज्ञों अथवा व्‍यावसायिक गैर सरकारी संगठनों का काम मतदाताओं को लुभाना/ललचना होता है। पर इसके विपरित “अच्‍छी राजनीति” भी होती है जिसमें कार्यकर्ता गरीबी और भ्रष्‍टाचार कम करने के लिए काम कर रहे होते हैं।यह “अच्‍छी राजनीति” विपणन/मार्केटिंग/दुकानदारी से पूरी तरह भिन्‍न/अलग और अकसर उसके विपरित होती है। विपणन/मार्केटिंग में ‘क’‘ख’ को इस बात पर राजी करने की कोशिश कर रहा होता है कि ‘ख’ को कुछ चीज खरीद लेना चाहिए । और इससे ‘क’ अथवा दोनो (‘क’ और ‘ख’) को फायदा होगा । जबकि “अच्‍छी राजनीति” में दो समर्पित और धनवान/संपन्न व्‍यक्‍ति ‘क’ और ‘ख’ यह हिसाब बैठाने की कोशिश कर रहे होते हैं कि कैसे गरीबों और भ्रष्टाचार के शिकार लोगों को मदद की जा सकती है। न तो ‘क’ और न ही ‘ख’ को कोई अपना फायदा चाहिए। वास्‍तव में दोनो जानते हैं कि इससे आखिर में उसका बहुत नुकसान “कोई फायदा नहीं” होना निश्‍चित है। इस तरह गहराई से देखें तो “अच्‍छी राजनीति” अकसर विपणन/मार्केटिंग से उल्टा है और इसलिए, विपणन/मार्केटिंग में प्रयोग में लाए जाने वाले बहुत से प्रेरक/प्रोत्‍साहन आधारित तरीके “अच्‍छी राजनीति” में बिलकुल ही काम नहीं करते। कुछ हद तक नि:स्‍वार्थी होना अच्‍छी राजनीति के लिए जरूरी है पर यह नि:स्‍वार्थ भाव विपणन/मार्केटिंग/दुकानदारी के ज्‍यादातर मामलों में बिलकुल जरूरी नहीं होता। “ अच्छी राजनीती” में व्यक्ति अंशकालीन कार्य करता है और अपने कमाया हुआ धन और समय लगाता है उन क़ानून-ड्राफ्ट के प्रसार के लिए जो देश की व्यवस्था बदल सकते हैं | “दुकानदारी राजनीती” में व्यक्ति पुरे समय उसी में लगता है और अपने पालन-पोषण और प्रचार के लिए दान पर निर्भर रहता है जिससे उसके निर्णय दान करता के स्वार्थ से प्रभावित होती है |   

अब विपणन/मार्केटिंग/दुकानदारी और अच्‍छी राजनीति ये दोनों कैसे अलग-अलग हैं? बहुत से अन्‍तर हैं जिनमें से मैं सबसे महत्‍वपूर्ण अन्‍तर पर प्रकाश डालूंगा। विपणन/मार्केटिंग में जब तक कम्‍पनी के मालिक के पास पैसा है तब तक वह कितने भी बुद्धिजीवी और सक्षम लोगों को किराए पर या पैसा देकर काम पर रख सकते हैं और कमिशन आधारित रूपरेखा बनाकर वह नियत लागतों को कम से कम कर सकता है। इस तरह विपणन/मार्केटिंग में पैसे का महत्‍व है, प्रतिबद्ध/समर्पित लोगों की बड़ी संख्‍या का नहीं। लेकिन अच्‍छी राजनीति इससे बिलकुल विपरित है । किसी भी देश में अच्छी राजनीति में सबसे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण बात पैसा नहीं होती है बल्‍कि समर्पित व्‍यक्‍तियों की होती है। अच्‍छी राजनीति में पैसे की जरूरत अवश्‍य होती है लेकिन यह मुद्दा दूसरे स्‍थान पर आता है। और सबसे बड़ा और पहला मुद्दा समर्पित व्‍यक्‍ति ही होते हैं। इसलिए कौन व्‍यक्‍ति समर्पित व्‍यक्‍ति है, मैं इसके लिए मोटे तौर पर दो मानदण्‍ड रखूंगा।

पहला मानदण्‍ड – एक समर्पित व्‍यक्‍ति वह है जो हर सप्‍ताह एक घंटे काम करने का इच्‍छुक हो और पैसे, प्रसिद्धि/नाम, सत्‍ता आदि की उम्‍मीद किए बिना गरीबी कम करने और पुलिसवालों, मंत्रियों, न्‍यायालयों में भ्रष्‍टाचार कम करने में अपनी वार्षिक आय का 5 प्रतिशत खर्च करने की इच्‍छा रखता हो।

दूसरा मानदण्‍ड – एक समर्पित व्‍यक्‍ति वह है जो प्रति हर सप्‍ताह एक घंटे काम करने का इच्‍छुक हो और अपनी वार्षिक आय का 5 प्रतिशत खर्च करने की इच्‍छा रखता हो, अपनी सम्‍पत्ति का 5 प्रतिशत दांव पर लगाने का भी इच्‍छुक हो और पैसा प्रसिद्धि/नाम, सत्‍ता आदि की उम्‍मीद किए बिना गरीबी कम करने और पुलिसवालों, मंत्रियों, न्‍यायालयों में भ्रष्‍टाचार कम करने के लिए अपने जीवन के 6 महीने जेल में बिताने को तैयार हो।

(15.5)  “अच्छी राजनीति” में सबसे महत्‍वपूर्ण मूलभूत / प्रमुख सीमा

कुछ समय के लिए हमलोग पहले मानदण्‍ड पर ही चर्चा करेंगे। इस प्रकार भारत देश में (अथवा किसी देश में) कितने लोग हर सप्ताह लगभग एक घंटा समय देना और अपनी वार्षिक आय का लगभग 5 प्रतिशत गरीबी कम करने और पुलिस/न्‍यायालयों में भ्रष्‍टाचार कम करने के लिए लगाना चाहेंगे? और वह भी बदले में नाम, पैसा, सत्‍ता आदि की चाह किए बिना? भारत के ऊपर के पांच करोड़ व्यक्तियों में से केवल 3 से 5 प्रतिशत लोग अपनी आय का एक प्रतिशत खर्च कर सकते हैं और केवल  3 से 5 प्रतिशत लोग गरीबी / भ्रष्‍टाचार कम करने के लिए एक मिनट का समय भी लगाना चाहेंगे। इसलिए भारत में गरीबी / भ्रष्‍टाचार कम करने के लिए अपनी आय का 5 प्रतिशत और हर सप्‍ताह एक घंटा समय देने की इच्‍छा रखने वाले लोगों की संख्‍या केवल लगभग 15 लाख से 20 लाख है। यह सीमा कि भारत में केवल 15 लाख से 20 लाख सच्‍चे कार्यकर्ता हैं, यह अच्‍छी राजनीति की मूलभूत सीमा है ।  मार्केटिंग/विपणन/दुकानदारी और व्यावसायिक राजनीति में ऐसी कोई सीमा नहीं होती । मेरे विचार से, सभी जूनियर/कनिष्‍ठ कार्यकर्ताओं को अपने मन में हमेशा यह सीमा याद रखनी चाहिए और प्रत्‍येक कार्यकर्ताओं को इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि अपर्याप्‍त और क्‍लोन – निगेटिव कार्यकलाप पर खर्च किया गया कोई भी क्षण आनेवाले समय में फिर से गुलाम बनने से बचने में भारत की मदद नहीं करेगा।

(15.6)  असली कार्यकर्ता नेता बनाम नकली कार्यकर्ता नेता

मैं मोटे तौर पर कार्यकर्ताओं को दो समूह में बांटता हूँ। कनिष्‍ठ कार्यकर्ता और कार्यकर्ता  नेता। कनिष्‍ठ कार्यकर्ता सक्रियवाद/एक्‍टिविज्‍म अथवा राजनीति में कोई कैरियर/जीविका नहीं बनाना चाहता है। ये लोग कार्यकर्ता बनकर पैसे कमाने में रूचि नहीं रखते और सबसे कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ता केवल पार्ट-टाइम कार्य करना चाहते हैं जबकि सक्रियवादी/कार्यकर्ता  नेता जैसे कि मैं लेखक, सक्रियवाद/एक्‍टिविज्‍म के काम में कई-कई घंटे लगा देते हैं और हमारी प्रत्‍यक्ष या परोक्ष राजनीतिक महत्‍वकांक्षाएं हो सकती हैं। लगभग सभी कनिष्‍ठ कार्यकर्ता, जिनसे मैं अबतक मिला हूँ, वे मुझे सच्‍चे लगे। लेकिन अधिकांश कार्यकर्ता नेता, जिनसे मैं मिला, वे मेरे विचार में, नकली/बनावटी लगे। मेरे विचार से, अधिकांश सक्रियवादी नेता कम ही समय में पैसा बनाना चाहते हैं अथवा उनके दीर्घकालिक उच्‍च “गलत राजनीतिक लक्ष्‍य” होते हैं । अब इसका कनिष्‍ठ कार्यकर्ता पर क्‍या प्रभाव पड़ता है? यह बात कैसे मायने रखती है कि कार्यकर्ता  नेता असली है या नकली ?

यह बात क्‍यों मायने रखता है कि कार्यकर्ता नेता वास्‍तविक है या नकली ?

एक कनिष्‍ठ/छोटा कार्यकर्ता, जो भारत में गरीबी और भ्रष्‍टाचार कम करना चाहता है, वह स्‍वतंत्र रूप से काम करेगा या फिर किसी कार्यकर्ता नेता के साथ काम करेगा। मैं सुझाव दूंगा कि कनिष्‍ठ कार्यकर्ता को स्‍वतंत्र रूप से काम करना चाहिए, लेकिन कई कनिष्‍ठ कार्यकर्ता यह मानते हैं कि उन्‍हें काम करने के लिए एक समूह की जरूरत होगी और इसलिए अकसर वे किसी समूह वाले कार्यकर्ता नेता की तलाश में रहते हैं । अब यदि सक्रियवादी नेता नकली हुआ तो कनिष्‍ठ कार्यकर्ता अपना सारा समय ऐसे कार्यों को करने में व्‍यर्थ करते हुए बिता देगा जिससे गरीबी और भ्रष्‍टाचार बिलकुल कम नहीं होगा। इसलिए यदि कनिष्‍ठ/छोटा कार्यकर्ता गरीबी भ्रष्‍टाचार कम करने और सेना में सुधार करने का लक्ष्‍य रखता है तो उसे इस बात का पता लगाना होगा कि कौन सा कार्यकर्ता नेता सही/असली है और कौन कार्यकर्ता नकली । कैसे कोई कनिष्‍ठ कार्यकर्ता  किसी वास्‍तविक और किसी नकली कार्यकर्ता नेता के बीच अन्‍तर करेगा? एक तरीका जिसका सुझाव मैं देता हूँ कनिष्‍ठ कार्यकर्ता को उन सभी कार्यवाइयों की जांच करनी चाहिए, जिसका कार्यकर्ता नेता प्रस्‍ताव कर रहा है और जिसका वह विरोध कर रहा है। कृपया ध्‍यान दें : कनिष्‍ठ कार्यकर्ता  को उन कार्यवाइयों को देखना चाहिए जिसका सक्रियवादी नेता विरोध कर रहा है। यदि कार्यकर्ता नेता जानबूझकर अपर्याप्‍त और क्‍लोन निगेटिव कार्यवाइयों तक सीमित रहता है और वह कार्यकर्ता  नेता क्‍लोन पॉजिटिव कार्यवाइयों और कार्यविधियों पर काम करने से मना करता है तो मेरे विचार से वह कार्यकर्ता  नेता नकली  आदमी है । मैं पाठकों से अनुरोध करता हूँ कि वे “अच्‍छी राजनीति की सबसे मूलभूत सीमा” को याद करें –  भारत में केवल लगभग 20,00,000 सच्‍चे कार्यकर्ता हैं इसलिए यदि भारत में सभी 20,00,000 सच्‍चे कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ता अपर्याप्‍त कार्रवाइयों अथवा क्‍लोन-निगेटिव कार्यकलापों पर समय बरबाद करनेमें लगे रहेंगे तो गरीबी/भ्रष्‍टाचार में कोई कमी नहीं आएगी और भारतीय सेना में कोई सुधार नहीं होगा और भारत तुलनात्‍मक रूप से कमजोर से कमजोरतर होता जाएगा और एक ऐसी सीमा आएगी जब अमेरिका, इंग्‍लैण्‍ड, चीन, सउदी-अरब जैसा कोई दुश्‍मन भारत को बरबाद कर देगा। इसलिए यदि कनिष्ठ/छोटे  कार्यकर्ता वास्‍तव में भारत को आक्रमण अथवा टूटने अथवा गृहयुद्ध से बचाना चाहते हैं तो उन्‍हें पर्याप्‍त और क्‍लोन पाजिटिव संकल्‍पना/विचार के बारे में जागरूक बनाना चाहिए और अपने नेता के कार्य का विश्‍लेषण करना चाहिए ।

अब कनिष्ठ/छोटे  कार्यकर्ता कैसे जानेगा कि कार्यकर्ता  नेता वास्‍तविक है या नकली ।

मैं निम्नलिखित तरीके का प्रस्‍ताव करता हूँ –

नेता द्वारा प्रस्‍ताविक कार्यकलापों की जांच करें। “कार्यकलाप” क्‍या होनी चाहिए? उन कार्यकलापों में क्‍या विशेषताएं मौजूद रहनी चाहिए? प्रत्‍येक कार्यकर्ता  नेता कार्रवाई का प्रस्‍ताव करता है और वह कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ताओं के सामने यह दावा करता है कि यदि बड़ी संख्या में  कनिष्ठ/छोटे  कार्यकर्ताओं ने उसके बताए हुए काम किए तो भारतीयों की स्‍थिति में सुधार आएगा। उदाहरण –

  1. कुछ कार्यकर्ता  नेता स्कूल अस्‍पताल आदि चलाते हैं और वे दावा करते हैं कि यदि लाखों कार्यकर्ता वैसा ही करें जैसा वह करता या करने के लिए कहता है तो “अंतत:/आखिरकार” इससे पुलिस और न्‍यायालयों में भ्रष्‍टाचार कम होगा और भारत में सुधार आएगा।

  2. कुछ कार्यकर्ता नेता गरीबों, दलितों, महिलाओं आदि के लिए न्‍यायालयों में जनहित याचिका दायर करके लड़ाई लड़ते हैं और वे दावा करते हैं कि यदि लाखों कार्यकर्ता वैसा ही करें जैसा वह करता या करने के लिए कहता है तो “अंतत:/आखिरकार” इससे पुलिस और न्‍यायालयों में भ्रष्‍टाचार कम होगा।

  3.  कुछ कार्यकर्ता नेता छोटे स्‍तर के व्‍यक्‍तिगत भ्रष्‍ट स्‍थानीय नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ मुकद्दमें लड़ते रहते हैं और वे दावा करते हैं कि यदि लाखों कार्यकर्ता वैसा ही करें जैसा वह करता या करने के लिए कहता है तो “अंतत:/आखिरकार” इससे पुलिस और न्‍यायालयों में भ्रष्‍टाचार कम होगा।

  4. कुछ कार्यकर्ता नेता सड़कों, सार्वजनिक सुविधाओं आदि की वर्तमान स्‍थिति का पता लगाने के सूचना का अधिकार आदि के मुकद्दमें दायर करते रहते हैं और वे दावा करते हैं कि यदि लाखों कार्यकर्ता वैसा ही करें जैसा वह करता या कहता है तो “अंतत:/आखिरकार” इससे पुलिस और न्‍यायालयों में भ्रष्‍टाचार कम होगा और भारत में सुधार आएगा।

  5. मैं कार्य करने के सिद्धांत/सक्रियवादिता को इस प्रकार से चला रहा हूँ : मैने प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार), `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) आदि कानूनों के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट तैयार किए हैं और मैं स्‍वयंसेवकों से कहता हूँ कि वे नागरिकों से कहें कि वे (नागरिक) महापौरों, प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्रियों को `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम), प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) कानूनों पर हस्‍ताक्षर करने के लिए बाध्‍य कर दें । मैं इसे “कानूनों के प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट के लिए कार्य सिद्धांत/सक्रियवादिता” कहता हूँ । कानून-प्रारूपों के लिए कार्य सिद्धांत का उद्देश्‍य चुनावों का इन्‍तजार किए बिना कानूनों के प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट में बदलाव लाना है। और मैं यह भी दावा करता हूँ कि लाखों कार्यकर्ता यदि ऐसा ही करें और दूसरों को भी करने के लिए कहें तो “वास्‍तव में” आख़िरकार इससे पुलिस और न्‍यायालयों में भ्रष्‍टाचार कम होगा और भारत में सुधार आएगा।

अब मेरे साथ-साथ इन कार्यकर्ता नेताओं में से ज्‍यादातर यह दावा करते हैं कि यदि लाखों कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ता , इनके द्वारा प्रस्‍तावित कदमों को अपना लें तो एक दिन गरीबी घटेगी और पुलिस व न्‍यायालयों आदि में भ्रष्‍टाचार कम हो जाएगा और भारतीय सेना में सुधार होगा। और भी ऐसे बहुत से सुधार आएंगे। मेरे और इन अन्य नेताओं के दावे कितने सही हैं? नेताओं द्वारा सुझाए गए कार्यकलाप क्‍या सेना, प्रौद्योगिकी/तकनीकी, अर्थव्‍यवस्‍था आदि को उस स्‍तर तक सुधार सकते हैं कि दुश्‍मन भारत पर आक्रमण करने से बाज आ जाए? क्‍या ये कार्यकलाप गरीबी को उस सीमा तक कम कर सकते हैं कि नक्‍सलवादी, इसाई व इस्‍लाम धर्म के कट्टरपंथी लोग आदि नई भर्तियां करना बंद कर दें। क्‍या इन कार्यकलापों से पुलिसवालों और जजों/न्यायाधीशों में भ्रष्‍टाचार बिलकुल कम कर हो जाएगा? पर्याप्‍तता/सम्‍पूर्णता और क्‍लोन पॉजिटिव होने की संकल्‍पनाएं/विचार कार्यकर्ता नेताओं के दावों का विश्‍लेषण करने में उपयोगी हैं। मैं यह बताना चाहूंगा कि विभिन्‍न कार्यकर्ताओं के कार्य क्‍या हैं और यह दिखलाउंगा कि क्‍या वे पर्याप्‍त हैं और क्‍या वे क्‍लोन पॉजिटिव हैं भी या क्‍लोन निगेटिव हैं।

(15.7) अपर्याप्‍त कार्य क्‍या हैं और क्‍लोन निगेटिव कार्य क्‍या हैं ?

मैं यह दूहराउंगा कि अच्‍छी राजनीति में मूलभूत सीमा क्‍या है, जिसका उल्‍लेख मैने पहले किया है : हमलोगों के पास केवल लगभग 15 लाख से 20 लाख धनवान/संपन्न लोग हैं जो गरीबी और भ्रष्‍टाचार कम करने के लिए हर सप्‍ताह एक घंटा समय देने की इच्‍छा रखते हैं। यह एक मूलभूत सीमा है कि मैं सभी कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ताओं से अनुरोध करूं कि वे कार्यों का विश्‍लेषण करते समय अपने अपने मन में यह बात रखें – कि आपके साथ करोड़ों-करोड़ स्‍वार्थ-रहित कार्यकर्ता नहीं हैं । अब विभिन्‍न कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ता को कार्यकर्ता नेता द्वारा दी गई कार्यसूची में निम्‍नलिखित लक्षण दिख सकते हैं :-

अपर्याप्‍त कार्यकार्य की सूची अपर्याप्‍त होगी यदि भारत के सभी 20 लाख कार्यकर्ता इन कार्यों को लागू करें, तो भी गरीबी और भ्रष्‍टाचार कम नहीं होगा।

क्‍लोन निगेटिव कार्यकोई कार्य तब क्लोन निगेटिव होता है जब लक्ष्‍य प्राप्‍त करने के लिए आवश्‍यक लगने वाला समय, इन कार्यों को करने वाले आपस में/परस्पर(आपसी) अनजान कार्यकर्ताओं की संख्‍या बढ़नें के साथ साथ बढ़ जाता है। जब अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा किये गए प्रयास एक दूसरे को काटते हैं |

कुछ कार्यौं में बहुत ज्‍यादा संचार / संपर्क समय की जरूरत पड़ती है : अनेक कार्यकर्ताओं ने ध्‍यान दिया होगा कि बैठकों में बहुत ज्‍यादा समय लगता है और इससे कुछ हासिल नहीं होता। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्‍होंने कार्य करने का ऐसा तरीका चुना है जहां समझौता/एकमत होने के लिए कई जिन्‍दगियों के समय से ज्‍यादा समय लगेगा। यदि कोई तरीका भौतिक रूप से संभव तो है लेकिन उसमें कई जिन्‍दगियों से भी ज्‍यादा समय की आवश्‍यकता है तो ऐसे कार्यकलाप अव्यवहारिक हैं।

“क्‍लोन नकारात्‍मकता” बहुत असहज जैसा लग सकता है – यदि कोई कार्यकलाप एक से अधिक व्‍यक्ति द्वारा चलाया जाता है तो इसमें लगने वाले समय में हमेशा कमी आती है। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता – यदि कोई कार्य क्‍लोन निगेटिव है तो उन कार्यकलापों के माध्‍यम से भ्रष्‍टाचार कम करने के लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने में लगा समय वैसे वैसे बढ़ता जाएगा जैसे जैसे उसमें और क्‍लोन (व्‍यक्‍ति) आते जाऐंगे। यह क्‍लोन निगेटिव का सिद्धांत बहुत महत्‍वपूर्ण है, यह कार्य अकसर जाने-अनजाने होता रहता है और फिर भी यह सबसे कम समझा जा सकने वाला सिद्धांत है।

दु:ख की बात है कि भारत में आज कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ताओं द्वारा चलाई जाने वाली अनेक कार्रवाई क्‍लोन निगेटिव होती हैं अर्थात ये कार्य ऐसे हैं कि जैसे जैसे अधिक से अधिक और ज्‍यादा से ज्‍यादा परस्पर(आपसी) अजनबी कार्यकर्तागण इन तरीकों/विधियों को अपनाते हैं भारत में गरीबी कम करने और भ्रष्‍टाचार करने में लगने वाला समय बढ़ता जाता है !! और बहुत कम संख्‍या में “कानून के क़ानून-ड्राफ्ट के लिए कार्य करना” जैसे कार्यकलाप होते हैं जो क्‍लोन पॉजिटिव हैं अर्थात जैसे जैसे अधिक से अधिक परस्पर(आपसी) अजनबी कार्यकर्ता इन कार्यों को करते हैं वैसे वैसे भारत में सुधार आने के लिए लगने वाला समय घटता जाता है। “क्‍लोन पॉजिटिव ” का सिद्धांत सबसे महत्‍वपूर्ण पहलू है जिसे, दू:ख की बात है कि, बहुत कम कार्यकर्ता लोग कर रहे हैं। यह कथन कि “आप अकेले नहीं हैं और ऐसे बहुत से लोग हैं जो आप ही की तरह सोचते हैं और आप ही की तरह काम करते हैं” – एक वरदान तब हो सकता है (यदि और केवल यदि), जब आप किसी क्‍लोन पॉजिटिव कार्यवाई पर काम कर रहे हैं। और यह एक अभिशाप हो सकता है यदि आप किसी क्‍लोन निगेटिव कार्रवाई पर काम कर रहे हैं। इसलिए यदि आप चाहते  हैं कि ज्‍यादा लोग वैसा ही करें जैसा आप कर रहे हैं तो – कृपया यह सुनिश्‍चित/पक्का करें कि आपका कार्य क्‍लोन पॉजिटिव हो । यदि आपका काम क्‍लोन निगेटिव हुआ तो लक्ष्‍य प्राप्‍ति में तब देरी ही होगी जब अधिक से अधिक आपस में अनजान लोग वही करेंगे जो आप कर रहे हैं।

इसलिए मैं सभी कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ताओं से अनुरोध करता हूँ कि वे अपने कार्यकर्ता  नेता द्वारा प्रस्‍तावित कार्यों का विश्‍लेषण करें। यदि सभी कार्य क्‍लोन निगेटिव और अपर्याप्‍त हैं तो यह तय बात है कि चाहे कितने भी कार्यकर्ता इस कार्य से जुड़ जाऐं, भ्रष्‍टाचार कभी भी कम नहीं होगा। क्‍या कार्यकर्ता नेता का लक्ष्‍य कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ता का समय बरबाद करने वाले तरीकों और साधनों को अपनाना है? यही एक प्रश्‍न है जिसे हर कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ता को हर कार्यकर्ता नेता से पूछना है जो अपर्याप्‍त और क्‍लोन निगेटिव कार्यवाइयों में उलझे हुए हैं। और मेरे विचार से प्रत्‍येक कनिष्ठ/छोटे /जूनियर कार्यकर्ताओं को अपने नेता से पर्याप्‍त और क्लोन पॉजिटिव कार्यावाईयों पर काम करने के लिए कहना चाहिए और यदि कार्यकर्ता नेता किसी एक भी पर्याप्त और क्‍लोन पॉजिटिव कार्यवाई पर काम करने से मना कर देता है तो कनिष्ठ/छोटे  कार्यकर्ताओं को मेरा सलाह होगी कि वे उस नेता को छोड़ दें और किसी ऐसे नेता की तलाश करें जो पर्याप्‍त और क्‍लोन पॉजिटिव कार्यवाइयों पर काम करने के लिए इच्‍छुक है।

(15.8) दो प्रश्‍न जो छोटे / जूनियर कार्यकर्ता को अपने कार्यकर्ता नेता से अवश्‍य पूछना चाहिए

नीचे दो प्रश्‍न दिए गए हैं और मैं हरेक कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ता से अनुरोध करता हूँ कि उन्‍हें अपने और हर कार्यकर्ता नेता से ये प्रश्‍न अवश्‍य पूछना चाहिए-

पहला प्रश्‍न

मान लीजिए आप, कार्यकर्ता  नेता के पास 20 लाख कार्यकर्ता हैं जो आपकी सलाह के अनुसार काम करने के इच्‍छुक हैं और इनमें से हरेक कुछ समय और पैसा भी देने का इच्‍छुक है। यह इस प्रकार है –

  1. सभी 20,00,0000 कार्यकर्ता आपके दिशानिर्देशों के अनुसार हर सप्‍ताह 1 घंटा समय देंगे

    1. लगभग 50,000 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 5 घंटे समय देंगे

    2. केवल 5000 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 25 घंटे समय देंगे

    3. केवल 500 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 50 घंटे समय देंगे

और कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ता कार्यकर्ता नेता को एक भी पैसा नहीं भेजेंगे लेकिन आपकी दिशानिर्देशों के अनुसार वे पर्चियों /पम्‍फलेट्स आदि पर पैसे निम्‍नलिखित प्रकार से खर्च करेंगे –

  1. सभी 20,00,0000 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 150 रूपए खर्च करने के इच्‍छुक हैं

  2. लगभग 50,000 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 500 रूपए खर्च करेंगे

  3. लगभग 5000 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 3000 रूपए खर्च करेंगे

  4. लगभग 500 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 10,000 रूपए खर्च करेंगे

अब आपकी (आप = कार्यकर्ता  नेता की) सूची में कौन सी कार्यसूची हैं जो आप इन 20 लाख कार्यकर्ताओं को देंगे?

दूसरा प्रश्‍न

मान लीजिए आप कार्यकर्ता  नेता के पास 20 हजार कार्यकर्ता हैं जो आपकी सलाह के अनुसार काम करने के इच्‍छुक हैं और इनमें से हरेक कुछ समय और पैसा भी देने का इच्‍छुक है। यह इस प्रकार है –

  1. सभी 20,000 कार्यकर्ता आपके दिशानिर्देशों के अनुसार हर सप्‍ताह 1 घंटा समय देंगे

  2. लगभग 50 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 25 घंटे समय देंगे

  3. लगभग 5-10 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 5 घंटे समय देंगे

  4. केवल 2-3 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 50 घंटे समय देंगे

और कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ता कार्यकर्ता नेता को एक भी पैसा नहीं भेजेंगे लेकिन आपकी दिशानिर्देशों के अनुसार वे पर्चियों /पम्‍फलेट्स आदि पर पैसे निम्‍नलिखित प्रकार से खर्च करेंगे –

1.    सभी 20,000 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 150 रूपए खर्च करने के इच्‍छुक हैं

  1. लगभग 50 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 500 रूपए खर्च करेंगे

  2. लगभग 5-10 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 3000 रूपए खर्च करेंगे

4.    लगभग 2-3 कार्यकर्ता हर सप्‍ताह 10,000 रूपए खर्च करेंगे

अब आपकी (आप = कार्यकर्ता  नेता की) सूची में कौन सी कार्यसूची है जो आप इन 20 हजार कार्यकर्ताओं को देंगे?

दूसरा प्रश्‍न मध्‍यम स्‍तर पर और पहला प्रश्‍न बड़े स्‍तर पर है। कार्यकर्ता  नेता द्वारा तैयार की गई सूची के आधार पर मैं कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ताओं से अनुरोध करूंगा कि वे निर्णय करें कि क्‍या कार्यकर्ता नेता भारत के कानून के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट में सुधार करके गरीबी, भ्रष्‍टाचार कम करना चाहता है या उसको इसमें कोई भी रूचि नहीं है |

लगभग 2500 वर्षों पहले प्‍लूटो ने हमें बताया कि राजनीति में किसी व्‍यक्‍ति को पूछे गए प्रश्‍नों का उत्‍तर अवश्‍य देना चाहिए। इसलिए मैं कनिष्ठ/छोटे कार्यकर्ताओं से कहता हूँ कि वे अपने कार्यकर्ता नेता से ऊपर लिखित प्रश्‍नों को पूछें। अब मेरे उत्‍तर क्या हैं? मैं कनिष्ठ/छोटे  कार्यकर्ताओं से क्‍या करने के लिए कह रहा हूँ? मैने इस पुस्‍तक के पाठ 13 में उन कार्यकलापों की सूची दी है जो कार्यकलाप मैं करने के लिए कहता हूँ। वे सभी काम क्‍लोन पॉजिटिव और पर्याप्त हैं ।

अब हम उन कुछ उत्‍तरों का विश्‍लेषण करते हैं जो विभिन्‍न कार्यकर्ता  नेता दे सकते हैं।

(15.9) “भ्रष्‍टाचार कम करने की कोई जरूरत नहीं”  बनाम “भ्रष्‍टाचार कम करना बहुत जरूरी है”  कार्य

एक कार्यकर्ता या तो भ्रष्‍टाचार का समर्थक होता है या तो भ्रष्‍टाचार का विरोधी। जितने भी कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ताओं से मैं मिला हूँ, वे सभी भ्रष्‍टाचार के विरोधी हैं। लेकिन ज्‍यादातर कार्यकर्ता नेता जिन पर मैने गौर किया, वे भ्रष्‍टाचार के समर्थक थे। आम तौर पर, जितने भी कार्यकर्ता नेता जिनके पास 80 जी और 35 ए सी पर आधारित धर्मार्थ संगठन हैं, वे इस बात पर जोर देते हैं कि पुलिस, न्‍यायालय, आयकर विभाग आदि से भ्रष्‍टाचार कम करने के प्रयासों की जरूरत नहीं है। उनके ऐसा कहने के पीछे एक कारण यह हो सकता है कि उन्‍हें खतरा झेलने से नफरत/घृणा होती है। यदि कोई व्‍यक्‍ति न्‍यायाधीशों, मंत्रियों आदि में भ्रष्‍टाचार कम करना चाहता है तो समय और प्रयासों की बात तो छोड़ ही दीजिए, खतरा एक बड़ा कारक/ मुद्दा होता है। उत्‍पीड़न/कष्ट होने का भी खतरा होता है। ये उत्‍पीड़न जांचों, दण्‍ड़ लगाने, सम्‍पत्ति कुर्की/जब्‍त करने, झूठे पुलिस मुकद्दमें आदि के रूप में हो सकते हैं। सबसे ज्‍यादा नुकसान पहुंचाने वाले कदमों में से एक है – झूठा पुलिस मुकद्दमा। यदि अंग्रेज आज के पुलिसवालों/मंत्रियों जैसा कार्य कर रहे होते तो वे भगत सिंह के खिलाफ झूठे बलात्‍कार का मुकद्दमा दायर कर देते और भगत सिंह को बदनाम करने के लिए किसी महिला कार्यकर्ता को पैसे देकर काम पर रख लेते; न कि उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकद्दमा लगाकर उन्‍हें हीरो/नायक बनाते। और यदि कोई व्‍यक्‍ति पुलिस के मुकद्दमों से हार नहीं मानता या हतोत्‍साहित नहीं होता तो मारने, उत्‍पीड़ित करने, बन्‍दी बनाने और यहां तक कि जान से मारने का भी काम हो सकता था। और यहां तक कि भ्रष्‍ट पुलिसवाले, जज, मंत्री और भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई ए एस) के अधिकारी भ्रष्‍टाचार विरोधी कार्यकर्ताओं के परिवार के सदस्‍यों को हानि पहुंचाने जैसा काम भी कर सकते थे। इस प्रकार के डर के कारण, ज्‍यादातर कार्यकर्ता नेता शिक्षा  व अस्‍पताल आदि तक ही सीमित रहने पर जोर देते हैं और उन कानूनों का समर्थन करने से मना कर देते हैं जिनसे भ्रष्‍टाचार कम हो सकता है। कुछ कार्यकर्ता नेता पुलिस कांस्‍टेबल/पुलिस इंस्‍पेक्‍टर जैसे छोटे पद की भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ते रहते हैं। लेकिन ज्‍यादातर कार्यकर्ता नेता प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्रियों, वरिष्‍ठ मंत्रियों, वरिष्‍ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई ए एस) के अधिकारी, वरिष्‍ठ भारतीय पुलिस सेवा (आई पी एस) के अधिकारी आदि के भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ने के प्रस्‍तावों का विरोध करते हैं। और उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों तथा उच्‍चतम न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों के भ्रष्‍टाचार और भाई – भतीजावाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने के प्रस्‍तावों का तो 90 प्रतिशत से ज्‍यादा कार्यकर्ता नेता जोरदार विरोध करते हैं।

मेरे विचार में, “इन भ्रष्‍टाचार-समर्थक कार्यकर्ता नेताओं की कार्रवाईयां अपर्याप्‍त हैं। नक्सलवाद जैसे लक्षण तब तक समाप्‍त नहीं होंगे जब तक पुलिसवालों, जजों, मंत्रियों, और भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई ए एस) के अधिकारियों में भ्रष्‍टाचार कम नहीं होते, चाहे कितने ही स्‍कूल और अस्‍पताल चला लें। और कृपया इस मूलभूत सीमा को याद रखिए, जिसका उल्‍लेख मैंने पहले किया है। भारत में केवल 20 लाख स्वार्थ-रहित कार्यकर्ता हैं और यदि इन सभी 20,00,000 कार्यकर्ताओं को अस्‍पताल, स्‍कूल आदि चलाने के काम पर लगा दिया गया तो जजों, मंत्रियों, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई ए एस) के अधिकारियों, भारतीय पुलिस सेवा (आई पी एस) के अधिकारियों के भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़नेवाला कोई नहीं बचेगा और इस प्रकार जजों, मंत्रियों आदि का भ्रष्‍टाचार बरकरार ही नहीं रहेगा बल्‍कि बढ़ेगा भी। और इसलिए गरीबी, नक्‍सलवाद, अपराध आदि समस्‍याएं तेजी से बढ़ना जारी रहेंगी और भारत में भीतर ही भीतर विस्‍फोटक स्‍थिति आ जाएगी। इसलिए यदि किसी कार्यकर्ता नेता ने 20 लाख कार्यकर्ताओं को इस तरह की 100 कार्यवाईयों में लगा दिया कि जिससे कुल मानव-घंटे का 1 प्रतिशत भी भ्रष्‍टाचार विरोधी कार्रवाइयों में न लगा हो तो मानवघंटा आवंटन योजना अपर्याप्‍त होगा और इससे भारत में कभी सुधार नहीं आ पाएगा।

यही कारण है कि मैं सभी कनिष्‍ठ कार्यकर्ताओं से प्रार्थना/अनुरोध करता हूँ कि वे अपने-अपने नेताओं पर भ्रष्‍टाचार विरोधी कार्रवाइयों को उनकी अपनी सूची में जोड़ने के लिए दबाव बनाएं। और उनसे मैं यह भी अनुरोध करता हूँ कि वे हर सप्‍ताह कम से कम एक घंटे भ्रष्‍टाचार विरोधी कार्यकर्ता नेताओं के साथ काम करें। इसलिए मैं सभी कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ताओं से प्रार्थना  करूंगा कि वे अपने कार्यकर्त्ता नेताओं से पूछें :  आप पुलिसवालों, जजों आदि के भ्रष्‍टाचार कम करने के लिए किस कानून/ कार्यकलाप का प्रस्ताव करते हैं?

(15.10)  अनेक कार्यकर्ता नेता: कानूनों के ड्राफ्टों को बदलने में समय बरबाद न करें

अनेक कार्यकर्ता नेता इस बात पर जोर देते हैं कि कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ताओं को भारत के वर्तमान कानूनों के प्रारूपों को बदलने में समय बिलकुल बरबाद नहीं करना चाहिए । मेरे विचार से, यह कानूनों के प्रारूपों/ड्राफ्टों को बदलने में समय बरबाद न करें का तरीका अपर्याप्‍त तरीका है।  वे कार्यकर्ता नेता, जो जोर देते हैं कि “कानूनों के प्रारूपों/ड्राफ्टों को बदलनें में समय बरबाद न करें”, वे अक्‍सर कहते हैं कि वर्तमान/मौजूदा क़ानून-ड्राफ्ट ही सही हैं। हमें केवल लागू करवाने की जरूरत है। यह एक झूठा दावा है। तथाकथित “कार्यान्‍वयन/लागू करवाने ” की कमी मुख्‍यत: इसलिए है क्‍योंकि कानूनों के क़ानून-ड्राफ्ट /प्रारूप या तो अलोकप्रिय या अनैतिक हैं अथवा जानबूझकर इनमें ऐसे शब्‍द रखे/डाले गए हैं कि उनसे ज्‍यादा से ज्‍यादा भ्रष्‍टाचार हो सके। और शायद वे लोग, जो ताल ठोककर/बिना डरे यह दावा करते हैं कि “प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट को बदलने की कोई जरूरत नहीं है”, उन्‍होंने वास्‍तव में भारत के (कानूनों के) ड्राफ्टों और पश्‍चिमी देशों के प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट को कभी नहीं पढ़ा ही है, नहीं तो प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) तथा जूरी प्रणाली जैसे अनेक प्रारूपों पर एक सरसरी नजर डालने से ही यह साफ हो जाएगा कि भारत पश्‍चिमी देशों की तुलना में ज्‍यादा कष्‍ट में क्यों है। इसके पीछे कानूनों के वे क़ानून-ड्राफ्ट हैं जिन्‍हें काफी कमजोर शब्‍दों में लिखा गया है।

इसके अलावा, किसी ऐसे गरीब आम आदमी पर विचार कीजिए जिसका सरकारी तंत्र/सरकार में कोई रिश्‍तेदार या मित्र नहीं है। ऐसे गरीब आम आदमी के पास एक और केवल एक ही “दोस्तों का समूह” होता है – सरकार में बैठे ईमानदार आदमी अथवा स्‍वार्थ-रहित कार्यकर्तागण अथवा ईमानदार वकील। और ऐसे ईमानदार अधिकारियों अथवा स्‍वार्थरहित कार्यकर्ता अथवा ईमानदार वकील के पास गरीब (आम) आदमी की सहायता करने के लिए केवल एक ही साधन होता है- कानूनों के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट । इस प्रकार यदि कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ता भारत के कानूनों के ड्राफ्टों में सुधार करने के लिए समय देता है तो ईमानदार सरकारी अधिकारीगण, स्‍वार्थरहित कार्यकर्तागण और ईमानदार वकील लोग अनेक प्रकार से आम लोगों की मदद कर पाएंगे। इसलिए यदि कोई कार्यकर्ता नेता कानूनों के प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट में सुधार करने से मना करता है तो कनिष्‍ठ कार्यकर्ताओं को दूसरे वैसे कार्यकर्ता नेताओं के साथ प्रति सप्‍ताह एक घंटे का समय देना चाहिए जो भारत में कानूनों के ड्रॉफ्टों में बदलाव/परिवर्तन लाने के लिए समय देते हैं और खतरा मोल लेते हैं।   

(15.11)  कार्यकर्ता नेता-` व्यवस्था परिवर्तन / सिस्टम को बदलेंगे` , लेकिन कानूनों के प्रारूप / क़ानून-ड्राफ्ट नहीं देते

कार्यकर्ता नेताओं द्वारा अपनाए जाने वाले सबसे ज्‍यादा समय बरबाद करने वाले तरीकों में से एक तरीका यह है कि वे यह दावा तो करते हैं कि “वे व्यवस्था परिवर्तन/सिस्टम को बदलना चाहते हैं” लेकिन वे सिस्टम में बदलाव लाने के लिए अपने प्रस्‍तावित कानूनों का प्रस्‍ताव देने से खुले-आम मना कर देते हैं। और जब कोई व्‍यक्‍ति उनसे सिस्टम को बदलने के लिए उनके प्रस्‍तावित कानूनों के ड्राफ्टों के बारे में पूछता है तो वे कार्यकर्ता नेता दसों (कई) बहाने बनाते हैं :-

1.    बहाना 1-   मैं प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट का खुलासा तब करूंगा जब मेरे संगठन में हजारों या लाखों या करोड़ों सदस्‍य हो जाएंगे।

2     बहाना 2-    मैं प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट का खुलासा तब करूंगा जब मैं सांसद या विधायक बन जाउंगा।

3.    बहाना 3-    मैं प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट का खुलासा तब करूंगा जब मेरे संगठन में 200-300 सांसद हो जाऐंगे।

4.    बहाना 4-    प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट की जरूरत तो है लेकिन इस समय उनकी जरूरत नहीं है।

5.    बहाना 5-    ड्राफ्टों की कोई जरूरत नहीं है। क़ानून-ड्राफ्ट बेकार/अनुपयोगी होते हैं । सिस्टम को बदलने के लिए केवल राजनैतिक इच्‍छाशक्‍ति की जरूरत है।

प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट उपलब्‍ध न कराने के ये सभी बहाने ओछे/बेमानी हैं और कुछ तो अनैतिक भी हैं। सर्वप्रथम, सिस्टम में बदलाव लाने के लिए प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट जरूरी है और प्रस्‍तावित बदलाव के कुछ साइड-इफेक्‍ट भी हैं या नहीं, यह मुख्‍यत: प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट के खण्‍डों पर निर्भर करेगा। यदि प्रारूप में गलती से या जानबूझकर कमजोर शब्‍द डाले गए हैं तो प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट से लाभ होने की बजाए हानि ज्‍यादा होगी। और तथाकथित दलील कि मैं अपना प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट तब प्रकाशित करूंगा जब मेरे सदस्‍यों की संख्‍या लाखों या करोड़ों में हो जाएगी, यह भी उतनी ही ओछी दलील है। कोई हिंसात्‍मक लड़ाई लड़ने करने के लिए कुछ न कुछ सदस्‍यों की जरूरत तो पड़ती ही है। लेकिन एक अहिंसात्‍मक आन्‍दोलन प्रारंभ करने के लिए कुछ सदस्‍यों की भी जरूरत नहीं होती केवल एक ही व्‍यक्‍ति ही काफी होता है। कुल मिलाकर वे लोग जो सिस्टम/व्यवस्था में सुधार करना तो चाहते हैं लेकिन इसके लिए कोई प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट उपलब्‍ध नहीं कराते, वे सीधे-सीधे कार्यकर्ताओं का समय बरबाद कर रहे हैं।

(15.12)  कार्यकर्ता नेता – आइए, कानूनों के ड्राफ्टों को ही बदल दें, लेकिन ड्राफ्टों को पढ़ने में समय बरबाद न करें।

बहुत कम कार्यकर्ता गरीबी, पुलिस में भ्रष्‍टाचार, न्‍यायालयों आदि में भ्रष्‍टाचार कम कर सकने योग्‍य वर्तमान और प्रस्‍तावित प्रारूपों को पढ़ने / समझने में समय लगाते हैं। इसका मुख्‍य कारण यह है कि कार्यकर्ता नेता कनिष्‍ठ/छोटे  कार्यकर्ताओं से कहते हैं कि वे भारत/पश्‍चिमी देशों के वर्तमान कानूनों के क़ानून-ड्राफ्ट और इन प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट में प्रस्‍तावित बदलाव/परिवर्तन का अध्‍ययन करने में समय नहीं लगाएं और ऐसे कार्यकर्ता नेता यह सुनिश्‍चित  करते हैं कि कार्यकर्तागण छोटे-छोटे मुद्दों के पीछे भागने और उनपर चर्चा करने में ही व्‍यस्‍त रहें। मुझे इन कार्यकर्ता नेताओं (की नियत) पर पूरा संदेह/शक है । यदि कार्यकर्ता नेता खुलेआम/जोरदार ढ़ंग से कानूनों के प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट पर की जाने वाली चर्चाओं को हतोत्‍साहित करता है/रोकने की कोशिश करता है तो वह कार्यकर्ता नेता, बहुत संभव है कि भारत के कानूनों के प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट में सुधार करना नहीं चाहता। मेरे विचार से कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ताओं को अपने कार्यकर्ता नेताओं से कहना चाहिए कि वे भारत के वर्तमान कानूनों के प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट और पश्‍चिमी देशों के अच्‍छे कानूनों के भी प्रारूपों पर सूचना सत्र/समय आयोजित करें। और यदि कार्यकर्ता नेता कानूनों-प्रारूपों पर चर्चा-सत्र आयोजित करने से मना करता है तो कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ताओं को किसी दूसरे ऐसे कार्यकर्ता नेता के साथ प्रति सप्‍ताह एक घंटे का समय देना चाहिए जो भारत/पश्‍चिमी देशों के अच्‍छे/बुरे कानूनों पर जानकारी देने में बहुत ज्‍यादा रूचि लेता है ।

(15.13)  अब तक का सारांश  (छोटे में बात)

इस पाठ के अब तक के भागों का सारांश मैं इस प्रकार प्रस्‍तुत करूंगा:-

  1. 1.                  ऐसे कार्यकर्ता नेता, जो जोर देकर कहते हैं कि भ्रष्‍टाचार/भाई-भतीजावाद कम करने के प्रयास नहीं किए जाने चाहिएं, वे जानबूझकर या अनजाने में ही कनिष्‍ठ/छोटे  कार्यकर्ताओं को गुमराह करते हैं।

  2. 2.                   ऐसे कार्यकर्ता नेता, जो जोर देकर कहते हैं कि भ्रष्‍टाचार/भाई-भतीजावाद कम करने के लिए वर्तमान कानूनों के प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट में कोई बदलाव करने की आवश्‍यकता नहीं है, वे भी जानबूझकर या अनजाने में ही कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ताओं को गुमराह करते हैं।

  3. 3.                   ऐसे कार्यकर्ता नेता, जो कानूनों के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट बदलने की मौखिक बात तो करते हैं लेकिन अपने कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ताओं को कानूनों के ड्राफ्टों पर चर्चा/वाद-विवाद आयोजित करने से मना करते हैं, वे भी जानबूझकर या अनजाने में ही कनिष्‍ठ कार्यकर्ताओं को गुमराह करते हैं।

 

मेरे विचार से इन कार्यकर्ता नेताओं की कार्रवाइयां अपर्याप्‍त हैं और कनिष्‍ठ/छोटे कर्यकर्ताओं को चाहिए कि वे ऐसे नेताओं से जल्दी से जल्दी अपना पीछा छुड़ा लें।

(15.14) “कानून के ड्राफ्टों के लिए सक्रियतावाद” पर कुछ और बातें

आइए, “मैं इस कानूनके ड्राफ्टों के लिए सक्रियतावाद” को विस्‍तार से बताता हूँ। कानून के ड्राफ्टों के लिए सक्रियतावाद का अर्थ ऐसी सक्रियता है जिसमें कार्यकर्ताओं का एक ही नेता हो भी सकता है और नहीं भी, वैसा नेता, जिसपर उनका भरोसा हो ; उनका एक ही संगठन हो भी सकता है या वे अलग-अलग संगठनों से भी जुड़े हो सकते हैं, लेकिन सभी कार्यकर्ताओं का भरोसा कुछ ही कानून-ड्राफ्टों पर होता है जिसे वे लागू करना/करवाना चाहते हैं। उनका नेता न तो कोई आदमी होता है और न ही कोई संगठन बल्‍कि उनका नेता कानून के ड्राफ्टों का एक समूह होता है।

कानूनों के प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट के लिए सक्रियतावाद एक ऐसे अवलोकन/आवजर्वेशन पर आधारित होता है कि एक गरीब आम आदमी, जिसका कोई भी ताकतवर/शक्‍तिशाली रिश्‍तेदार अथवा शक्‍तिशाली मित्र नहीं होता उसका केवल दोस्‍तों का एक ही समूह हो – सरकार/सरकारी तंत्र में ईमानदार अधिकारी और कुछ ईमानदार वकील। यहां तक कि किसी सबसे ज्‍यादा बेकार / बेईमान प्रशासन में भी कुछ ऐसे ईमानदार अधिकारी और कुछ ईमानदार वकील मिल ही जाते हैं जो आम लोगों की भलाई का काम करने के लिए इच्‍छुक होते हैं। और ऐसे ईमानदार अधिकारियों के पास गरीबों की मदद करने के लिए साधनों का केवल एक ही समूह/सेट होता है- कानून के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट इस प्रकार यदि कार्यकर्तागण भारत के कानूनों के प्रारूपों में सुधार लाने में समय लगाते हैं वे वैसे सभी ईमानदार अधिकारियों और ईमानदार वकील, जो आम लोगों की मदद करना चाहते हैं, वे और भी प्रभावकारी ढ़ंग से आमलोगों की मदद कर पाएंगे।

इसलिए “कानून के ड्राफ्टों का सक्रियतावाद” हमें बताता है कि –

  1. यदि 20 लाख स्‍वार्थरहित कार्यकर्ता स्‍कूलों व अस्‍पतालों के माध्‍यम से गरीबों की मदद करते हैं तो वे अधिक से अधिक 50 लाख से 2 करोड़ गरीब लोगों के जीवन में कुछ (सुखद) परिवर्तन ला पाएंगे।

  2. लेकिन यदि ये 20 लाख स्‍वार्थरहित कार्यकर्ता उन कानूनों के ड्राफ्टों को लागू करवाने में अपने प्रयास लगाएं जो ईमानदार अधिकारियों और ईमानदार वकीलों को ज्‍यादा प्रभावकारी तरीके से कार्य करने में समर्थ बनाएगा तो ईमानदार अधिकारी और ईमानदार वकील बेहतर/ अधिक अच्‍छे कानूनों का प्रयोग करके सभी 116 करोड़ नागरिकों की मदद कर पाएंगे। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि सरकार के पास विशाल ढ़ांचा/सेटअप और कर-संग्रहण की सुविधा है और कम दोहराव है।

मैं कानून-ड्राफ्टों के सक्रियतावाद का एक बड़ा समर्थक हूँ । मैं उन सभी कार्यकर्ता  नेताओं का विरोध करता हूँ जो क़ानून-ड्राफ्ट में बदलाव का विरोध करते हैं और सीधे ही मदद करने या चुनाव प्रचार करने पर जोर देते हैं। मेरे विचार से इन सभी 20 लाख स्‍वार्थ–रहित कार्यकर्ताओं को अपने कुल समय का कम से कम 10 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत तक समय नागरिकों को यह बताने में लगाना चाहिए कि वे प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार), `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) आदि जैसे कुछ अच्‍छे कानून-ड्राफ्टों को लागू करवाने के लिए महापौरों, प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री पर दबाव डालें । और तब क्या होगा जब मेरे पास केवल 20,000 ही कार्यकर्ता होंगे। तब मैं इन 20,000 कार्यकर्ताओं/लोगों का उपयोग अन्‍य कार्यकर्ताओं और नागरिकों से मिलने और प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) आदि कानूनों के बारे में बताने के लिए लगाने में करूंगा ताकि यह जानकारी/सूचना अन्‍य 20 लाख मतदाताओं तक पहुंचे और फिर उनके माध्‍यम से सभी 72 करोड़ नागरिक मतदाताओं  तक पहुँच जाए।

इसके विपरीत, लगभग सभी कार्यकर्ता नेता, जिनसे मैं मिला हूँ, वे इस बात का विरोध करते हैं कि स्‍वार्थ-रहित कार्यकर्तागण अपना समय कानून-ड्राफ्टों को बदलने में लगाएं। ज्‍यादातर कार्यकर्ता नेताओं के अनुसार, कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ता को अपना सारा समय स्‍कूल व अस्‍पताल चलाने, जनहित याचिकाएं आदि दायर करने में लगाना चाहिए और भ्रष्‍टाचार को कम करने के लिए कानूनों के क़ानून-ड्राफ्ट बदलने/बदलवाने में अपना समय बिलकुल भी नहीं लगाना चाहिए। मेरे विचार से, ये कार्यकर्ता नेता ढ़ोंगी हैं। सारांशत: मैं कार्यकर्ता नेताओं को मोटे तौर पर दो समूहों में बांटता हूँ –

  • वैसे नेता, जो इस बात पर जोर देते हैं कि कानून-ड्राफ्टों को बदलने में समय बिलकुल बरबाद नहीं करना चाहिए।

  • वैसे नेता (मेरे जैसे), जो कानून-ड्राफ्टों को बदलने में ही समय लगाते हैं।

वे नेता जो कानूनों के ड्राफ्टों को बदलना/बदलवाना नहीं चाहते, वे सभी अपर्याप्‍त तरीकों पर काम कर रहे हैं और इनके तरीकों से गरीबी, भ्रष्‍टाचार कभी कम नहीं हो सकता । हमलोगों के पास केवल 20,00,000 स्‍वार्थ-रहित कार्यकर्ता हैं और इसलिए `केवल धर्मार्थ का तरीका` करोड़ों गरीब और भ्रष्‍टाचार/भाई भतीजावाद के शिकार लोगों की भलाई करने में असफल हो जाएगा। स्‍वार्थ-रहित कार्यकर्ताओं को अपर्याप्‍त संसाधन के साथ काम पर लगाने और “केवल धर्मार्थ, कानून के ड्राफ्टों में कोई बदलाव नहीं” का कार्य करके ये कार्यकर्ता नेता भारत की भलाई करने से ज्‍यादा नुकसान कर रहे हैं।

(15.15) “कानूनों के प्रारूपों / क़ानून-ड्राफ्ट को बदलने ” के लिए चुनाव आधारित कार्रवाई का प्रस्‍ताव करने वाले नेता

आइए देखें, “कानून के प्रारूप को बदलें” के विचार वाले कुछ कार्यकर्ता नेता किन कार्यकलापों का प्रस्‍ताव करते हैं। इन कार्यकर्ता नेताओं में से ज्‍यादातर नेता निम्‍नलिखित चुनाव आधारित कार्यकलाप का प्रस्‍ताव करेंगे –

  1. वे नागरिकों का मन जीतने के लिए धर्मार्थ आदि के काम करेंगे, स्‍थानीय शासन में सुधार लाएंगे।

  2. लोगों का मन जीतने के बाद अपने खड़े किए गए उम्‍मीदवार अथवा उन उम्‍मीदवारों जिनका वे समर्थन कर रहे होंगे, उनके लिए वोट हासिल करेंगे।

  3. उनके अपने सांसदगण अथवा जिन सांसदों के लिए उन्‍होंने काम किया है, उनको प्रभावित करके वे कानून-ड्राफ्टों में बदलाव लाने का प्रयास करेंगे।

ऊपर बताया गया तरीका पर्याप्‍त है । इससे कानूनों के प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट में बदलाव लाया जा सकेगा और इस प्रकार ईमानदार अधिकारियों और ईमानदार वकीलों को नागरिकों की भलाई के काम करने योग्य बनाया जा सकेगा। लेकिन यह तरीका/प्रयास क्‍लोन निगेटिव है और इसलिए यह समय की बरबादी मात्र है।

 

यह क्‍लोन निगेटिव तरीका क्‍या है? कोई तरीका तब क्लोन निगेटिव कहा जाता है जब ज्‍यादा एक दूसरे से अनजान, लोग/समूह एक ही प्रकार का काम करने की कोशिश करते हैं, तो इससे लक्ष्‍य प्राप्त करने के लिए आवश्‍यक समय में तो कमी नहीं आती बल्‍कि यह बढ़ जाता है। आइए, मैं आपको बताता हूँ कि क्‍यों/कैसे कानून को बदलने का यह तरीका जिसमें चुनाव जीतना एक पूर्वशर्त है, क्‍लोन निगेटिव है। यह क्‍लोन निगेटिव है क्योंकि सभी स्‍तरों पर यह मजबूती को और बढ़ाने की बजाए इसे कम करता है। इस बात को समझाने के लिए मुझे कुछ वास्‍तविक संख्‍याओं का उपयोग करने की जरूरत पड़ेगी ।

मान लीजिए , 14,00,000 मतदाताओं वाले किसी संसदीय क्षेत्र में 2,00,000 मतदाताओं वाले 7 विधानसभा क्षेत्र हैं जिनमें से हरेक में 40,000 मतदाताओं वाले 5 नगरपालिका वार्ड हैं । अब, मान लीजिए, 40,000 मतदाताओं वाले नगरनिगम वार्ड में एक कार्यकर्ता समूह जाता है और वहां वह समूह स्‍वास्‍थ्‍य/शिक्षा के कार्य करता है अथवा सूचना का उपयोग अधिनियम का प्रयोग करके स्‍थानीय शासन में सुधार लाने के कार्य करता है। अब अच्‍छे व्‍यवहार/ भलाई करने के कारण उसे यह लाभ तो होगा कि उसे कुछ वोट मिल जाऐंगे और वह चुनाव जीत भी सकता है और कानून-ड्राफ्टों में कुछ और अधिक बदलाव ला सकेगा। लेकिन यदि एक और कार्यकर्ता आता है और उसी वार्ड में कुछ वैसा ही काम करता है तो वोटों का बंटवारा हो जाएगा और इस प्रकार उन दोनों में से कोई भी चुनाव नहीं जीतेगा और इस प्रकार, कानून-ड्राफ्टों का बदलने के लक्ष्‍य की प्राप्‍ति में देरी होगी।

“चुनाव जीतने का तरीका ” में एक और बहुत गंभीर और न सुलझ पाने वाली 800 वर्षों पुरानी जानी पहचानी/सुज्ञात समस्‍या है। भारत में चुनाव में हर मतदाता का एक ही वोट होता है और चुनावों में सबसे अधिक मत हासिल करने वाला उम्‍मीदवार चुनाव जीत जाता है(उसे सभी मतों के पूर्ण बहुमत कि आवश्यकता नहीं होती जीतने के लिए )। इस प्रणाली/सिस्टम में ज्‍यादातर समझदार नागरिक चुनाव जीतने योग्य किसी ऐसे उम्‍मीदवार को वोट देते हैं ( जो ठीक ही है) जिससे दूसरे ऐसे जीतने योग्य उम्‍मीदवार का रास्‍ता बंद हो जाता है जिससे वे (नागरिक) सबसे ज्‍यादा डरते हैं और वे (नागरिक) वैसे उम्‍मीदवार को वोट नहीं देते जिसे वे सबसे ज्‍यादा बुद्धिमान, ईमानदार और योग्‍य समझते हैं। इसलिए चुनाव जीतने के लिए, जीतने की योग्‍यता का प्रत्‍यक्ष ज्ञान/महसूस/बोध अधिकांश मामलों में अनिवार्य होता है। अब कल्‍पना करें कि एक और कार्यकर्ता समूह उसी नगर-निगम वार्ड में आता है और शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य या स्‍थानीय शासन में सुधार के काम करता है। चूंकि दोनों ही समूह को कुछ न कुछ वोट मिलेगा इसलिए वोटों का यह बंटवारा एक सही प्रत्‍यक्ष ज्ञान/महसूस/बोध स्‍थापित करेगा कि दोनों में से कोई नहीं जीतेगा। इसलिए, चूंकि दोनों के पास चुनाव जीतने की योग्‍यता का प्रत्‍यक्ष ज्ञान/महसूस/बोध नहीं होगा । इसलिए बहुत से समझदार मतदातागण, जो ठीक ही चाहते हैं कि सबसे ज्‍यादा खतरनाक उम्‍मीदवार का रास्‍ता बन्‍द हो, वे किसी अन्‍य जीतने योग्‍य उम्‍मीदवार को वोट दे देते हैं। उदाहरण के लिए अहमदाबाद जैसे चुनाव क्षेत्र पर विचार कीजिए जहां मान सकते हैं कि नागरिकों में से लगभग आधे नागरिक कांग्रेस से डरते हैं। यदि उनमें से एक बड़ी संख्‍या में मतदाता कांग्रेस या बीजेपी से अधिक किसी तीसरे उम्‍मीदवार को चाहते हैं तो वे सभी मतदाता जो कांग्रेस के आने से डरते हैं, वे केवल बीजेपी को ही वोट दे देंगे। और यदि और भी कार्यकर्तागण उस क्षेत्र में आते हैं तो चुनाव जीतकर कानून-ड्राफ्टों में बदलाव/परिवर्तन लाने के उनके सपने को पूरा होने में देरी पर देरी होती जाएगी।

अब बहुत प्रयास करके स्‍थानीय स्‍तर पर एक हमराह/क्‍लोन दूसरे हमराह/क्‍लोन को पीछे छोड़ने में सफल हो जाए और नगर पालिका चुनाव जीत भी जा सकता है। ऐसा संभव हो भी जाता है क्‍योंकि नगरपालिका वार्ड छोटे होते हैं और व्‍यक्‍तिगत संपर्क करना संभव हो जाता है। इस प्रकार, मान लीजिए दो चार ऐसे ईमानदार उम्‍मीदवार जो कानून – ड्राफ्टों में बदलाव चाहते हैं, वे नगर पालिका का चुनाव जीत गए हैं। लेकिन मान लीजिए , वे विधानसभा का चुनाव लड़ते हैं। विधानसभा के स्‍तर पर 2 किलोमीटर से लेकर 10 किलोमीटर तक के दायरे/रेंज में फैले हुए 2,00,000 मतदाता होते हैं । इसलिए व्‍यक्‍तिगत सम्‍पर्क कायम करना मतदाताओं से समय की दृष्‍टि से व्‍यवहार्य/काम कर सके ,ऐसा नहीं है। किसी व्यक्‍ति के पास एक दिन में केवल 24 घंटे होते हैं । इसलिए कोई भी हमराह/क्‍लोन सभी 2,00,000 नागरिकों तक पहूंच नहीं पाएगा। इस प्रकार हर हमराह/क्‍लोन अपने ही वार्ड में अच्छा कर पाएगा लेकिन वह दूसरे वार्डों में अच्‍छा नहीं कर पाएगा। इसलिए इनमें से कोई भी स्‍थापित दलों के विरूद्ध चुनौती खड़ी नहीं कर पाएगा। यदि ये जीतने योग्य होने का प्रत्‍यक्ष ज्ञान/बोध/महसूस कायम नहीं कर पाते, तब ज्यादातर मतदाता, जो किसी ऐसे उम्‍मीदवार को समझदारी से रोकना चाहते हैं जिनसे वे सबसे ज्‍यादा डरते हैं तो वे मतदाता किसी कम बुरे लेकिन जीतने योग्य उम्‍मीदवार का साथ दे देते हैं। इस प्रकार, जहां नगर निगम स्‍तर पर चुनाव जीतना बहुत ही कठिन है, वहीं विधानसभा स्‍तर पर तो यह कहीं ज्‍यादा कठिन है। और परिस्‍थितियां संसदीय स्‍तर पर तब और अधिक कठिन हो जाती हैं जब मतदाताओं की संख्‍या 14,00,000 हो और चुनाव क्षेत्र का दायरा 10 किलोमीटर से लेकर 50 किलोमीटर तक होता है ।

इसलिए अब, एक ऐसे कार्यकर्ता नेता पर विचार कीजिए जो अपने समूह के 100 ईमानदार कार्यकर्ताओं को बताता है कि “हमलोग कानून-ड्राफ्टों में सुधार कैसे लाऐंगे? हम सभी स्‍थानीय स्तर पर काम करेंगे और उसके बाद हम या तो चुनाव लड़ेंगे अथवा चुनावों में किसी की मदद करेंगे, इसके बाद हमलोग चुनाव जीतेंगे अथवा चुनाव जीतने वालों को प्रभावित करेंगे। और तब हम कानून-ड्राफ्टों में बदलाव लाऐंगे।” तब मेरे विचार में, यह कार्यकर्ता नेता चुनाव प्रणाली में और उसके अपने तरीके में भीतर निर्मित क्‍लोन निगेटिव की स्‍थिति से निराशाजनक रूप से अनजान है । मेरे विचार में, कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ताओं को यह महसूस करना चाहिए कि उससे 2 मील की दूरी पर इसी प्रकार का एक और समूह होगा जो ऐसे ही तरीके अपना रहा होगा और अंत में वे केवल एक-दूसरे के वोट काटकर हार जाऐंगे और बेईमान भ्रष्‍ट वर्तमान विधायकों, सांसदों का बदलने/हटाने में कभी कामयाब नहीं हो पाएंगे और भारत में ऐसे हजारों समूह हैं जो “हम स्‍थानीय स्‍तर पर काम करेंगे और उसके बाद हम चुनाव लड़ेंगे, इसके बाद हमलोग चुनाव जीतेंगे और तब हम कानूनों में बदलाव लाऐंगे।” का तरीका अपना रहे हैं। इसलिए वे केवल एक दूसरे का वोट काट देंगे और सभी अंत में अपना-अपना समय ही बरबाद करेंगे।

इसलिए मैंने कहा कि क्‍लोन निगेटिव की स्‍थिति एक महत्‍वपूर्ण संकल्‍पना/सिद्धांत है और फिर भी यह सबसे कम परखा/जांचा जाने वाला और सबसे कम समझा जाने वाला मुद्दा है। पिछले 60 वर्षों से स्‍वार्थ-रहित कार्यकर्तागण क्‍लोन निगेटिव तरीकों को ही अपनाते आ रहे हैं और उन्‍होंने अपने 60 वर्ष बरबाद कर दिए हैं।

(15.16) “ एक नेता के नेतृत्‍व / नीचे में एकता ” द्वारा क्‍लोन निगेटिव की स्‍थिति से उबरने का प्रयास बेकार / व्यर्थ है

ज्यादातर कार्यकर्ताओं ने क्‍लोन निगेटिव की स्‍थिति को महसूस किया है। उन्‍होंने यह देखा है और महसूस किया है कि जब अनेक ईमानदार कार्यकर्ताओं ने चुनाव लड़ा तो अन्त में इनमें से सभी ने एक दूसरे का वोट काटा और स्‍थापित बेईमान पार्टियों के आसान जीत का रास्‍ता साफ किया। इसलिए अनेक कार्यकर्ताओं ने “एक नेता के नेतृत्‍व में एकता” बनाने की कोशिश अवश्‍य की। “एक नेता के नेतृत्‍व में एकता” का प्रयास भी व्‍यर्थ ही है। क्‍यों?

मान लीजिए, भारत में 20 लाख ईमानदार कार्यकर्ता हैं जो 543 संसदीय चुनाव क्षेत्रों में फैले हुए हैं। प्रत्‍येक चुनाव क्षेत्र में लगभग 3700 ईमानदार कार्यकर्ता हैं। प्रत्‍येक संसदीय क्षेत्र में लगभग 7 विधानसभा चुनाव क्षेत्र हैं। इस प्रकार, प्रत्‍येक विधानसभा चुनाव क्षेत्र में लगभग 500-600 ईमानदार कार्यकर्ता हैं। अब मान लीजिए, भारत में 20,000 समूह हैं जिनमें से प्रत्‍येक में 1-2 कार्यकर्ता नेता हैं और 10 से 500 से 5000 ईमानदार कार्यकर्ता हैं जो 543 संसदीय चुनाव क्षेत्रों और 5000 विधान सभा चुनाव क्षेत्रों में फैले हुए हैं।

अब प्रत्‍येक समूह यह देखेगा कि नेताओं और समूहों के बीच एकता न होने के कारण इनमें से कोई भी विधायक या सांसद के चुनाव जीतने में समर्थ नहीं है । इसलिए अनेक कनिष्‍ठ कार्यकर्ता और नेता “एक नेता के नेतृत्‍व में एकता” स्‍थापित करने की कोशिश करेंगे। और चूंकि इनमें से अनेक लोग ऐसी कोशिश करेंगे, इसलिए वे एक दूसरे का अवसर/प्रभाव कम कर देंगे।  इस प्रकार एक नेता के नेतृत्‍व में एकता स्‍थापित करना भी नकारात्‍मक है। यह राजनीति की सबसे खराब व्‍यंग्‍योक्‍ति/विडंबना है। “आईए श्री क.ख.ग. जी के नेतृत्‍व में एकता बनाएं/एक हो जाएं” यह सबसे ज्‍यादा बांटने वाला कथन/व्‍यक्‍तव्‍य है, जो अकसर दिया जाता है। क्‍योंकि वह “आईए श्री च.छ.ज. जी के नेतृत्‍व में एक हो जाएं” का नारा देने वाले व्‍यक्‍ति का विरोध ही कर रहा है क्योंकि दोनों अपने-अपने नेताओं के प्रति वफादार हैं और यदि उन्हें कोई कहे कि `मेरे नेता के नेतृत्व में एक हो जाओ` तो उन्हें ये अपने नेता के प्रति बेईमानी जैसे लगता है |

“एक नेता के नेतृत्‍व में एकता” स्‍थापित करने में एक और समस्‍या आती है। यह निर्णय करने में समय लगता है कि कौन सा नेता सबसे बड़ा है। एक नेता के नेतृत्‍व में एकता कायम करने के कार्य में उस एक नेता में विश्‍वास करने की जरूरत पड़ती है। एक व्‍यक्‍ति को दूसरे व्‍यक्‍ति के सामने यह साबित करना पड़ता है कि वह जीतने के बाद भी भ्रष्‍ट नहीं हो जाएगा। और भगवान ने किसी व्‍यक्‍ति के माथे पर यह प्रमाणित करने का कोई ठप्‍पा नहीं लगाया है कि वह सत्‍ता में आने के बाद भी इतना ही ईमानदार ही रहेगा। विश्‍वास कायम करने से पहले जोरदार/गहन पश्‍नोत्‍तरी के सत्र और लंबे व्‍यक्‍तिगत देख-परख आवश्‍यक हो जाते हैं। ऐसा करना तभी संभव होता है जब समूह आकार और क्षेत्र में छोटा होता है। लेकिन जब कोई दो समूह जिनमें से प्रत्‍येक के पास 20-100 कार्यकर्ता हों और वे एक बड़े क्षेत्र में फैले हों, यदि “एक नेता के नेतृत्‍व में एकता” कायम करने की कोशिश करें तो विश्‍वास कायम करने के लिए संचार/बातचीत में लगने वाले समय, असंभव/अव्यवहार्य तरीके से बहुत ज्‍यादा होगा। अनेक लोग कहते हैं कि एकता स्‍थापित करने में असफलता नेताओं में अहम/अहंकार की समस्‍या के कारण होती है। यह केवल आंशिक रूप से सत्‍य है । कई ऐसे लोग हैं जो राष्‍ट्र की सेवा के लिए अहम को दरकिनार कर देते हैं । लेकिन विश्‍वास की कमी ही वास्‍तविक कारण है `एक नेता के नेतृत्व में एकता` न स्थापित होने में और विश्‍वास की कमी विश्‍वसनीय होने की कमी के कारण नहीं होती बल्‍कि विश्‍वसनीयता साबित करने अथवा न करने के लिए आवश्‍यक समय की कमी के कारण होती है।

यदि कोई कार्यकलाप संभव तो है लेकिन इसमें लगने वाला जरूरी समय जीवन-काल से दूगना है तो ऐसा कार्यकलाप असंभव ही है। इसलिए “आइए एक विश्‍वसनीय नेता तलाशें और उसके नेतृत्‍व में एकता कायम करें” का कार्यकलाप संभव है, क्‍योंकि भारत में अवश्‍य ही 10 हजार से ज्‍यादा भरोसेमन्‍द आदमी हैं। लेकिन यदि 20 लाख ईमानदार कनिष्‍ठ कार्यकर्ता यह पता लगाने और इस बात पर सहमति कायम करने का निर्णय करते हैं कि 10 हजार कार्यकर्ता  नेताओं में से कौन सा नेता ज्‍यादा विश्‍वसनीय है। तब इस बात पर चर्चा-विचार करने के लिए उन्‍हें कई जीवन काल का समय लगेगा। और इस प्रकार “एक नेता के नेतृत्‍व में एकता” क्‍लोन निगेटिव है। और इसमें बहुत ज्यादा समय की जरूरत है। इसलिए यह बेकार/ व्‍यर्थ है।

“नेता के नेतृत्‍व में एकता” में एक और कमी है- मीडिया-मालिक नेता का नाम /प्रतिष्‍ठा आसानी से बर्बाद कर सकते हैं उसके खिलाफ झूठे वित्तीय आरोप लगाकर अथवा दसों/अनेक अन्‍य प्रकार से बर्बाद कर सकते हैं । वे लोग जो किसी नेता के नेतृत्‍व में एक होने की कोशिश कर रहे हैं वे बर्फ की धरातल पर चल रहे हैं। यदि शत्रु बर्फ की धरातल को किसी प्रकार तोड़ लेता है तो वापस लौटने के लिए कोई समय नहीं बचेगा।

(15.17) “ एक संगठन के नीचे एकता कायम करके ”  क्‍लोन निगेटिव की स्‍थिति से उबरने का प्रयास भी बेकार / व्‍यर्थ है

एक संगठन क्‍या होता है? यह कुछ लोगों का एक समूह होता है जो उस संगठन के भीतर कानूनों के एक सेट/समूह का पालन करने के लिए सहमत होते हैं। अधिकांश संगठनों के पास एक ऐसी चीज होती है जिसे वे संविधान कहते हैं। अब जर्मनी जैसे अनेक देशों ने ऐसे कानून और ऐसी प्रक्रियाएं लागू की हैं जो किसी भी राजनैतिक दल के संविधान को इसके नेताओं पर बाध्‍यकारी बना देता है। उदाहरण के लिए, यदि जर्मनी में किसी राजनैतिक दल का संविधान यह कहता है कि कोई चुना गया उम्‍मीदवार पार्टी के अन्दर के प्राथमिक चुनाव द्वारा चुना जाएगा तो जर्मनी के चुनाव आयोग के पास यह लागू करने की शक्‍ति मौजूद है कि पार्टी के भीतर ऐसे आन्तरिक चुनाव अवश्‍य हों। जर्मनी जैसे देशों के पास उनके मार्ग में आने वाले विवादों को सुलझाने के लिए फास्‍ट-ट्रैक/विवाद तेजी से निपटाने वाले कोर्ट भी हैं । भारत में आज की तिथि तक ऐसा कोई कानून या ऐसी कोई प्रक्रिया मौजूद नहीं है। और हमारे न्‍यायालय बहुत ज्‍यादा भ्रष्‍ट हैं और ऐसे किसी कानून को बनाने/लाने के लिए बहुत ही धीमे हैं। वास्‍तव में कोई भी कानून चुनाव आयोग को किसी राजनैतिक दल के संविधान को उस दल के नेताओं पर लागू कराने की शक्‍ति नहीं देता। और यहां तक कि यदि ऐसा कोई कानून किसी कानून के किताब के किसी कोने में मौजूद भी है तो चुनाव आयोग के पास समय और जन-शक्‍ति/जनबल  ही नहीं है कि वह 950 पंजीकृत पार्टियों/दलों में उनके अपने-अपने संविधानों को लागू करवा सके और यदि चुनाव आयोग आज ऐसा करने की कोशिश करे भी तो इससे केवल सैंकडों ऐसे मुकद्दमें न्‍यायालयों/कोर्ट में दायर हो जाएंगे जिन्‍हें सुलझने में वर्षों लगेंगे क्‍योंकि आज हमारे न्यायालय बहुत ही धीमें हैं और बहुत ज्‍यादा भ्रष्‍ट भी हैं। आज की स्‍थिति के अनुसार, किसी राजनैतिक दल का एक संविधान होना जरूरी है और उन्‍हें इसकी एक प्रति चुनाव आयोग को देनी पड़ती है। चुनाव आयोग इन कागजातों को केवल फाइलों में रख लेता है और इन्‍हें अपनी वेबसाइट पर डालने तक की जहमत नहीं उठाता/परवाह नहीं करता | और चुनाव आयोग शायद ही कभी पार्टियों के इन आन्‍तरिक संविधानों को पढ़ने की कोशिश करता है, इन्‍हें लागू करने की बात तो भूल ही जाइए।

आज की तारीख में, जब चुनावों के टिकट दिए जाते हैं तो चुनाव आयोग के पास इसके संबंध में एक ही कानून है – वह दल के अध्‍यक्ष के बताए अनुसार किसी उम्‍मीदवार को पार्टी का चुनाव चिन्‍ह आवंटित कर देता है। अब यदि उस दल/पार्टी के संविधान में उल्‍लेख है/लिखा है कि स्‍थानीय उम्‍मीदवार दल के सदस्‍यों द्वारा चुना जाना चाहिए और पार्टी–अध्‍यक्ष ने यदि पार्टी के भीतर स्‍थानीय चुनाव नहीं करवाया है तो भी चुनाव आयोग के पास ऐसे चुनाव करवाने के लिए पार्टी/दल को बाध्‍य करने का कोई पूर्व- उदाहरण या परंपरा नहीं है। चुनाव आयोग सिर्फ पार्टी–अध्‍यक्ष के पत्र के अनुसार ही अपनी कार्रवाई करता है।

इसलिए आज के कानूनों और परंपरा/रिवाज/चलन के अनुसार ये तथाकथित संगठन पार्टी नेताओं की निजी संपत्‍ति बनकर रह गए हैं। इसलिए कोई संगठन उतना ही लोकतांत्रिक अथवा अच्‍छा होता है जितना उस पार्टी के शीर्ष पर बैठे नेता । दूसरी बात कि संगठन में कुछ ही एक-आध नेताओं का प्रमुखता/प्रभुत्व होता है | इसलिए, “अच्‍छे आंतरिक नियमों वाले किसी अच्‍छे संगठन के तहत एकजूट होना” भी “एक अच्‍छे नेता के नेतृत्‍व में एकजूट” होने से कुछ अलग नहीं है और दोनों में एक समान समस्‍याएं हैं। यह क्‍लोन निगेटिव है क्‍योंकि अच्‍छे आंतरिक नियमों वाले दो संगठन एक दूसरे का अवसर/प्रभाव कम कर देते हैं और विश्‍वास कायम करने में तो अव्‍यवहार्य रूप से काफी समय लगता है।

(15.18) क्‍लोन-निगेटिव की स्‍थिति से उबरने के लिए समाचारपत्र–मालिकों का सहयोग लेना कुछ कारगार , कुछ बेकार है

जैसा कि मैंने बताया चुनाव जीतकर कानूनों को बदलने का प्रयास क्‍लोन निगेटिव है। इसलिए क्‍लोन निगेटिव की इस स्‍थिति से उबरने के लिए विभिन्‍न कार्यकर्ता नेता अनेक तरीके अपनाते हैं। जैसे- “एक नेता के नेतृत्व में एक जूट होना” और “एक संगठन के तहत एकजूट होना” । मैंने विस्‍तार से बताया है कि कैसे ये दोनों तरीके क्‍लोन निगेटिव हैं और इनमें बहुत ज्‍यादा समय बरबाद होता है।

एक तरीका जो कार्यकर्ता नेता क्‍लोन निगेटिव की स्‍थिति से उबरने/बचने के लिए अपनाते हैं, वह है – मीडिया-मालिकों का उपयोग। कुछ कार्यकर्ता  नेता समाचारपत्र मालिकों अथवा टेलिविजन चैनलों के मालिकों अथवा वित्‍तीय धुरंधरों/नामी संस्‍थाओं का समर्थन पाने का प्रयास करते हैं और सफल भी हो जाते हैं। उनके समर्थन का उपयोग करके कार्यकर्ता नेता ईमानदार कार्यकर्ताओं की एक बड़ी संख्‍या तक पहुँच बना लेते हैं और इस प्रकार एक ज्‍यादा बड़े समूह का निर्माण कर लेते हैं। यह समूह उन कार्यकर्ता नेताओं के समूहों से कहीं ज्‍यादा बड़ा होता है जिन्‍हें मीडिया-मालिकों तथा विशिष्ट/उच्‍च वर्ग के लोगों का समर्थन नहीं मिला होता है। यह तरीका कारगर तो होता है लेकिन इसमें एक बड़ी कमी होती है कि यदि समाचारपत्र मालिकों और टेलिविजन चैनलों के मालिकों का ऐजेंडा/कार्यसूची ईमानदार नहीं हुआ तो क्‍या होगा? मैं यह नहीं मानता कि सभी समाचारपत्र मालिकों और सभी टेलिविजन चैनलों के मालिकों का ऐजेंडा/कार्यसूची भारत विरोधी है। कुछ मालिक वास्‍तव में अच्‍छे हो सकते हैं जैसा कि कुछ अच्‍छे लोग हमें हर कहीं मिल जाते हैं। लेकिन यह संभावना होती है कि उन विशिष्ट लोगों का ऐजेंडा/कार्यसूची भारत विरोधी हो। लेकिन यदि कार्यकर्ता नेता प्रत्‍यक्ष अथवा परोक्ष रूप से समाचारपत्र मालिकों अथवा टेलिविजन चैनल मालिकों अथवा किसी ऐसे विशिष्ट /ऊंचे लोगों पर निर्भर है जो भारत विरोधी हैं तो उसका परिणाम गलत या उल्टा भी हो सकता है।

मैं एक कार्यकर्ता नेता हूँ । और मैंने यह निर्णय किया है कि मैं समाचारपत्र मालिकों, टेलिविजन चैनल मालिकों और विशिष्ट /उंचे लोगों की मदद नहीं लूंगा। मैं अपने पार्ट-टाइम/अंश-कालिक नौकरी से होनेवाली अपनी सीमित आय से ही काम चलाता हूं। और मैं सभी कनिष्‍ठ/छोटे  कार्यकर्ताओं और कार्यकर्ता नेताओं से ऐसा ही करने को कहता हूँ – सभी की अपनी पार्ट-टाइम/अंश-कालिक या फूल-टाइम/पूर्ण-कालिक नौकरी होनी चाहिए और उसी नौकरी से प्राप्‍त आय से ही उन्‍हें काम करना चाहिए ।

(15.19)  तो क्‍या कोई पर्याप्‍त और क्‍लोन-पॉजिटिव तरीका है?

अभी तक मैंने विस्‍तार से यह बताया कि क्‍यों –

  1. कोई कार्यकर्ता नेता यदि मंत्रियों, जजों आदि के भ्रष्‍टाचार का विरोध करने से मना करता है और केवल स्‍कूलों, अस्‍पतालों और स्‍थानीय कार्यों तक ही सीमित रहने पर जोर देता है, तो वह अपर्याप्‍त तरीका अपना रहा है। वह एक ऐसे डॉक्‍टर की तरह है जो मरीजों को जरूरी दवाएं नहीं दे रहा है।

  2. यदि एक कार्यकर्ता नेता भ्रष्‍टाचार का विरोध तो करता है लेकिन कानून ड्राफ्टों को बदलने के लिए काम करने से इनकार करता है, तो वह भी अपर्याप्‍त तरीका अपना रहा है। वह भी उसी प्रकार एक ऐसे डॉक्‍टर की तरह है जो मरीजों को जरूरी दवाएं नहीं दे रहा है।

  3. यदि एक कार्यकर्ता नेता यह प्रस्‍ताव करता है कि वे लोग धर्मार्थ का काम करेंगे, स्‍थानीय स्‍तर पर काम आदि करेंगे, वोट लेंगे, चुनाव जीतेंगे और तब कानून –क़ानून-ड्राफ्ट को बदलेंगे, तो वह क्‍लोन निगेटिव तरीका अपना रहा है। वह एक ऐसे डॉक्‍टर की तरह है जो अभी भी इस बात से अनजान है कि (कोई) दवाई बड़े पैमाने पर काम नहीं कर सकती है।

  4. यदि एक कार्यकर्ता नेता कार्यकर्ताओं को “एक नेता के नेतृत्‍व में एकजूट” करने का प्रयास कर रहा है, तो वह भी इस बात से अनजान है कि उसका तरीका क्‍लोन निगेटिव है और यह कि इसमें लगने वाला सम्पर्क-समय एक जीवन-काल से कहीं अधिक है।

  5. यदि कोई कार्यकर्ता नेता लोगों को “एक संगठन के तहत एकजूट” करने की कोशिश कर रहा है तो वह भी इस बात से अनजान है कि उसका तरीका क्‍लोन निगेटिव है और उसके तरीके को अपनाने पर बहुत अधिक सम्‍पर्क समय लगेगा।

  6. एक कार्यकर्ता  नेता समाचारपत्र मालिकों और टेलिविजन चैनलों के मालिकों का समर्थन लेने की कोशिश करता है क्‍योंकि उसे समर्थन मिल भी जाता है और उसका “कार्यकर्ताओं को एक संगठन के तहत एकजूट करने” का प्रयास सफल हो भी सकता है लेकिन केवल तभी जब उसकी सहायता करनेवाले विशिष्ट/ऊंचे लोग `आम आदमी समर्थक` हों । यदि उसकी सहायता करनेवाले विशिष्ट/ऊंचे लोग `आम आदमी विरोधी` हुए तो उनसे सहायता लेने का कार्यकर्ता नेता का कदम उलटा नुकसानदायक होगा।

इसलिए एक एक करके मैं उन सभी तरीकों को – यह बताकर कि उनके तरीके अपर्याप्त हैं अथवा क्‍लोन निगेटिव हैं अथवा दोनों ही हैं – असफल साबित करता जा रहा हूँ जिन तरीकों को भारत में विभिन्‍न कार्यकर्ता नेता अपना रहे हैं। इसलिए क्‍या कोई ऐसा तरीका है जो क्‍लोन पॉजिटिव भी हो और पर्याप्‍त भी? यदि हां तो वह तरीका क्‍या है? हां, एक पर्याप्‍त तथा क्‍लोन पॉजिटिव तरीका अवश्‍य मौजूद है। इन तरीकों के अन्तर्गत तथाकथित “कानून के क़ानून-ड्राफ्ट के लिए नेता रहित, संगठन रहित व्‍यापक आन्दोलन” प्रारंभ करना होगा। यह “कानून–क़ानून-ड्राफ्ट के लिए नेता रहित व्‍यापक आन्दोलन” पर्याप्‍त होने के साथ साथ क्‍लोन पॉजिटिव भी है । मैंने इसे  इसके बाद के खण्‍ड/भाग में विस्‍तार से बताया है।

(15.20)  क़ानून-ड्राफ्ट के लिए `नेता-रहित (व्‍यापक) जन-आन्‍दोलन` पर्याप्‍त और क्‍लोन पॉजिटिव है

(व्यापक) जन-आन्‍दोलन तभी एक घटना कही जाएगी जब हजारों या लाखों या करोड़ों भारतीय नागरिक सरकार में परिवर्तन लाने के लिए महापौर, मुख्‍यमंत्री, प्रधानमंत्री पर दबाव डालें । यह परिवर्तन की मांग किसी अधिकारी अथवा किसी मंत्री या किसी न्‍यायाधीश को बर्खास्‍त करने या वापस बुलाने की हो सकती है। अथवा यह परिवर्तन की मांग किसी कानून –क़ानून-ड्राफ्ट को लागू करने की हो सकती है। उनमें से पहला, अर्थात व्‍यक्‍ति को बदलने की मांग अपर्याप्‍त है और मैं इसमें रूचि नहीं लेता लेकिन किसी कानून–क़ानून-ड्राफ्ट को लागू करने की मांग, जो कानून–क़ानून-ड्राफ्ट पर निर्भर करता है, पर्याप्‍त हो भी सकता है, यदि कानून –क़ानून-ड्राफ्ट अच्‍छी तरह लिखा गया हो तो उस क़ानून-ड्राफ्ट को लागू करने से नागरिकों के जीवन में अनेक दीर्घकालिक सकारात्‍मक परिवर्तन आ सकता है। ऐसा एक उदाहरण राशन कार्ड प्रणाली(सिस्टम) “अर्थात जन-वितरण प्रणाली” है । सरकारी अधिसूचनाओं(आदेश) के प्रारूप / क़ानून-ड्रॉफ्ट जिसके द्वारा 1940 के दशक में जनवितरण प्रणाली लागू किया गया था। वे अच्‍छे इसलिए थे कि व्यापक भुखमरी से होनेवाली मौतों की समस्‍या 1945 से आज तक भारत में लगभग समाप्‍त ही हो गए। एक और उदाहरण, भूमि सुधार के लिए चलाया गया जन आन्‍दोलन है। यह आन्‍दोलन आंशिक रूप से सफल हुआ और आंशिक रूप से असफल इसलिए हुआ कि नागरिकों ने स्‍वयं क़ानून-ड्राफ्ट नहीं बनाया और विधायकों व सांसदों को ड्राफ्टों को बनाने के लिए दे दिया। विधायकों व सांसदों ने भूस्‍वामियों/जमींदारों से घूस लेकर कमजोर क़ानून-ड्राफ्ट बनाया और इसलिए भूमि सुधार सर्वाधिक संभव हद तक सफल न हो पाया।

“कानून –ड्राफ्टों के बिना व्‍यवस्‍था परिवर्तन के लिए व्‍यापक जन आन्‍दोलन” पूर्णतया असफल रहे हैं। सबसे बुरा उदाहरण 1977 में देखने में आया जब जनता पार्टी श्री जयप्रकाश नारायण के नेतृत्‍व में एक व्‍यापक जन आन्‍दोलन था और इसके प्रमुख उद्देश्‍यों में से एक था – प्रजा अधीन राजा/ राइट टू रिकॉल (कानून) लाना । इस व्‍यापक जन आन्दोलन को लोक सभा में दो तिहाई बहुमत प्राप्‍त करने में सफलता मिली पर चूंकि प्रस्‍तावित रिकॉल कानून का कोई प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट नहीं था इसलिए मंत्रियों ने दावा कर दिया कि उन्‍हें इस कानून को लिखने के लिए समय चाहिए और इस तरह दो वर्ष का समय बिता दिया। और फिर प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानूनों को लागू करने की योजना को पूरी तरह से रद्द कर दिया। इस तरह यह आन्‍दोलन पूरी तरह असफल हो गया ।

“क़ानून-ड्राफ्ट के लिए नेता रहित व्‍यापक जन आन्‍दोलन” जिसका प्रस्‍ताव मैं कर रहा हूँ वह इस प्रकार है –

1.    कार्यकर्ताओं के पास उन कानूनों के स्‍पष्‍ट क़ानून-ड्राफ्ट होने चाहिए जिन्‍हें वे चाहते हैं। कानून `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम), प्रजा अधीन- मुख्‍यमंत्री आदि ही हो, यह जरूरी नहीं। ये कोई भी कानून–क़ानून-ड्राफ्ट हो सकते हैं जिनमें कार्यकर्ताओं का विश्‍वास हो। लेकिन पूरी तरह लिखित प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट प्रस्‍तुत करना होगा।

2.    कार्यकर्ताओं को नागरिकों को यह बताना होगा कि वे मुख्‍यमंत्री, प्रधानमंत्री, महापौर और सरपंच से कहें कि वे इस क़ानून-ड्राफ्ट पर हस्‍ताक्षर कर दें। हस्ताक्षर द्वारा, सरकारी अधिसूचना(आदेश) द्वारा कई क़ानून-ड्राफ्ट आ सकते हैं और आते हैं |

3.    सबसे महत्‍वपूर्ण : हम लोगों का लक्ष्‍य चुनाव जीतने के तरीके से प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट लागू करवाना नहीं है बल्‍कि वर्तमान प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्रियों और महापौरों पर दबाव डालकर प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट लागू करवाना है।

4.    कार्यकर्तागण कानून प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट के बारे में जानकारी नागरिकों तक पहुंचाने के लिए इस पुस्‍तक में बताए गए हर उपाय अपना सकते हैं।

ऊपर लिखित तरीका पर्याप्‍त और क्‍लोन पॉजिटिव है और (3) इसका सबसे महत्‍वपूर्ण भाग है। यदि लक्ष्‍य चुनाव जीतकर व्‍यवस्‍था में परिवर्तन लाने का है तो यह तरीका निराशाजनक रूप से धोखा देने वाला और क्‍लोन निगेटिव है। और यह पांच साल के इंतजार का समय लगा देगा। और यदि लक्ष्‍य चुनाव का इंतजार किए बिना लेकिन वर्तमान महापौरों, मुख्‍यमंत्री, प्रधानमंत्री पर, कानून-ड्राफ्टों पर हस्‍ताक्षर करने का दबाव बनाकर व्‍यवस्‍था में परिवर्तन लाने का है तो यह तरीका क्‍लोन पॉजिटिव है और इसमें इंतजार भी नहीं करना पड़ेगा।

“बिना किसी नेता के” और “बिना किसी संगठन के” – ये दो महत्‍वपूर्ण बातें हैं । यदि पूरा आन्‍दोलन किसी एक या कुछेक नेताओं के नेतृत्‍व में चलेगा तो पहले से जमे हुए/स्‍थापित भारतीय और विदेशी विशिष्ट/ऊंचे लोग इन नेताओं को मार देंगे, मजबूर कर देंगे अथवा घूस दे देंगे अथवा नेताओं को झूठे आरोपों में फंसाकर उनकी छवि बरबाद कर देंगे। फिर भी यदि हजारों अथवा लाखों कार्यकर्ताओं के पास केवल क़ानून-ड्राफ्ट ही मद/विषय होगा तब भारतीय अथवा विदेशी विशिष्ट/ऊंचे लोग यह समझ जाएंगे कि नेताओं को मारना अथवा घूस दे देने का तरीका उन्‍हें जरा भी मदद करने वाला नहीं है।

नेता रहित व्‍यापक जन आन्‍दोलन में क़ानून-ड्राफ्ट ही नेता होता है और नागरिकगण उपनेता होते हैं । ये नागरिक प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट बदल सकते हैं और इस प्रकार नेता को बदल सकते हैं लेकिन यह नेता अपने आप को नहीं बदल सकता और न ही बाद में भ्रष्‍ट बन सकता है।

कानून ड्राफ्टों के लिए नेता रहित (व्‍यापक) जन-आन्‍दोलन क्‍लोन पॉजिटिव है। कैसे?

 

“क़ानून-ड्राफ्ट के लिए नेता-रहित आन्‍दोलन” क्‍लोन पॉजिटिव है क्‍योंकि अनेक लोग एक ही मांग अथवा विभिन्‍न कानूनों की मांग के लिए इसमें शामिल होते हैं। वे एक दूसरे को कमजोर नहीं करते,एक दूसरे को काटते नहीं बल्‍कि उनकी ताकत बढ़ा देते हैं ।

उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री और प्रजा अधीन- प्रधानमंत्री, प्रजा अधीन-  मुख्‍यमंत्री व प्रजा अधीन-जजों आदि कानून-ड्राफ्टों पर हस्‍ताक्षर करने के लिए दबाव ड़ालने के मेरे प्रस्‍तावित नेता-रहित व्‍यापक आन्‍दोलन पर विचार कीजिए। मैंने इस व्‍यापक आन्‍दोलन को खड़ा करने के लिए अनेक कार्रवाइयों का प्रयोग किया है और मैंने इन कार्रवाइयों को विस्‍तार से पहले के पाठों में बतलाया है जिसका शीर्षक है – “प्रति सप्‍ताह केवल एक घंटा का समय देकर आप भारत में प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) कानूनों को लाने में मदद कर सकते हैं।”

मैं यह समझा सकता हूँ कि प्रत्‍येक कार्रवाई क्‍लोन पॉजिटिव है। इस पाठ में मैं इसमें से कुछ मदों के बारे में बताउंगा।

  1. मान लीजिए मैं लोकसभा का चुनाव लड़ता हूँ जिसमें मेरा लक्ष्‍य चुनाव जीतना नहीं है बल्‍कि ज्‍यादा से ज्‍यादा नागरिकों को यह बताना है कि वे वर्तमान सांसद, विधायक और मेयर/महापौर आदि से कहें कि वे प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री और जजों पर प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) लागू कर दें। मान लीजिए, समाचारपत्र विज्ञापनों आदि का उपयोग करके मैंने 1,00,000(एक लाख) नागरिकों से सम्‍पर्क किया और उन्‍हें प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री और जजों/न्‍यायाधीशों पर प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) कानून-ड्राफ्टों के बारे में जानकारी दी। मान लीजिए, एक और व्‍यक्‍ति उसी चुनाव क्षेत्र में प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) कानून-ड्राफ्टों पर चुनाव लड़ता है। तब उसके प्रयासों के चलते यह जानकारी कई हजार ज्‍यादा मतदाताओं तक पहुंचेगी और इस प्रकार प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) कानूनों के आने/लागू होने की संभावना बढ़ जाएगी। अब यह तो हो सकता है कि हम दोनों एक दूसरे का वोट काट दें लेकिन चूंकि हमारा लक्ष्‍य चुनाव जीतना नहीं है बल्‍कि नागरिकों को यह बताना हमारा लक्ष्‍य है कि वे वर्तमान प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्रियों आदि पर प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) कानून पारित करने का दबाव डालें और इस लक्ष्‍य की प्राप्‍ति के लिए हम दोनों उम्‍मीदवारों द्वारा सकारात्‍मक तरीके से काम किया गया है।  इस प्रकार, वर्तमान प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्रियों आदि पर किसी क़ानून-ड्राफ्ट पर हस्‍ताक्षर करने का दबाव बनाने के लिए चुनाव लड़ना क्‍लोन पॉजिटिव है। जबकि चुनाव में खड़े किए गए उम्‍मीदवार को जीताने के लक्ष्‍य के साथ चुनाव लड़ना और फिर यह आशा करना कि वह उम्‍मीदवार प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानून लागू कर देगा, यह क्‍लोन निगेटिव है।

  2. मान लीजिए, यदि मैं प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट की जानकारी देना वाली पर्चियां/ पम्‍फलेट्स बांट रहा हूँ। यदि एक और कार्यकर्ता ऐसी ही पम्‍फलेट्स बांटता है तो प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानूनों पर हस्‍ताक्षर होने की संभावना बढ़ जाएगी।

  3. अब, मान लीजिए, कोई कार्यकर्ता समूह क़ानून-ड्राफ्ट के लिए प्रचार कर रहा है और एक और कार्यकर्ता समूह आता है और क़ानून-ड्राफ्ट के लिए प्रचार अभियान शुरू करता है। तब या तो कार्यकर्ता समूह प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट को अपने क़ानून-ड्राफ्ट में शामिल कर सकता है या कार्यकर्ता समूह प्रारूप को अपने क़ानून-ड्राफ्ट में शामिल कर सकता है या कोई तीसरा कार्यकर्ता समूह आएगा और एक प्रारूप प्रस्‍तुत करेगा जिसमें प्रारूप और प्रारूप दोनो की बातें शामिल होंगी । और यह डर कि कार्यकर्ता क़ानून-ड्राफ्ट अपने में जोड़ लेगा या कार्यकर्ता क़ानून-ड्राफ्ट अपने क़ानून-ड्राफ्ट में जोड़ लेगा अथवा यह डर कि कार्यकर्ता आएगा और क़ानून-ड्राफ्ट और क़ानून-ड्राफ्ट दोनों को अपने में शामिल कर लेगा, ये बातें यह सुनिश्‍चित करती हैं कि हर समूह ऐसे प्रारूप बनाती है जिसमें दूसरे समूह के क़ानून-ड्राफ्ट की बातें भी शामिल हों। पर यदि दो प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट एक दूसरे से अलग ही रह जाते हैं तो कोई नागरिक दोनो प्रारूपों को समर्थन दे सकता है और इस प्रकार कोई (वोटों का) बंटवारा नहीं रह जाएगा जबकि कोई नागरिक दो उम्‍मीदवारों को वोट नहीं दे सकता।

मैंने लगभग 200 कार्यकलापों की सूची बनाई है जिसे कार्यकर्तागण प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) कानूनों के लिए व्‍यापक जन-आन्‍दोलन खड़ा करने के लिए उपयोग में ला सकते हैं (देखिये पाठ 13) । हरेक कार्यवाई कलोन पॉजिटिव कार्रवाई है। मैं पाठकों से अनुरोध करता हूँ कि यदि उन्‍हें कोई शंका हो कि कोई भी प्रस्‍तावित कार्रवाई क्‍लोन निगेटिव है तो कृपया हमारे मंच/फोरम के जरिए हम लोगों से सम्‍पर्क करने में संकोच न करें।

(15.21)  क़ानून-ड्राफ्ट के लिए नेता-रहित व्‍यापक (फैला हुआ) आन्दोलन में समय भी कम लगेगा

क़ानून-ड्राफ्ट के लिए `नेता-रहित व्‍यापक आन्दोलन` एक ऐसी घटना होगी जिसमें हजारों अथवा लाखों अथवा करोड़ों भारतीय नागरिक एक कानून–क़ानून-ड्राफ्ट पर हस्‍ताक्षर करने के लिए मेयर/महापौर, मुख्‍यमंत्री, प्रधानमंत्री पर दबाव डालेंगे। कार्यकर्ता अथवा नागरिक जिसने किसी का अनुसरण न करने का फैसला किया है और केवल उन प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट को लागू करने में पूरी ताकत लगाने पर सहमत हुआ है, यह क़ानून-ड्राफ्ट ही उनका नेता है।

यह तरीका “किसी नेता के नेतृत्‍व में व्‍यापक जन-आन्‍दोलन” की तुलना में कम समय लेगा क्योंकि किसी नेता को किसी व्‍यक्‍ति को यह समझाने में बहुत ज्यादा समय लगेगा कि नेता श्री क.ख.ग. अच्‍छा आदमी है और यदि उसका समर्थक श्री च.छ.ज. इस बात से संतुष्‍ट हो भी जाता है कि श्री क.ख.ग. एक अच्‍छा नेता है और तब भी श्री च.छ.ज. के लिए यह आसान नहीं होगा कि वह श्री ट.ठ.ड. को यह समझा दें कि – जिस श्री ट.ठ.ड. ने श्री क.ख.ग. को देखा तक नहीं है या उनसे बात तक नहीं की है, – वह श्री क.ख.ग. एक अच्‍छा नेता है। जबकि यदि श्री च.छ.ज. किसी कानून–प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट को समझ लिया हो तो वह आसानी से श्री ट.ठ.ड. को समझा सकता है कि यह कानून–प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट अच्‍छा है। और श्री ट.ठ.ड. आगे किसी और को भी बता सकते हैं । इसलिए क़ानून-ड्राफ्ट के लिए `नेता रहित आन्‍दोलन` में कम समय लगेगा और “एक नेता के नेतृत्‍व में आन्‍दोलन” ज्‍यादा समय लेगा।

(15.22) क्‍या सततता / निरंतरता होना जरूरी है?

धर्मार्थ संस्‍थान चलाना अथवा एक नई राजनैतिक पार्टी खड़ी करना जैसे अनेक तरीकों में हर किसी को नियमित आधार पर प्रति सप्‍ताह घंटे का समय देने की जरूरत पड़ती है। नियमितता में व्‍यवधान पहले के किए गए सभी कार्य /मेहनत को खत्‍म कर देता है । “`जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) कानून-प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट के लिए व्‍यापक जन आन्‍दोलन” की यह महत्‍वपूर्ण व अच्‍छी बात है कि निरंतरता की कमी, पीछे किए गए कार्य को समाप्‍त नहीं करेगी क्‍योंकि “`जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)  कानून–क़ानून-ड्राफ्ट के लिए एक व्‍यापक जन-आन्‍दोलन” में मुख्‍य कार्यकलाप साथी कार्यकर्ताओं और नागरिकों को `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम), नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्‍टी (एम. आर. सी. एम.), प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) आदि कानूनों के बारे में संतुष्‍ट करना होता है । एक बार यदि कोई व्‍यक्‍ति संतुष्‍ट हो जाता है तो सततता/निरंतरता में व्‍यावधान से उसकी संतुष्‍टी खत्‍म नहीं होगी। जबकि धर्मार्थ के काम और नई पार्टी खड़ी करने के काम में एक व्‍यक्‍ति को लगभग हर दिन काम करना पड़ता है । यदि किसी संगठन में सततता में व्‍यवधान आ जाता है तो इस बात की संभावना होती है कि समर्थक और कार्यकर्ता दूसरे संगठनों में चले जाएंगे। यह क्‍लोन निगेटिव स्थिति का प्रभाव मात्र है : जब एक क्‍लोन/व्‍यक्‍ति अपने कार्य में विराम लेता है तो एक प्रतियोगी क्‍लोन /व्‍यक्‍ति उसके द्वारा खड़े किए गए संगठन को बरबाद कर डालता है।

वास्‍तविक दुनियां में कार्यकर्ताओं के पास करने के लिए दसों/कई महत्‍वपूर्ण कार्य हैं। इसलिए सततता में व्‍यावधान निश्‍चित ही है। कोई कार्यकर्ता कुछेक सप्‍ताह कार्य करता है और उसके बाद अगले कुछ सप्‍ताहों तक वह समय नहीं भी दे सकता है और वह फिर से तब कार्य करने के लिए तैयार होगा जब उसकी व्‍यक्तिगत परेशानी सुलझ गई हो।

ऐसे मामलों में जब वह कार्यकर्ता दोबारा शुरू करता है तो पहले किए गए कार्यकलापों द्वारा बनाई गई स्‍थिति बिगड़नी नहीं चाहिए। “कानून–क़ानून-ड्राफ्ट आन्‍दोलन में यही अच्‍छी बात है।” मुख्‍य कार्य साथी नागरिकों को `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम), प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) और नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्‍टी (एम. आर. सी. एम.) कानूनों की अच्‍छाइयां बतानी होती है और एक बार किसी व्‍यक्‍ति को इन कानूनों के बारे में जानकारी हो जाती है तब कुछ सफलता हासिल हो जाती है। यह सफलता तब भी समाप्‍त नहीं होती जब यदि कार्यकर्ता कुछ सप्‍ताहों का विराम ले ले।

(15.23)  सारांश ( छोटे में बात )

मैं सभी कनिष्‍ठ/छोटे कार्यकर्ताओं के साथ-साथ कार्यकर्ता नेताओं से अनुरोध करता हूँ कि वे अपनी पसंद के कानूनों का क़ानून-ड्राफ्ट तैयार करें और मैं उनसे यह भी अनुरोध करूंगा कि वे देखें कि क्‍या इन कानून-ड्राफ्टों को लागू कराने के उनके तरीके क्‍लोन पॉजिटिव और समय बचाने वाले हैं। जितने भी तरीकों का मैने अध्‍ययन किया है उनमें से “नेता-रहित कानून–क़ानून-ड्राफ्ट आन्‍दोलन” सबसे ज्‍यादा क्‍लोन पॉजिटिव और समय बचाने वाला है और इसमें प्रतिद्वंद्वियों द्वारा  उनके (अपने नेता के प्रति) इमानदारी खत्म होने का खतरे भी नहीं हैं।

किसी अन्‍य लेख में मैं यह बताउंगा कि `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) सभी संभव कानून-ड्राफ्टों में सबसे ज्‍यादा प्रभावकारी कानून–क़ानून-ड्राफ्ट है। एक सामान्‍य प्रमाण के रूप में मैं पाठकों से अनुरोध करूंगा कि वे उस प्रारूप को लिखें जिसे वे जनता की आवाज (सूचना का अधिकार) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली से ज्‍यादा प्रभावकारी समझते हैं और फिर मैं उनसे अनुरोध करूंगा कि वे अपने बनाए प्रारूप में `जनता की आवाज`  पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) को एक नए अंश के रूप में नीचे जोड़ लें । अब यह नया प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट उनकी राय में पहले से बेहतर है या खराब?

(15.24) फिक्स-अनशन , सत्याग्रह और गांधीगिरी का सच

हमारे पास तीन आमरण अनशन थेसाधू निगामानंद ,अन्ना हजारे  और स्वामी रामदेव जी के | जो अनशन निगामानंद ने किया ,उसने बड़ी संख्या इकठ्ठा नहीं की, इसीलिए सरकार ने उसे शांतिपूर्वक मरने दिया , अनशन के लिए बंदी भी बनाया .लेकिन उसकी मांगें पूरी नहीं की , स्वामी रामदेव जी और उनके लोगों पर 5000 लाठियां और 500 आंसू गोले बरसाए | ये सब सिद्ध करता है कि केवल फिक्स-अनशन (पूर्व से उसकी दिशा/परिणाम तय किया हुआ) ही सफल है, सत्याग्रह और गांधीगिरी नहीं | यदि अनशन फिक्स / पूर्व-परिणाम निर्धारित नहीं है , तो व्यक्ति या तो मरेगा या तो उसे लाठियां ही मिलेंगी|

(15.25) इस पाठ का उद्देश्‍य – पुनरावलोकन (फिर से देखना)

यह पाठ और इसके बाद का पाठ कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत है । इस पाठ और इसके बाद के पाठ में मैंने यह दिखलाने की कोशिश की है कि मेरा प्रस्‍तावित तरीका, कि “प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्रियों, महापौरों पर `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली कानून के लिए दबाव डालने के लिए कार्यकर्ता नागरिकों से कहें”, कम खर्चीला है और अन्‍य कार्यकर्ता नेताओं द्वारा प्रस्‍तावित अधिकांश अन्‍य तरीकों से ज्‍यादा प्रभावकारी है क्‍योंकि मेरा तरीका पर्याप्‍त होने के साथ-साथ क्‍लोन पॉजिटिव भी है। इसे बताने का उद्देश्‍य कार्यकर्ताओं से यह कहना नहीं है कि वे अपने संगठन छोड़कर मेरे संगठन में शामिल हो जाएं। लेकिन मेरा उद्देश्‍य कार्यकर्ताओं को इस बात पर राजी करने का है कि उन्‍हें अपने कार्यकर्ता नेताओं से कहना चाहिए कि वे अपने समूह के ऐजेंडे/कार्यसूची में `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम), प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) आदि को शामिल कर लें।

मैं कार्यकर्ताओं से यह क्‍यों कहता हूँ कि वे प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) आदि को अपने समूह में शामिल करें और यह नहीं कहता कि वे अपने समूह को छोड़कर मेरे समूह में शामिल हो जाएं? क्‍योंकि कार्यकर्ताओं से `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) को उनके संगठन के ऐजेंडे/कार्यसूची में शामिल करने के लिए कहना क्‍लोन पॉजिटिव है। जबकि कार्यकर्ताओं को उनके संगठन छोड़कर मेरे संगठन में आने/शामिल होने के लिए कहना क्‍लोन निगेटिव है और इसलिए इसका प्रभाव कम पड़ता है। अपने नेता /संगठन को छोड़ने का विचार या कोई अन्य नेता/संगठन को समर्थन करने का विचार से कार्यकर्त्ता को ऐसे लग सकता है कि वो अपने नेता/संगठन के प्रति ईमानदार नहीं है| इसीलिए ये केवल समय और शक्ति की बर्बादी होगी | इसीलिए हमें “ नेता-रहित क़ानून-ड्राफ्ट के लिए जन-आन्दोलन” की आवश्यकता है जिसमें अपने नेता/संगठन के प्रति नमक हरामी/बेईमानी का सवाल ही नहीं होता | इसी प्रकार, मैं मतदाताओं से शायद ही कभी कहता हूँ कि उन्‍होंने जिसे पिछली बार वोट दिया था, उसे वोट न दें और मुझे वोट दें। मैं उनसे हमेशा कहता हूँ कि वे अपने प्रिय उम्‍मीदवार से `जनता की आवाज` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम), प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) आदि प्रारूपों/क़ानून-ड्राफ्ट को उनके अपने चुनाव घोषणापत्र में शामिल कर लेने के लिए कहें। यह कदम भी क्लोन पॉजिटिव है और इसलिए अधिक प्रभाव डालता है।

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